Book Title: Anand Pravachan Part 05
Author(s): Anand Rushi, Kamla Jain
Publisher: Ratna Jain Pustakalaya

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Page 338
________________ ३२ नीके दिन बीते जाते हैं धर्मप्रेमी बंधुओ, माताओ एवं बहनो ! कल से हमारे यहाँ महापर्व पर्युषण का प्रारम्भ हुआ है । हमारे देश में पर्वो का आगमन सदा होता रहता है। कितने पर्व हमारे हिन्दुस्तान में मनाये जाते हैं उनकी ठीक गणना भी नहीं की जा पाती । किन्तु उनमें से अधिक भौतिक पर्व होते हैं और बाकी आध्यात्मिक पर्व । इन आध्यात्मिक पर्वों में से सबसे मुख्य पर्युषण पर्व को माना गया है । क्योंकि भौतिक या सांसारिक पर्व दीवाली, होली, राखी आदि सभी व्यावहारिक पर्व होते हैं और इन्हें आप अच्छा खा-पीकर, अच्छे-अच्छे कपड़े पहनकर, शरीर की साज-सज्जा कर तथा मकानों की सजावट करके मनाते हैं । किन्तु पर्युषण पर्व इन दृष्टियों से नहीं मनाया जाता है । इसे मनाने का उद्देश्य आत्मा की शुद्धि करना, इसे कर्मों से रहित करना तथा परलोक के लिए शुभ कर्मों का संचय करना होता है । अतः इन दिनों में लोग जप, तप, सेवा, परोपकार, स्वाध्याय तथा दान-पुण्य करते हैं । ध्यान देने की बात है कि अभी मैंने जिन-जिन शुभ क्रियाओं के नाम बताए हैं वे तथा और भी अनेक उत्तम कार्य तथा त्याग आदि सभी मिलकर कर्मों की निर्जरा करते हैं । यह नहीं कि एक गुण तो अपना लिया और बाकी को छोड़ दिया । उससे क्या बनेगा ? उदाहरण स्वरूप स्वाध्याय तो खूब कर लिया पर क्रोध दुर्वासा ऋषि ही बने रहे और क्षमा भाव धारण नहीं किया तो होगा ? इसी प्रकार यश प्राप्ति के लिए दान तो दे दिया पर ३१८ Jain Education International For Personal & Private Use Only क्या अधिक लाभ दूसरी तरफ धन www.jainelibrary.org

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