Book Title: Bhagwati Sutra Vyakhyan Part 03 04
Author(s): Jawaharlal Aacharya
Publisher: Jawahar Vidyapith

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Page 281
________________ लगती हैं। साधु को प्रतिक्रमण में असावधानी करने मात्र से पांच क्रियाएं लगती हैं और उस पुरुष को तीन ही लगती है । इस अंतर का क्या कारण है? गौतम स्वामी ने पूछा-भगवन् ! एक आदमी मृग मारने चला । उसने अपने धनुष पर बाण चढ़ाया। उसी समय पीछे से कोई दूसरा आदमी आ पहुंचा और उसने बाण चढ़ाने वाले को मार डाला। लेकिन इसी बीच में उस आदमी के हाथ से बाण छूट गया और मृग मर गया। अब इन दो मनुष्यों में से कौन मनुष्य का घातक है और कौन मृग का घातक है? भगवान् ने उत्तर दिया-गौतम! जिसके बाण से मृग मरा, वह मृगघातक है और जिसने मनुष्य को मारा, वह मनुष्य का घातक है, क्योंकि 'कडमाणे कडे' यह सिद्धांत सर्वत्र लागू होता है। संसार के कानून में भी ऐसा ही अन्तर है। कल्पना कीजिए, एक आदमी किसी आदमी को मारने चला, पर पुलिस ने उसे बीच में ही पकड़ लिया। एक दूसरा मनुष्य किसी को मारने गया, पर वह कुछ घाव ही कर सका, जान से न मार सका और बीच में ही पकड़ लिया गया। तीसरे आदमी ने जाकर किसी को जान से मार डाला। लेकिन कानून के अनुसार इन तीन आदमियों को भिन्न-भिन्न प्रकार की सजा दी जाती है। अगर तीनों को एक ही प्रकार सजा दी जाय तो संसार में न्याय की व्यवस्था ही न रहे। भगवान् कहते हैं- जब संसार को न्याय देना है तो तीन, चार और पांच क्रियाओं का विचार करो, परन्तु जब स्वयं का विचार करो तब ऐसा समझो कि संकल्प करने मात्र से पांचों क्रियाएं लगती हैं। कभी-कभी संकल्प करने वाला मारने वाले से भी बढ जाता है | उदाहरणार्थ एक आदमी निशान साधने का अभ्यास कर रहा है अचानक उस आदमी का निशाना चूक गया और उसकी गोली से एक आदमी मर गया । क्या संसार के कानून से उसे फांसी की सजा मिलेगी? नहीं! क्योंकि उसकी नीयत किसी को मारने की नहीं थी । अतएव उसे सिर्फ असावधानी का दण्ड मिलेगा। इस प्रकार जब राजा नीयत देखकर निर्णय करता है तब धर्म के न्याय में ऐसा क्यों नहीं होगा? मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । अर्थात् - मन ही मनुष्य के बंध और मोक्ष का कारण है। २६८ श्री जवाहर किरणावली

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