Book Title: Jain Siddhanta Sangraha
Author(s): Sadbodh Ratnakar Karyalaya Sagar
Publisher: Sadbodh Ratnakar Karyalaya Sagar
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४३६] जैनसिद्धांतसंग्रह।
वह क्षार श्रोणित भरी, मांस कीच पिन थान ॥७॥ पक्षी वायस गीष गण, लोहतुंड सोजेह । मरम विदारे दुख करें, चौथे चहुंदिश देह ॥७२॥ पंचेन्द्री मनको महा, जो दुखदायक जोग । ते सब नर्क निकेतमें, एक निन्द ममनोग ॥ ७३ ॥ कथा मपार कलेशकी, कहै कहालौ कोय । . कोटि नीमसे बरनिये, 1ऊ न पूरी होय ॥ ७ ॥ सागरगन्ध प्रमाण थिति, क्षण क्षण तीक्षण त्रास। ए दुख देखे नारकी, परवश परो निरास || ७५ ॥ नसी परवश वेदना, सहे नोय बहु भाय । सुवश सहे जो मंस भी, वो भवनक तरि नाय ॥७॥ ऐसे नरक नारकी, भयो भील दुठ भाव । सागर सत्ताईसकी, धारी मध्यम भाव ॥ ७७ ॥ सागर काल प्रमाण भव, वरणों औसर पाय । जिनसों नर्क निवासकी, थित वरनी जिनराय ॥७॥
(१२) जन्मकल्याणक पूजा। दोहा-दोष मठारह रहित प्रसु, सहित मुगुण छयालीस।
तिन सबकी पूजा करों, माय तिष्ठ जगदीश ॥१॥
ॐ ह्रीं मष्टादशदोषरहितं षट्चत्वारिंशद्गुणसहित श्रीमदईत्परमेष्टिन् ! मन मवंवर ! अवतर | संवौषट् ।

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