Book Title: Anekant 1985 Book 38 Ank 01 to 04
Author(s): Padmachandra Shastri
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 11
________________ पं० अभ्रदेव कृत 'भावहाबलीचा तत्र पंच प्रकारेण दु:ख विसहतेस्म सा। नारकेभ्यो वधच्छेद बंध ताड़न मारणम् ॥३१ शूलिका रोपणं तीवां वेदनामग्नि पातनम् । रासमारोहणं गात्र खण्डनं यंत्र पीलनम् ॥३२ भोजनं विहितं तस्याः स्वकीय रुधिरैः पलैः । शयनं कंटकाप्रेषु, कीलकेषूपवेशनम् ।।३३ आयुरुत्कृष्टतो भुक्त्वा तया निःसरितं ततः । पापिष्टया महात्यन्त दुःख राजी समाकुलम् ।।३४ रासभी शूकरी व्याली, मार्जारी सर्पिणी तथा। चण्डालिनी तथा तस्य जाता दुःख परम्परा ॥३५ अनादिकाल संसृत्या जीवेनाजितमात्मना । मनुष्य भव मासाद्य यत्पुण्य कस्यचिद् गृहे ॥३६ तस्य पुण्यस्य महात्म्य, सयोगेन महीपते । तव गृहे पुनः जाता शुभनामा शुभस्थितिः ॥३७ उपसर्ग त्रयेणासोन्मुनीन्द्रस्य महात्मनः । शीलमत्यां त्वदीयायां पुश्यां दोषत्रयावली ॥३८॥ केवल ज्ञान सम्प्राप्ति पिहिताश्रव संयते । बभूव तद् मोक्षं गामिनः पूजित: सुरैः ।३६॥ ततः पाद द्वयं नत्वा श्रवणस्य महामुनेः । उवाच वचनं शुद्ध नर ब्रह्मा नरेश्वरः ॥४०॥ कथं महामुने ! पुत्री मदीया निस्तरिष्यति । कल्मषं गात्र सकोचं समर्थ कर्तुमुद्यतम् ॥४१॥ अथावाद्य विनिर्मुक्त मब्रवीद् वचनं मुनिः। तद् व्रतं श्रूयता राजन् येनेयं स्वगंजाभवेत् ।४२॥ मासे भाद्रपदे शुक्ले, पक्षे च द्वादशी दिने । करोत्येव नरो नारी श्रवण द्वादशी व्रतम् ॥४३॥ प्रोषधस्योपवासेन ब्रह्मचर्यस्थ कर्मणा । जिनवास निवासेन तद्दिने क्यिते व्रतम् ॥४॥ प्रभात समये स्थाने प्रासुके जिन मूर्तयः । चतुर्दिक् कुर्वश्चापि स्थापनीया जिनालये ।४५॥ पूजा चाष्ट निधा कार्या स्नपनेन जिनेशिना । साधं महाभिषेकस्य संसारास्थिति भेदिनी ॥४६॥ जल गन्धाक्षतं पुष्पश्चरु दीपोर्ध्वगः फले।। मध्यान्हे चाष्टकं देयं सामयिक पुरस्सरम् ।४७। अपराजित मंत्रेण करणीयस्त्रिशुद्धिपः । साय जाप्य विधि जाती शतपत्र सरोरुहैः ।४। जलगालन वस्त्रेण छादिनस्तोय पूरितः । जिमाने करको देय बीजपूर समन्वितः ॥५६ दातव्यो| जिनेन्द्राणां कुष्माड फल शोभित । जिनाग्रे दीयते साधं भ्रामरी जय मालया ।५०। जय तर्क विसजित कुमतवाद, जय सकल सुरासुर विनुतपाद । जय परम योग निर्मल विचार, जय चरणाहत ससार भार ५१॥ जय निजित मिथ्यावचन बोध, जय सुविहित विपदिन्द्रिय निरोध । जय केवल लक्षित जीव बध, जय सुधागम कृत सत्य संधः ।२। जय खण्डित कर्मा राति देह, जय परिहरिताखिल दिव्य गेह। जय लोक समुदरणक धीर, जय पाप निराकरणक वीर ॥३॥ जय मोह वृक्ष भेदन कुठार, जय मुक्ति पुरधी हृदयहार । जय छिन्न भिन्न कन्दर्प सार, जय रागद्वेष मद बल प्रहार ॥५॥ जय रलत्रय भूषित शरीर, जय मार विशोषित विषय नीर। जय विगलित मद निचयप्रमाद, जय करुणा भस्मित रति विषाद ॥५॥ जय लोक त्रय भवदीय रेष, जय निर्दित पर सग्रंथ वेष । जय कांचन मेरु पवित्र करण, जय बोधि समाधि विशुद्धिकरण ॥५६॥ जय शत्रु मित्र सम हेम लोह, जय दूरी वासित पाप रोह । जय सकल विमल केवल विलास, जय सहज बुद्धि हंसी मराल ।५७। जय सप्त पंच षण्णव चरित्र, जय सव्यंजन लक्षण चरित्र ५। इत्यादि जयमालायाः स्तोत्रेणा! जिनेशिनाम् । दत्वा प्रदक्षिणास्तिस्रः समुत्तायौँ नराधिपः ।५।।

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