Book Title: Kalpsutram
Author(s): Vinayvijay Gani
Publisher: Atmanand Jain Sabha

View full book text
Previous | Next

Page 11
________________ AAAAAAAAAAAA मासेनैकेनेयं, सरखतीतोषतः कृता वृत्तिः । अणहिल्लपाटकनगरे, विजयिनि जयसिंहदेवनृपे ॥२॥ दोहट्टिवसतिवासैः, श्रेष्ठिश्रीजासकस्य दानरुचेः। तदुपष्टम्भादपरञ्च, श्राविकाया वसुन्धर्याः ॥३॥ है वीरादिपुत्रमातुर्नित्यं जिनसाधुपूजनरतायाः। श्रीदेवसूरिभिरसौ, भव्यजने जातविमलदयः ॥ ४॥ श्रीमद्भिर्नेमिचन्द्राख्यसूरिभिः शोधितादृतैः । वृत्तिरेषातिगम्भीरसिद्धसिद्धान्तपारगैः ॥ ५॥" एवश्च प्रभावकचरितेपि श्रीहरिभद्रसूरिप्रबन्धे साध्वीनामुपदेशदानानधिकारित्यमेवोक्तं यथा"चक्किदुगं हरिपणगं, पणगं चक्कीण केसवो चक्की। केसव चक्की केसव, दुचक्की केसीय चक्की य॥२१ अवददिति यदम्ब चाकचिक्यं, बहुतरमत्र विधापितं भवत्या। इह समुचितमुत्तरं ददौ सा, शृणु ननु पुत्रक गोमयार्द्रलिप्तम् ॥ २२ ॥ इति विहितसदुत्तरेण सम्यक्, स च वदति स्म चमत्कृतिं दधानः । निजपठितविचारणं विधेहि, त्वमिह सवित्रि न वेड्यहं त्वदर्थम् ॥ २३ ॥

Loading...

Page Navigation
1 ... 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 ... 622