Book Title: Gnata Dharmkathangasutram
Author(s): Jinendrasuri,
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala
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।।२०३
जक्खेणं सद्धिं लवणसमुई मज्झमझेणं वीतीवयमाणा?, तं एवमवि गए जइ णं तुम्भे ममं अवयक्खह तो भे अस्थि जीवियं, अहण्णं णावयक्खह तो भे इमेणं नीलुप्पल-गवल जाव एडेमि, तते णं ते मागंदियदारया रयणदीवदेवयाए अंतिए एयमढे सोच्चा णिसम्म अभीया अतत्था अणुव्विग्गा अक्खुभिया असंभंता रयणदीवदेवयाए एयमटुं नो आदति नो परियाणंति णो अवयक्खंति, अणाढायमाणा अपरिजाणमण्णा अणवयक्खमाणा सेलएण जक्खेण सद्धिं लवमसमुई मज्झमझेणं वीतिवयंति १ ।।
तते णं सा रयणदीवदेवया ते मागंदिया जाहे नो संचाएति बहूहिं पडिलोमेहि य उवसग्गेहि य चालित्तए वा खोभित्तए वा विप्परिणामित्तए वा लोभित्तए वा ताहे महुरेहिं सिंगारेहि य कलुणेहि य उवसग्गेहि य उवसंग्गेउं पयत्ता यावि होत्था, हं भो मागंदियदारगा ! जति णं तुन्भेहिं देवाणुप्पिया ! मए सद्धिं हसियाणि य रमियाणि यललियाणि यकीलियाणि य हिंडियाणि य मोहियाणि यताहे णं तुन्भे सव्वाति अगणेमाणा ममं विप्पजहाय सेलएणं सद्धिं लवणसमुई मज्झमझेणं वीइवयह, तते णं सा रयणदीवदेवया जिणरक्खियस्स मणं ओहिणा आभाएति आभोएत्ता एवं वदासी-णिच्चंऽपिय णं अहं जिणपालियस्स अणिट्ठा५ निच्चं मम जिणपालिए अणिद्वे५ निच्चंपिय णं अहं जिणरक्खियस्स इट्ठा५ निच्चंपियणं ममं जिणरक्खिए इढे ५, जति णं ममंजिणपालिए रोयमाणी कंदमाणी सोयमाणी तिप्पमाणीं विलवमाणींणावयक्खति किण्णं तुमं जिणरक्खिया ! ममं रोयमाणिं जाव णावयक्खसि ? २ ।
तते णं-सा पवररयणदीवस्स देवया ओहिणा उ जिणरक्खियस्स मणं । नाऊण वधनिमित्तं उवरि मागंदियदारगाणं दोण्हंपि ॥१॥ दोसकलिया सललियं णाणाविहचुण्णवासमीस(सिय) दिव्वं । घाणमण-निव्वुइकरं सव्वोउय-सुरभि-कुसुमबुढेि पमुंचमाणी ॥२॥ णाणा-मणि-कणग-रयण-घंटिय-खिखिणि-णेऊर-मेहल-भूसणरवेणं।
दिसाओ विदिसाओ पूरयंती वयगमिणं वेति सा सकलुसा ॥३॥ होल वसुल गोल णाह दइत पिय रमण कंत सामिय णिग्धिण णित्थक्क । छि (थ) ण्ण णिक्किव अकयण्णुय सिढिलभाव निल्लज्ज लुक्ख अकलुण जिणरक्खिय मज्झं हिययरक्खगा! ॥४॥
।।२०३॥

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