Book Title: Gnata Dharmkathangasutram
Author(s): Jinendrasuri,
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala
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'कम्मरयविकरणकर'ति कर्मरजोविक्षेपणकारि अपूर्वकरणमष्टमगुणस्थानकं, अनन्तं विषयानन्तत्वात् यावत्करणादिदं द्रष्टव्यं अनुत्तरं-समस्तज्ञानप्रधानं र निर्व्याघातं-अप्रतिहतं निरावरण-क्षायिकं कृत्स्नं-सर्वार्थग्राहकत्वात् प्रतिपूर्ण-सकलस्वांशयुक्तत्वात् पौर्णमासीचन्द्रवत् केवलवरज्ञानदर्शनं संशुद्धं वरविशेषग्रहणं सामान्यग्रहणं चेत्यर्थ:६ ॥सू.८३ ॥
तेणं कालेणं २ सव्वदेवाणं आसणाति चलंति समोसढा सुणेति अट्ठाहियामहिमं नंदीसरं जामेव दिसं पाउन्भूया कुंभएवि निग्गच्छति, तते णं ते जितसत्तुपामुक्खा छप्पियरायाणो जेट्टपुत्ते रज्जे ठावेत्ता पुरिससहस्सवाहिणीयाओ दुरूढा सव्विड्डीए जेणेव मल्ली अरहा जाव पज्जुवासंति, तते णं मल्ली अरहा तीसे महालियाए कुंभगस्स तेसिंच जियसत्तुपामुक्खाणं धम्मं कहेति परिसा जामेव दिसि पाउन्भूया तामेव दिसिं पडिगया, कुंभए समणोवासए जाते, पडिगए, पभावती य समणोवासिया जाया पडिगया, तते णं जितसत्तू छप्पि राया धम्म सोच्चा आलित्तए णं भंते ! जाव पव्वइया, चोद्दसपुग्विणो अणंते केवले सिद्धा, तते णं मल्ली अरहा सहसंबवणाओ निक्खमति २ बहिया जणवयविहारं विहरइ१।
मल्लिस्सणं भिसगपामोक्खा अट्ठावीसं गणा अट्ठावीसं गणहरा होत्था, मल्लिस्स णं अरहओ चत्तालीसं समणसाहस्सीओ उक्कोसिया समण-संपया होत्था, बंधुमतिपामोक्खाओ पणपण्णं अज्जियासाहस्सीओ उक्कोसिया अज्जियासंपया होत्था, सावयाणं एगा सतसाहस्सी चुलसीर्ति सहस्सा उक्कोसिया सावयाणं संपया होत्था, सावियाणं तिन्नि सयसाहसीओ पण्णढेि च सहस्सा, छस्सया चोद्दसपुवीणं, वीससया ओहिनाणीणं, बत्तीसं सया केवलणाणीणं पणतीसं सया वेउब्वियाणं, अट्ठसया मणपज्जवनाणीणं, चोइससया वाईणं, वीसं सया अणुत्तरोववातियाणं २।
मल्लिस्स अरहओ दुविहा अंतगडभूमी होत्था, तंजहा-जुयंतकरभूमी परियायतकरभूमि य, जाव वीसतिमाओ पुरिसजुगाओ जुयंतकरभूमि, दुवासपरियाए (दुमास, चउमास-परियाए) अंतमकासी, मल्ली णं अरहा पणवीसं धणूतिमुहूं उच्चत्तेणं वण्णेणं पियंगुसमे समचउरंस-संठाणे वज्जरिसभ-णारागसंघयणे मज्झदेसे सुहंसुहेणं विहरित्ता जेणेव सम्मेयसेलसिहरे पव्वए तेणेव उवागच्छइ २ त्ता संमेयसेलसिहरे पाओवगमणुववण्णे मल्लीण य अरहा एगं वाससतं आगारवासं पणपण्णं वाससहस्सातिं वाससयऊणाति केवलिपरियागं पाउणित्ता पणपण्णं वाससहस्साई सव्वाउयं पालइत्ता जे से गिम्हाणं पढमे मासे दोच्चे पक्खे चित्तसुद्धे तस्स णं चेत्तसुद्धस्स चउत्थीए भरणीए
१८९॥

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