Book Title: Updeshpad Mahagranth Part 01
Author(s): Pratapvijay
Publisher: Muktikamal Jain Mohan Mala

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Page 14
________________ श्रीउपदे १ चोलकनिदर्शनम्, शपदे एहिं अप्पणो निविसेसपुरिसेहिं । चउगाउयं सुरंग करावइ जाव जउगेहं ॥५४॥ एवं ठियम्मि नरवइकण्णा सा णिय- यपरियरसमेया। वीवाहत्थं पत्ता कपिल्ले ऊसियपडाए ॥ ५५॥ वित्तं पाणिग्गहणं वासनिमित्तं तओ य रयणीए । वर- धणुवहूसमेओ पवेसिओ जउहरं कुमरो ॥५६॥ जामदुगम्मि अइगए निसाइ पज्जालियं च तं भवणं । जाओ य कलयलरवो अइभीमो सबओ तस्स ॥ ५७॥ पक्खुहियजलनिहिनिहं कुमरेणायण्णिऊण हलबोलं । आपुच्छिओ वरधणू किमकंडे डमरमेयंति ॥ ५८॥ कुमर! तुहाणत्थकए एसो वीवाहवइयरो रइओ । एसा न रायकण्णा अण्णच्चिय काइ तस्सरिसा ॥ ५९॥ तो तीइ मंदपणओ कुमरो जंपेइ कि विहेयमओ! तो भणिओ वरधणुणा पण्हिपहारं अहो देसु ॥६०॥ दिण्णम्मि तम्मि पत्तं सुरंगदारं विणिग्गया तेण । दोण्णिवि गंगातीरे पवापएसम्मि संपत्ता ॥ ६१॥ पुवं चिय धणुणा ठावियम्मि जच्चम्मि तुरयजुयलम्मि । तक्षणमारूढा ते पण्णासं जोयणाणि गया ॥ ६२ ॥ अइदीहरपहखेएण * खेड्या झत्ति निवडिया तुरया। पाएहिं चेव गंतु लग्गा पत्ता तओ गामं ॥ ६३॥ कुडाभिहाणमत्थं कुमरेणं वरधणू 1 इमं भणिओ । जह बाहए छुहा मे परिसंतो तह दढं जाओ ॥ ६४ ॥ गामवहिम्मि य तं ठाविऊण गामंतरे पविट्ठो सो। घेत्तूण पहावियं आगएण मुंडाविओ कुमरो॥६५॥ वत्थे कसायरत्ते निवासिओ पट्टएण बद्धो य । चउरंगुलेण वच्छे | सिरिवच्छो लच्छिकुलनिलओ॥६६॥ वेसविवजासाओ वरधणुणावि य कओ परावत्तो । जइ कहवि दीहराया जाणेज्ज हणेज तो अम्हे ॥ ६७॥ इय संभमं वहता तप्पडियारं तहा कुणता य । गामंतो संपत्ता एगाओ माहणगिहाओ॥६८॥ निग्गम्म दासचेडेण भासिया भुंजहेह गेहंमि । भुत्ता तत्थ निवोचियनीईए तदवसाणम्मि ॥ ६९ ॥ एगा पहाणमहिला

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