Book Title: Sramana 2008 01
Author(s): Shreeprakash Pandey, Vijay Kumar
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 48
________________ परीषह एवं उपसर्गजय के संदर्भ में सल्लेखना व्रत : ४३ २०. ज्ञान - अज्ञान से उत्पन्न कष्ट को समभाव से सहन करना। २१. दर्शन - जिसकी श्रद्वा पूर्ण रूप से स्थिर रहती है वह दर्शन-परीषह पर विजय पाता है।। २२. प्रज्ञा - बुद्धि होने पर उसका मद न करना प्रज्ञा-परीषहजय है। इनमें अपने आपको सम रखना परीषहजय कहलाता है। कष्टों को समभाव से सहन करने से हमारी प्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ती है। प्रतिरोधत्मक शक्ति कर्म शरीर को शनैः शनैः क्षीण करती है। परीषहजय में मन-वचन-काया योग स्थिर होते हैं। योगों की स्थिरता आत्मा से कर्मदल को अलग होने के लिए मजबूर करती है। जैसे जैसे समता आती है कर्मशरीर का पोषण बंद होता है तथा कर्म-पुद्गल आत्मा से विलग होते हैं। इसे निर्जरा कहा जाता है। उपसर्गजय से संयम सधता है। उपसर्गजय संयम की साधना है। संयम साधना है संवर उसकी निष्पति है। परीषहजय तप का एक रूप है। तप साधना है, निर्जरा उसकी निष्पति है। भगवान महावीर ने संवर, निर्जरा को धर्म बताया है। संवर निर्जरा आत्मशुद्धि में सहायक हैं। आचारांगनियुक्ति के अनुसार स्त्री परीषह और सत्कार परीषह ये शीत परीषह के अंतर्गत आते हैं और शेष बीस उष्ण परीषह में। परीषहजय, उपसर्गजय को साधक अपने जीवन का लक्ष्य बना लेता है तो वह निरंतर साधना से वीतरागता तक को प्राप्त कर सकता है। आत्मशुद्धि, भावशुद्धि पर निर्भर करती है। भावशुद्धि समभाव में रहने से होती है। परीषह एवं उपसर्गजय व्यक्ति को समभाव में ले जाते हैं। राग-द्वेष का न होना समभाव है। मोह से राग-द्वेष, राग-द्वेष से कर्म, कर्म से जन्म-मरण, जन्ममरण से दुःख तथा दुःख से राग-द्वेष यह वर्तुल है जो हर संसारी आत्मा के साथ चलता रहता है। परीषहजय राग-द्वेष को क्षीण करते हैं। उपसर्गजय कर्मों को क्षीण करते हैं। परीषहजय समभाव प्राप्त करने का सर्वोत्तम माध्यम है। समभाव आत्मविजय का सर्वोतम माध्यम है। सल्लेखना व्रत सल्लेखना में दो शब्दों का योग है- सत् + लेखना। सत् का अर्थ सम्यक् तथा लेखना का अर्थ - सार-संभाल करना है। इस संदर्भ में लेखना का अर्थ व्यक्ति के द्वारा अपने जीवन में क्रिया कलापों को त्यागते हुए शरीर को क्रमशः कृश करना है। अर्थात् साधु अथवा श्रावक आहार का क्रमशः त्याग करते हुए मरण को प्राप्त करता है, उसे सल्लेखना कहते हैं। जैन धर्म एवं दर्शन अपने वैशिष्ट्य को लिए हुए अनादिकाल से निरंतर गतिशील है। विभिन्न मान्यताओं एवं सिद्धान्तों को लिए हुए यह दर्शन जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त साधना के अनेक पृष्ठों को उद्घाटित करता है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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