Book Title: Agam 35 Chhed 02 Bruhatkalpa Sutra Bhashyam Part 02
Author(s): Dulahrajmuni
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 416
________________ ७४४ -बृहत्कल्पभाष्यम् अलाबुकं वा भिन्दानः, शिराया वा भेदं कुर्वाणो न प्रच्छनीयः, अथ ग्लानस्यापि किञ्चित् छेत्तव्यं भेत्तव्यं ततश्छेदन-भेदनयोरपि प्रष्टव्यः। अथासौ शुभासने उपविष्टः 'रोगविधिं' वैद्यशास्त्रपुस्तकं प्रसन्नमुखः प्रलोकयति, अथवा रोगविधिः-चिकित्सा तां कस्यापि प्रयुञ्जान आस्ते ततो धर्मलाभयित्वा प्रष्टव्यः। स च वैद्यः पृष्टः सन्नुपदेशं वा दद्याद् ग्लानसमीपे वा आगमनं कुर्यात्॥ (बृभा वृ. पृ. ५६१) घर में यदि वैद्य एक शाटक पहने हुए हो, तैल आदि से अभ्यंगन करा रहा हो, उद्वर्तन कर रहा हो, शिरो मुंडन आदि करा रहा हो, राख या उकरडी के पास बैठा हो, कुछ छेदन, भेदन कर रहा हो उस समय उसे कुछ भी नहीं पूछना चाहिए। जब वैद्य सुखासन में बैठा हो, वैद्यशास्त्र पढ़ रहा हो अथवा किसी की चिकित्सा कर रहा हो अथवा वैद्य के पूछने पर बताए या वैद्य को ग्लान के समीप ले जाए। वाहि नियाण विकारं, देसं कालं वयं च धातुं च। आहार अग्गि-धिइबल, समुइं च कहिंति जा जस्स॥ (बृभा-१९२७) " परिचारक वैद्य के पास जाकर रोग और रोगी की पूर्ण जानकारी देकर उन्हें ये बातें बताता है व्याधि-जो व्याधि हो, उसका नामोल्लेख। निदान-रोगोत्पत्ति का कारण। विकार-प्रवर्धमान रोग की स्थिति। देश-रोगोत्पत्ति का कारण प्रवात अथवा निवात प्रदेश। काल-रोगवृद्धि का समय पूर्वाह्न आदि। वय-रोगी की उम्र। धातु-वात-पित्तप्रकोप है या कफप्रकोप? आहार-आहार आदि की मात्रा न्यून या अधिक? अग्निबल-जठराग्नि मंद है या प्रबल? धृतिबल-धृतिबल मजबूत है या कमजोर ? समुइ-रोगी की प्रकृति कैसी है? उडम्मि वातम्मि धणुग्गहे वा, अरिसासु सूले व विमोइते वा। एगंग-सव्वंगगए व वाते, अब्भंगिता चिट्ठति चम्मऽलोमे॥ (बृभा-३८१६) यस्याः संयत्याः प्राचुर्येणोर्द्धवात उच्छलति, 'धनुर्ग्रहोऽपि' वातविशेषो यः शरीरं कुब्जीकरोति स वा यस्या अजनिष्ट, अशाँसि वा सजातानि, शूलं वा अभीक्ष्णमुद्धावति, पाणिपादाद्यङ्गं वा 'विमोचितं' स्वस्थानात् चलितम्, एकाङ्गगतो वा सर्वाङ्गगतो वा कस्याश्चिद् वातः समुत्पन्नः सा निर्लोमचर्मणि अभ्यङ्गिता तिष्ठति। (बृभा वृ. पृ. १०५३) तरच्छचम्म अणिलामइस्स, कडिं व वेढेंति जहिं व वातो। एरंड-ऽणेरंडसुणेण डक्वं, वेढेंति सोविंति व दीविचम्मे॥ . (बृभा-३८१७) _ 'अनिलामयी' वातरोगिणी तस्याः कटी तरक्षचर्मणा वेष्टयन्ति। 'यत्र वा' हस्तादौ वातो भवति तं वेष्टयन्ति। एरण्डेन वा-हडक्कितेन अनेरण्डेन वा शुना या दष्टा तां वा चर्मणा वेष्टयन्ति, द्वीपिचर्मणि वा तां खापयन्ति॥ (बृभा वृ. पृ. १०५३) पुया व घस्संति अणत्थुयम्मि, पासा व घस्संति व थेरियाए। लोहारमादीदिवसोवभुत्ते, लोमाणि काउं अह संपिहंति॥ (बृभा-३८१८) - स्थविरायाः संयत्या अनास्तृते प्रदेशे उपविशन्त्याः पुतौ घृष्येते, सुप्ताया वा पाश्वौँ घृष्येते, ततः सलोम चर्मापि यद् दिवसतो लोहारादिभिरुपविशद्भिपभुक्तं तत् प्रातिहारिकं दिने दिने मार्गयित्वा लोमान्यधः कृत्वा 'सम्पिदधति' परिभुञ्जते इत्यर्थः। (बृभा वृ. पृ. १०५३) वेग निरोध के परिणाम मुत्तनिरोहे चक्खं, वच्चनिरोहेण जीवियं चयइ। उड्ढनिरोहे कोठें, गेलन्नं वा भवे तिसु वा॥ (बृभा-४३८०) मूत्रस्य निरोध विधीयमाने चक्षुरुपहन्यते। वर्चः-पुरीषं तस्य निरोधेन जीवितं परित्यजति, अचिरादेव मरणं भवतीत्यर्थः । व्रण-चिकित्सा वणभेसज्जे य सप्पि-महु पट्टे। (बृभा-३०९५) व्रण पर घी या मधु से मिश्रित औषध लगाकर पट्टा बांधा जाता था। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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