Book Title: Jain Gotra Sangraha
Author(s): Shravak Hiralal Hansraj
Publisher: Shravak Hiralal Hansraj

View full book text
Previous | Next

Page 227
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir वर्धमानशाहनी स्त्री नवरंगदेवीए दशहजार मुद्रिका खरचीने श्रीपार्श्वनाथजीनी नीलमनी एक प्रतिमा करावी. पासिंहशाहनी स्त्री कमलादेवीए दशहजार मुद्रिका खरचीने नीलमनी श्री मल्लिनाथजीनी एक प्रतिमा करावी. एची रीते तेओना कुटुंबना सर्व माणसोए कसोटी आदिक उमदा पाषाणोनी जिन प्रतिमाओ करावी. ___ एवी रीते जे समये ते बन्ने भाइओए शुध मार्गमा घणुं द्रव्य खरची अतिशय पुण्य उपार्जन कयु. हवे ते वखते नवानगरना महाराजा जसवतसिंहजीनो हडमत ठकर नामनो लुहाणा ज्ञातिनो एक खजानची हतो. महाराजानी वर्धमानशाह तथा पद्मसिंहशाहपर घणी प्रीति जोइने तेना हृदयमा ईषा उत्पन्न थइ, तेथी तेणे लाग जोइने एक वखते महाराजा जामसाहेबने अरज करी के, आजे अमुक राज्य कार्य माटे नवहजार सोनामोहोरोनो खप छे, अने आ समये आपणा खजानामां तेटली शीलक नथी, माटे जो आप हुकम करो तो हुं तेटली सोनामोहोरो हाल वर्धमानशाह पासथी उछीनी लावं, अने खजानामां आव्येथी तेमने हुं पाछी भरी आ For Private And Personal Use Only

Loading...

Page Navigation
1 ... 225 226 227 228 229 230 231 232 233 234 235 236 237 238 239 240 241 242 243 244