Book Title: Krambaddha Paryaya Nirdeshika Author(s): Abhaykumar Jain Publisher: Todarmal Granthamala Jaipur View full book textPage 6
________________ कहाँ चश गद्यांश 14 – भवितव्यता के आधार से कर्त्तव्य का निषेध गद्यांश 15 - रागी जीव भी पर पदार्थ के परिणमन का कर्त्ता नहीं है गद्यांश 16 – पर-पदार्थों के परिणमन की चिंता करना व्यर्थ है। गद्यांश 17 - जैन-दर्शन का अकर्त्तावाद गद्यांश 18 - परिणमन करना वस्तु का सहज स्वभाव है। गद्यांश 19 – अज्ञानी की विपरीत मान्यता गद्यांश 20 – ज्ञान का परिणमन भी इच्छाधीन नहीं है. गद्यांश 21 - प्रत्येक पर्याय स्वकाल में सत् है। गद्यांश 22 - क्रमबद्धपर्याय, एकांत नियतिवाद और पुरुषा गद्यांश 23 - पाँच समवाय गद्यांश 24 -- अनेकान्त में भी अनेकान्त गद्यांश 25 - एकांत, अनेकान्त और क्रमबद्धपर्याय गद्यांश 26 - क्रमबद्धपर्याय सार्वभौमिक सत्य है गद्यांश 27 – पुरुषार्थ एवं अन्य समवायों का सुमेल गद्यांश 28 – क्रमबद्धपर्याय और पुरुषार्थ गद्यांश 29 - सर्वज्ञता की श्रद्धा गद्यांश 30 - सर्वज्ञता के निर्णय की अनिवार्यता गद्यांश 31 – अव्यवस्थित मति और स्वचलित व्यवस्था । अध्याय - 3 9. क्रमबद्धपर्याय : कुछ प्रश्नोत्तरः अध्याय - 4 10. क्रमबद्धपर्याय : महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर | अध्याय -5 11. क्रमबद्धपर्याय प्रासंगिक प्रश्नोत्तर 12. क्रमबद्धपर्याय आदर्श प्रश्नोत्तर - 112 127 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
1 ... 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 ... 132