Book Title: Arhat Vachan 1999 01 Author(s): Anupam Jain Publisher: Kundkund Gyanpith Indore View full book textPage 2
________________ आशीर्वचन सराकोद्धारक युवा उपाध्याय पूज्य मुनि श्री ज्ञानसागरजी अर्हत् वचन द्वारा 'सराक एवं जैन इतिहास विशेषांक' का प्रकाशन बहुत प्रशंसनीय एवं ऐतिहासिक महत्व का कार्य होगा। आपका यह कार्य केवल जैन समाज में ही नहीं, केवल भारत में ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व में पत्रिका का गौरव बढ़ाने वाला होगा। हमारे जो बन्धु न केवल वर्तमान में अपितु हजारों वर्षों से मांसाहारियों के बीच रह रहे हैं, जो अपने धर्मायतनों (साधुओं एवं गुरुओं) की संगति से वंचित होने के बावजूद अपने संस्कारों एवं संस्कृति को बचाये हुए हैं, ऐसे सराक बन्धुओं का जीवन जनसामान्य, विशेषत: युवाओं के लिये प्रेरणादायी रहेगा। अर्हत् वचन तो बहुत अच्छा काम कर रही है। इस पत्रिका में इतिहास एवं पुरातत्व विषयक सुन्दर, शोधपूर्ण सामग्री सदैव से प्रकाशित होती रही है और अब हमारी आपसे नई कड़ी जुड़ रही है, यह शुभ लक्षण है। सराक क्षेत्र को आप (डॉ. अनुपम जैन) से एवं आपकी पत्रिका से बहुत अपेक्षायें हैं। हमें विश्वास है कि आप इस ओर पूरा ध्यान देंगे। मेरा शुभाशीष सदैव आपके साथ है। तिजारा - 8.12.98 उपाध्याय ज्ञानसागरPage Navigation
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