Book Title: Haribhadra ka Aavdan
Author(s): Sagarmal Jain
Publisher: Parshwanath Shodhpith Varanasi

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Page 29
________________ [ २८ ] 5 गृहस्थ वेश क्यों नहीं धारण कर लेते हो ? अरे गृहस्थवेश में कुछ प्रतिष्ठा तो मिलेगी किन्तु मुनि वेश धारण करके यदि उसके अनुरूप आचरण नहीं करोगे तो उल्टे निन्दा के ही पात्र बनोगे । यह उन जैसे साहसी आचार्य का कार्य हो सकता है जो अपने सहवगियों को इतने स्पष्ट रूप में कुछ कह सके । जैसा मैंने अपने पूर्व लेख में चर्चा की है, हरिभद्र तो इतने उदार हैं कि वे अपनी विरोधी दर्शन परम्परा के आचार्यों को भी महामुनि सुवैद्य जैसे उत्तम विशेषणों से सम्बोधित करते हैं । किन्तु वे उतने ही कठोर होना भी जानते हैं - विशेष रूप से उनके प्रति जो धार्मिकता का आवरण डालकर भी अधार्मिक हैं । ऐसे लोगों के प्रति यह क्रान्तिकारी आचार्य कहता है 16 ऐसे दुश्शील, साधुः पिशाचों को जो भक्ति पूर्वक वन्दन नमस्कार करता है, क्या वह महापाप नहीं है " ? अरे इन सुखशील स्वच्छन्दाचारी मोक्ष मार्ग के वैरी, आज्ञा भ्रष्ट साधुओं को संयति अर्थात् मुनि मत कहो । अरे देव द्रव्य के भक्षण में तत्पर, उन्मार्ग के पक्षधर और साधुजनों को दूषित करने वाले इन वेशधारियों को संघ मत कहो । अरे इन अधर्म और अनीति के पोषक अनाचार का सेवन करने वाले और साधुका के चोरों को संघ मत कहो । जो ऐसे (दुराचारियों के समूह) को राग या द्व ेष के वशीभूत होकर भी संघ कहता है उसे भी छेद- प्रायश्चित्त होता है' 1 हरिभद्र पुनः कहते हैं - जिनाज्ञा का अप१५. जइ चरिउ नो सक्को सुद्ध जइलिंग महवपूयट्ठी । तो गिहिलिंग गिण्हे नो लिंगी पुणारहिओ ! - वही, १२७५ 17 १६. एयारिसाण दुस्सीलयाण साहुपिसायाण मत्ति पूव्वं । जे वंदणनमसाइ कुव्वंति न महापावा ? वही, १।११४ १७. सुहसीलाओ स्वछंदचारिणो वेरिणो सिवपहस्स । आणाभट्टाओ बहुजणाओ मा भणह संवृत्ति || देवा दव्वभक्खण तप्परा तह उमग्गपक्खकरा । साहु जणाणपओसं कारिणं माभणह संघं ॥ अहम्म अनीई अणायार सेविणो धम्मनीइं पडिकूला । साहुपभिइ चउरो वि बहुया अवि मा भणह संघं ॥ असंघ संघ जे भणति रागेण अहव दोसेण । छेओ वा मूहत्तं पच्छित्तं जायए तेसि । वही, १।११९, १२०, १२१. १२३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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