Book Title: Anusandhan 2007 10 SrNo 41
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 33
________________ अनुसन्धान-४१ अनेकान्त अनुभवी/जोई शके छे (३८). ३९मी कारिकामा कर्ता पोतानुं नाम दर्शावीने समापन करे छे. विक्रमना १४मा शतकमां थयेला हर्षपुरीय मलधारगच्छीय आचार्य श्रीराजशेखरसूरिजीनी आ नानी पण बलिष्ठ रचना छे. सं. १४६५मां लखायेली 'स्याद्वादमञ्जरी'नी हस्तप्रतिना प्रान्त भागमां लखायेली आ रचना, त्यां 'स्याद्वादकलिका' एवा नामे ओळखावाई छे, एटले अहीं पण ते ज नामे ओळखावी छे. बाकी कृतिना ३७मा पद्यमां तेनुं नाम अपायुं छे - 'स्याद्वाददीपिका'. 'जैन साहित्यनो संक्षिप्त इतिहास' (मो.द.देसाई, ई.स. १९३३, पृ. ४३७), पारा ६४२) अनुसार आ. राजशेखरसूरिए चतुर्विंशतिप्रबन्ध, कौतुककथा, स्याद्वादकलिका-स्याद्वाददीपिका, रत्नाकरावतारिका पञ्जिका, न्यायकन्दलीपञ्जिका, षड्दर्शनसमुच्चय आदिनी रचना करी छे. आमां स्याद्वादकलिका अने स्याद्वाददीपिका बे नामो एक ज रचनानां होवानुं अनुमान थाय छे. केमके कृतिमां 'दीपिका' नामे प्रसिद्ध रचनाने ज पुष्पिकामां 'कलिका' एम ओळखवामां आवी लागे छे. 'जैन संस्कृत साहित्यनो इतिहास' (ही. र. कापडिया, खण्ड १, पृ. ८६)मां कर्तानी रचनाओनी यादीमां पण 'स्याद्वादकलिका' छे, 'दीपिका'नो उल्लेख नथी. आथी पण उपरोक्त धारणा पुष्ट थाय छे. आ रचना प्रगट थई छे के केम तेनी जाण नथी. प्राय: अप्रगट छे तेवी धारणाथी अत्रे आपेल छे. स्याद्वादकलिका ॥ षड्द्रव्यज्ञं जिनं नत्वा स्याद्वादं वच्मि तत्र सः । ज्ञानदर्शनतो भेदा-भेदाभ्यां परमात्मसु ॥१॥ सिसृक्षा सञ्जिहीर्षा च स्वभावद्वितयं पृथग् । कूटस्थनित्ये श्रीकण्ठे कथं सङ्गतिमङ्गति ? ॥२॥ गुणश्रुतित्रयोर्व्यादि-रूपताऽपि महेशितुः । स्थिरैकरूपताख्याने वर्ण्यमाना न शोभते ॥३॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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