Book Title: Dandak Tatha Laghu Sangrahani
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek
View full book text
________________
सव्वधणं-सर्व संख्याए सत्तसही-सडसठ सयचउरो-चारसें.
य-वळी. विस्तारार्थः-(हिम सिहरिसु के०) हिम वलि. खरिणोः, एटले हिमवंत गिरि तथा शिखरी पर्वतने विषे प्रत्येके (श्कारस के०) एकादश, एटले अगीयार अगीयार कूट , (श्य के०) इति, एटले या रीते (इगसहीगिरीसु के० ) एक षष्टि गिरिषु, एटले एकसठ पर्वतने विषे जे (कूमाणं के०) कूटानां, एटले कूट , तेने ( एगत्ते के०) एकत्वे, एटले एकठा करीए, तो ( सवधणं के ) सर्वधनं, एटले सर्व संख्याए (सयच उरो के०) शतचत्वारि एटले चारसें (य के०) चं एटले अने (सत्तसही य के०) सप्तषष्टिः, एटले समसठ कूट थाय ॥ १५ ॥ ते आवी रीतेः
चनसत्तअनवगे,--गारसकूमेदि गुणद जदसंखं ॥सोलसदुदुगुणयालं, ज्वे य सगसहि सयचनरो ॥१६॥ गाथा १६ मोना छुटा शब्दना अर्थ.

Page Navigation
1 ... 151 152 153 154 155 156 157 158 159 160 161 162 163 164 165 166 167 168 169 170 171 172 173 174