Book Title: Rambhashuk Samvad
Author(s): Hariprasad Bhagirath
Publisher: Hariprasad Bhagirath

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Page 27
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ( २६ ) लावण्यधन्ये वृषभानुकन्ये तवाऽधरोत्थाऽमृतपानमेव ॥ २ ॥ अर्थ - हे हरे ! आप पुरातन होकेभी तुम वृद्ध क्यों न भये यहां प्रत्यक्ष क्या हेतु है सत्य कहो ? शृंगारशोभासे युक्त रहनेवाली हे वृषभानुकन्ये ! ( इसमें ) तुम्हारा अधरामृत पान हेतु है ( इससे अजर हूं ) ॥ २ ॥ पयोधरे विद्युदभून्मुरारे पयोधरो विद्युति नैव दृष्टः ॥ राधे स्थितायां त्वयि विद्युतीह पयोधरद्वन्द्वमिदं व्यलोकि ॥ ३ ॥ अर्थ – हे मुरारे ! ( पयोधर ) मेघमें बिजली होती है, विजलीमें तो मेघ कहीं नहीं देखा ? हे राधे ! स्थित हुई वि जलरूप तुमारेविषे यह पयोधरयुग्म ( कुचयुग्म ) दीखता है ! ॥ ३ ॥ दातुं शरीरं परपुरुषाय नैवोत्सहेऽहं नरकादिभेमि ॥ दत्ते शरीरे नरकस्य हन्त्रे का नाम भीतिर्नरकाद्भवत्याः ॥ ४ ॥ For Private and Personal Use Only

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