Book Title: Mahabandho Part 7
Author(s): Bhutbali, Fulchandra Jain Shastri
Publisher: Bharatiya Gyanpith

View full book text
Previous | Next

Page 327
________________ ३०६ महाबंधे पदेसबंधाहियारे पंचग॰ णत्थि अप्पाबहुगं । एवं वेउब्वियमि० । कम्मई० - अणाहार० सव्वपगदीणं णत्थि अप्पा बहुगं । अणुदिस याच सव्वट्ठ त्ति अपजत्तभंगो | एवं आहार० - आहारमि०परिहार ० - संजदासंजद ० - सासण० सम्मामिच्छादिट्ठि त्ति । णवरि सम्मामिच्छादिट्ठीगं णत्थि अप्पा बहुगं । एवं अप्पा बहुगं समत्तं । एवं अज्भवसाणसमुदाहारे ति समत्तमणियोगद्दारं । जीवसमुदाहारपरूवणा ३३६. जीवसमुदाहारेति तत्थ इमाणि दुवे अणियोगद्दाराणि । तं जहा — पमाणागमो अप्पा बहुगे त्ति । पमाणाणुगमो जोगट्ठाणपरूवणा ३४०. पमाणाणुगमो त्ति तत्थ इमाणि दुवे अणियोगद्दाराणि – जोगट्ठाण - परूवणा पदेसंबंधड्डाणपरूवणा चेदि । जोगड्डाणपरूवणदाए सव्वत्थोवो 'सुहुमअपज तयस्स जहण्णगो जोगो । बादर अपजत्तयस्स जहण्णगो जोगो असंखेखगुणों । एवं बीइंदि ० - तीइंदि ० चदुरिंदि ० - असण्णिपंचिंदि० अपज० जह० जोगो असंखैअगुणो । चाहिए | कार्मणकाययोगी और अनाहारक जीवोंमें सब प्रकृतियोंका अल्पबहुत्व नहीं है । अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धितकके देवामें अपर्याप्तकोंके समान भङ्ग है । इसी प्रकार आहारककाययोगी, आहारकमिश्रकाययोगी, परिहार विशुद्धिसंयत, संयतासंयत, सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों में जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंमें अल्पबहुत्व नहीं है । इस प्रकार अल्पबहुत्व समाप्त हुआ । इस प्रकार अध्यवसानसमुदाहार अनुयोगद्वार समाप्त हुआ । जीवसमुदाहार प्ररूपणा ३३६. जीवसमुदाहारका प्रकरण है । उसमें ये दो अनुयोगद्वार हैं । यथा - परिमाणानुगम और अल्पबहुत्व | परिमाणानुगम योगस्थानप्ररूपणा ३४०. परिमाणानुगम में ये दो अनुयोगद्वार होते हैं - योगस्थानप्ररूपणा और प्रदेशबन्ध - स्थानप्ररूपणा । योगस्थानप्ररूपणाकी अपेक्षा सूक्ष्म अपर्याप्त जीवका जघन्य योग सबसे स्तोक है । उससे बादर अपर्याप्तका जघन्य योग असंख्यातगुणा है । इसी प्रकार द्वीन्द्रिय अपर्याप्त, श्रीन्द्रिय अपर्याप्त चतुरिन्द्रिय अपर्याप्त और असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय अपर्याप्त जीवका जघन्य योग उत्तरोत्तर १. ता० प्रतौ 'वेडव्वियमि० कम्मइ०' इति पाठः । २. ता० प्रतौ 'सम्मादिट्ठि णत्थि ' आ० प्रतौ 'सम्मादिद्वीणं णत्थि' इति पाठः । ३. ता०प्रतौ 'चेदि' इति पाठो नास्ति । ४. ता०प्रतौ 'सव्वत्थोवा ( बो)' आ० प्रतौ 'सव्वत्थोवा' इति पाठः । ५. ता०प्रतौ 'जहण्णयं जोगो' इति पाठः । ६. ता०प्रतौ 'असंखेजगुणं' इति पाठः । ७. ता० प्रती 'अपज० । जह०' इति पाठः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 325 326 327 328 329 330 331 332 333 334 335 336 337 338 339 340 341 342 343 344 345 346 347 348 349 350 351 352 353 354 355 356 357 358 359 360 361 362 363 364 365 366 367 368 369 370 371 372 373 374 375 376 377 378 379 380 381 382 383 384 385 386 387 388 389 390 391 392 393 394