Book Title: Gita Darshan Part 02
Author(s): Osho Rajnish
Publisher: Rebel Publishing House Puna

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Page 14
________________ 9 यज्ञ का रहस्य ... 127 जीवन के आत्यंतिक अनुभवों को प्रतीक से समझाना / प्रतीक अवरोध भी बन जाते हैं / यज्ञ का प्रतीकात्मक अर्थ / अग्नि की लपट - चेतना के ऊर्ध्वगमन का प्रतीक / अग्नि अशुद्धियों को जलाती है / लपट का आकाश में खो जाना / 'मैं' का 'सर्व' में खो जाना / चेतना की आग में स्वयं की आहुति / सतत स्मरण / गुरुकुल में सतत जलती हुई अग्नि / गेहूं की आहुति / अहंकार को बीजरूप में ही दग्ध कर देना / घी - स्नेह का, शुभ का श्रेष्ठतम प्रतीक / साधना का निखार / श्रम का फल / शुभ जलकर चेतना की लौ को बढ़ाता / शुभ पीछे सुवास छोड़ जाता / साधु शुभ है; और संत- शुभ की सुवास मात्र / प्रतीकों से जीवंत अनुभव को जन्माते रहना / मृत प्रतीक पकड़कर रुक जाना / प्रतीक की सार्थकता / प्रतीक में छिपे राज को बचाना. जरूरी / 'योगियों का यज्ञ' और 'ज्ञानियों का यज्ञ' – इनका क्या अर्थ है ? / दो मौलिक निष्ठाएं - सांख्य और योग / सांख्य हैं - ज्ञानाभिमुख लोगों के लिए / योग है - कर्माभिमुख लोगों के लिए / निन्यानबे प्रतिशत लोगों के लिए योग जरूरी / कृष्ण ज्ञानी और योगी दोनों हैं / रामकृष्ण ने अनेक मार्गों की साधना संपन्न की / गीता सारी निष्ठाओं का निचोड़ है / महावीर और मोहम्मद को अर्जुन न मिला / योगनिष्ठ सदगुरु — जार्ज गुरजिएफ / सांख्यनिष्ठ ज्ञानी – जे. कृष्णमूर्ति / अनेक मार्गों की बात करने के कारण मुझमें असंगति / मार्ग - विपरीत और भिन्न / मंजिल एक है / योगी का संयम और ज्ञानी का साक्षीत्व / पहले आकर्षण, फिर सौंदर्य-बोध / इंद्रियों की गति सूक्ष्म है / सब इंद्रियां स्पर्श करती हैं / छूने- छुलाने के अनेक ढंग - आवाज, गंध, प्रसाधन / इंद्रियां स्पर्श लेने व देने को सदा लालायित हैं / इंद्रियों की सूक्ष्म स्पर्श-व्यवस्था / इंद्रिय और विषय के बीच की स्पर्श-व्यवस्था को तोड़ देना / आंख से सिर्फ देखें - स्पर्श न करें / संयम अर्थात इंद्रियों से उपकरण का काम लेना- भोग का नहीं / दमन संयम नहीं है / ज्ञानी भोगते हुए भी द्रष्टा बना रहता है / दूसरे मार्ग से आत्मवंचना की संभावना / संयम की साधना सुगम है / साक्षी की साधना दुर्गम है / बुद्ध और महावीर का मार्ग संयम का / कृष्ण का मार्ग साक्षी का / गीता में दोनों मार्गों की चर्चा है। 10 संन्यास की नई अवधारणा... 141 प्रिय वस्तुएं नहीं— स्वयं को अर्पित करना / इंद्रियां बाहर, संसार में ले जाती हैं / इंद्रियों को भीतर लौटना - परमात्मा की दिशा / स्वयं को खोने की सामर्थ्य / फूल और फल — परमात्मा में चढ़े ही हुए हैं / मृत्यु जो छीनेगी, उसे जीते-जी अर्पित कर देना / योगाग्नि का क्या अर्थ है ? / घर्षण से विद्युत ऊर्जा का जन्म / शरीर के भीतर ही अग्नि पैदा करना - योग की विधि से / अंतस - अग्नि में इंद्रियों के रसों का जल जाना / वासनाओं का रसायनशास्त्र / बायोकेमिस्ट्री द्वारा शोषण का खतरा / उपवास योगाग्नि पैदा करने में सहयोगी / सूर्य पर त्राटक / ईश्वर - अर्पण-भाव से सेवा भी यज्ञ है / ईश्वर - अर्पण – योग से भी अति कठिन / सेवा के पीछे छिपा हुआ अहंकार / अहंशून्य सेवा - प्रभु - अर्पित / बुद्धि नहीं - हृदय / बुद्धि - सदा फलाकांक्षी / जीवन है— परमात्मा की भेंट / अहिंसा भी मार्ग है / जब तक वासना है, तब तक हिंसा है / आंख से भी बलात्कार संभव / अहिंसा अर्थात 'स्व' पर वापसी / दूसरे पर जाना हिंसा है / शत्रुता भी – मित्रता भी / आपके द्वारा दीक्षित नव-संन्यास क्या है ? / संन्यास अर्थात करते हुए अकर्ता हो जाना / रूपांतरण की प्रक्रिया / संसार एक प्रशिक्षण है / भागना नहीं — जागना है / मित्र वही, जो वासना के पार जाने में सहयोगी हो / संसार को सीढ़ी बनाओ / संप्रदाय-मुक्त संन्यास / स्वनिर्भर संन्यासी ही अब बच सकता है / सब को जोड़ने वाला धर्म / ध्यान से संन्यासी में रूपांतरण / ध्यान — एक मात्र अनिवार्यता / गैरिक वस्त्र - ध्यान की आग का स्मरण / माला के गुरिए - एक सौ आठ विधियां / मैं सिर्फ एक गवाह हूं / ध्यान की एक प्रगाढ़ विधि का अभ्यास / नव-संन्यासियों का कीर्तन विशिष्ट है / यह कीर्तन - ध्यान का अनुषांगिक अंग / सभी धर्म नव-संन्यासियों के अपने / व्यर्थ को तोड़ना - सार्थक को बचाना।

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