Book Title: Mahakavi Bramha Raymal Evam Bhattarak Tribhuvan Kirti Vyaktitva Evam Krutitva
Author(s): Kasturchand Kasliwal
Publisher: Mahavir Granth Academy Jaipur
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कविवर त्रिभुवनकोति
कृष्ण वर्णा अति भीखणा प्रासादीसंती विकराल । पसी स्त्री मामिल रही ।प्रा. कापडीइ देखी तिणि काल तु 1१२५॥५६४।। कोप करीनि बोलीउ ।पा। कांइ जगाथ्यु रंड तु । दुम्न करि मनसु ध माका अस्त्र तणु नहीं खा ॥२६॥५६॥
स्वपन सरीखा जाणां मा0 संसार तणांए सुख तु । मे नर नारी मोझ्यिा मा० से नर प्रामि दुख तु ||२६॥५६६।।
पहा-वचन सुणी और बोलीउ, सांभलि जंब कूमार ।
नत्य कला एक पूरीउ, नाटक की एक सार १५६७।
एक दिवस राय मंदिरि वेश्या लेई बहुत । नुत्य करि तिहां रूयडउ हाव भाव संयुक्त ॥२१.५६८॥
विलास विभ्रम करि घणा, देखाली वली नेह । लोक तणा मन रीझवि, नत्य करतो तेह .१३.५६६॥
संसु वउ राजादिह णक कंचण दीनार । मणि मुक्तफल प्रति घणा, नपति देव तिणि बार ।।४।३५७०।।
राजा सनमान लही सुख क्लिास पण उ तेह। रजनी सूतां घेतवि, द्रव्य लेई जा एह ।।५।।५७१॥
द्रव्य लेई जच नीसरयु, महीउ अन्य संघात । लुप्ट मुष्ट करी बांधीउ, पाम्पु प्रति घणउ षात ॥६॥५७२।।
राज डंड राजा दीउ. पाभ्यु दुख अपार । लोभ करि जे लोभीउ, इणी परि दुख भार ।।७॥५७३11
ढाल साहेलाडीनी (राग धन्यासी)
वचन सुणी तब बोलीउ, जंबू संभल प्रभवाही बात । नयर वाणारसी राय लोकपाल, सेहनी छि बहू भात ।। साहेलनी बोलि अंबू कुमार, एह संसार मसार सा ||५७४।।
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