Book Title: Arhat Vachan 2011 01 04 Author(s): Anupam Jain Publisher: Kundkund Gyanpith Indore View full book textPage 3
________________ अर्हत् वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर सम्पादकीय सामायिक सन्दर्भ अर्हत् वचन वर्ष 23 का यह संयुक्तांक अंक 1-2, जनवरी-जून 2011 आपके हाथों में है। इसमें हमने 12 लेखों, 2 टिप्पणियों एवं अन्य अनेक आख्याओं/गतिविधियों को स्थान देकर 140 पृष्ठों में पाठकों को यथेष्ट सामग्री दी है। दिनांक 18.10.2011 को कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ इन्दौर का स्थापना रजत जयंती वर्ष प्रारंभ हो रहा है। अतः जुलाई-सितम्बर 2011, अंक-3 एवं अक्टूबरदिसम्बर 2011 अंक-4 के 2 स्वतंत्र अंकों के अतिरिक्त एक इंडेक्स वाल्यूम (प्रारम्भ से अब तक 23 वर्षों में प्रकाशित सामग्री की अनुक्रमणिका) भी निकालने की योजना है। यह अंक हमारे प्रेरणा स्रोत पूज्यश्री देवकुमार सिंह कासलीवाल (काका सा.) को समर्पित होगा। हमारे पाठकों को याद होगा कि वर्ष 15, अंक 1-2, जनवरी-जून 2003 में हमने 1-14 वर्षों का इंडेक्स वाल्यूम प्रकाशित किया था। विगत 8 वर्षों में शोधार्थियों ने इसका भरपूर उपयोग किया। जो इसकी उपयोगिता को स्वयं प्रमाणित करता है। अब नये इंडेक्स वाल्यूम में 1-23 (1988-2011) वर्षों की सामग्री होगी। हमारे सभी पाठकों को यह अंक भी हम 2011 में ही उपलब्ध कराना चाहते हैं। अब हम कुछ ज्वलंत / सामायिक विषयों पर चर्चा करेंगे। दक्षिण की जैन संस्कृति का संरक्षण :- यह निर्विवाद सत्य है कि जैन धर्म की मूल संस्कृति दक्षिण भारत में संरक्षित है। कर्नाटक प्रांत में तो यह संस्कृति आज भी संरक्षित होकर अनुसंधुत्सुओं को सहजता से उपलब्ध हो रही है। इस कार्य में वहां के पूज्य भट्टारक स्वामी जी महाराजों का बहुत बड़ा योगदान है। उनके प्रयासों से ही प्राचीन पाण्डुलिपियां सुरक्षित रहीं और अनेक सातिशय, दुर्लभ, प्राचीन कलापूर्ण जिनबिम्बों के भी दर्शन हो रहे हैं, किन्तु तमिलनाडु, पाण्डिचेरी, केरल, आंध्रप्रदेश उड़ीसा आदि में स्थितियां इतनी अनुकूल नहीं रही। इस कारण जैन संस्कृति के अनेक स्मारक या तो नष्ट हो गये अथवा उन पर काल की इतनी गहरी परत पड़ गई है कि आज उनको पहचान पाना मुश्किल है। खण्डगिरि और उदयगिरि (उड़ीसा) की गुफाओं में जिस तरह से जिन मूर्तियों को विकृत और रूपान्तरित किया जा रहा है और जैन समाज असहाय होकर उसे देख रहा है वह निश्चित ही विचारणीय है। श्री आर.के.जैन-मुम्बई ने केरल की जैन संस्कृति को प्रकाश में लाने के लिये बहुत प्रयास किया है और उसके परिणाम भी सामने आ रहे हैं। श्रीमती सरिता महेन्द्र कुमार जैन, चेन्नई के उदात्त आर्थिक सहयोग, गहन अभिरुचि तथा तमिलनाडु के कुछ मठों के युवा भट्टारक स्वामीजी की सक्रियता के कारण तमिलनाडु की तस्वीर बदल रही है। अब दक्षिण भारत की यात्रा करने वाले जैन तीर्थयात्रियों द्वारा तमिलनाडु को यात्रा पथों में सम्मिलित किया जाने लगा है। बहन सरिता जी ने तमिलनाडु के शताधिक प्राचीन मन्दिरों का जीर्णोद्धार कराकर जैन संस्कृति की स्वर्णाक्षरों में अंकित की जाने वाली सेवा की है। आप अखिल भारतीय दिगम्बर जैन महिला महासभा की राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा अखिल भारतीय दिगम्बर जैन महिला संगठन की संरक्षक हैं। ऐसी मातृशक्ति सदैव आदरणीय है। अपने प्राचीन तीर्थों के इतिहास तथा सांस्कृतिक अवशेषों के संरक्षण के प्रति जैन समाज की अभिरुचि बढ़ी है। प्रो. भागचन्द जैन 'भास्कर' - नागपुर के कुशल संपादकत्व में प्रकाशित अर्हत् वचन, 23 (1-2), 2011Page Navigation
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 ... 140