Book Title: Anekant 1985 Book 38 Ank 01 to 04
Author(s): Padmachandra Shastri
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 56
________________ भ. महावीर जन्मस्थान विषयक विवाद O. ज्योतिप्रसार जैन कैसी विचित्र बात है कि प्राचीन भारत के सर्वमहान के विषय में कई-कई मत भेद है-निर्वाणभूमि पावा या परम पुरुषों में परिगणित निग्रन्थ-श्रमण जैन परम्परा के पावापुरी के कम से कम चार विकल्प सामने बाये, अन्तिम तीर्थकर निग्रंन्य-शातपुत्र भगवान वर्धमान केवलज्ञानस्थल, ऋजुपालिकानदी तटवर्ती भिकग्राम के महावीर (५६९-५२७ ईसापूर्व) जैसे असदिग्ध रूप से बहिउंद्यान की स्थिति मात्र अनुमानाधारित है, और ऐतिहासिक व्यक्तित्व के पावन जीवन से सम्बद्ध प्रमुख ज्ञातृखण्डवन नामक उनकी दीक्षाभूमि को क्योंकि जन्मस्थानों की पहचान अभी तक सुनिश्चित नहीं हो पाई- भूमि कुण्डपुर का निकटस्थ बन सूचित किया गया है, उनकी जन्मभूमि, दीक्षावन, कैवल्य प्राप्ति स्थान और जन्मभूमि की मान्यता के सान्यता के साथ ही उसके भी निर्वाण भूमि की सही-सही चिन्ह आज भी विवाद का तीन विकल्प हो जाते हैं। छदमस्थकाल तया तदुपरान्त विषय बनी हुई है। उनका जीवन, व्यक्तित्व एव कृतित्व भी उन्होंने किन-किन स्थानों में विहार किया, या कहांआधुनिक इतिहास वेत्ताओ की दृष्टि से भी प्रमाण सिद्ध कहां उनका समवसरण गया, तविषयक पर्याप्त ऊहापोह शुद्ध इतिहासकाल की परिधि के भीतर आते हैं। उनके के पश्चात भी उनमे से अनेक स्थानों की पहिचान सुनिनिर्वाणोपरान्त के गत अढाई सहस्र वर्षों में उनकी शिष्य श्चित नहीं है-केवल राजगृह (वर्तमान पटना जिले का परम्परा के आचार्यों की तथा उनके द्वारा पुर्नगठित मुनि- राजगिर) अपरनाम पवशीलपुर, जो महावीर युग में आयिका-श्रावक-श्राविका रूप चतुर्विध सघ की परम्परा मगधदेश एवं साम्राज्य की राजधानी थी, और जिसके प्राय: सम्पूर्ण भारत महादेश व्यापी होकर अविच्छिन्न विपुलाचल, वैभारगिरि आदि पर भगवान का समवसरण रहती आई है। प्राप्त शिलालेखो मे उनके उल्लेख ई० पूर्व अनेक बार जहा और उनका लोक कल्याणकारी दिव्य पाचवी शती से उनकी प्रतिमाएँ अथवा कला में उनके उपदेश हआ, की पहिचान एवं स्थिति ही सुनिश्चित है। मूत्तीकन तीसरी शती ई० पूर्व से और लिखित साहित्य उपरोक्त प्रान्तियो का एक कारण तो शायद यह में भी ईस्वी सन् के प्रारम्भ के पूर्व से ही उनके उल्लेख रहा कि भगवान महावीर की परम्परा के प्रारम्भिक तथा जीवन की घटनाओ के सन्दर्भ मिलने लगते हैं- आचार्य, कमसे कम लगभग छ:-सात शताब्दियो पर्यन्त, जैन साहित्य में ही नहीं, ब्राह्मण एव बौद्ध परम्परा के सर्वथा निरारम्भी निष्परिग्रही ज्ञान-ध्यान-तपोरत निग्रन्थ प्राचीन साहित्य में भी उनके उल्लेख प्राप्त होते हैं। वनवासी सन्त रहे, जिनका लोकसंग्रह तथा स्थूल इतिहास उनके पचकल्याणक स्थान भी पवित्र तीर्थ क्षेत्रो के रूप मे जैसे लौकिक ज्ञान के प्रति उपेक्षा भाव रहा । अतएव, वन्दनीय रहते आये हैं । देश के अनगिनत जिन मन्दिरो मे यद्यपि उस काल मे भगवान महावीर से सम्बद्ध स्थान जैन परम उपास्य के रूप मे उनकी प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। धर्म के प्रमुखगढ़ या केन्द्र रहते रहे, तत्सम्बन्धित भौगोविभिन्न प्राचीन एव अर्वाचीन भाषाओ तथा विविध लिक एवं ऐतिहासिक सूचनाएँ भावी सन्ततियों के लिए शैलियों में रचित उनसे सम्बन्धित साहित्य भी विपुल हैं। सुरक्षित नही रह पाई। दूसरे, उक्त काल के उपरान्त, किन्तु जबकि उनके पूर्ववर्ती ऋषमादि-पार्श्वनाथ पर्यन्त जब जैनाचार्यों की ऐतिहासिक जिज्ञासा जागत भी हुई तो २३ तीर्थंकरों के जन्म-दीक्षा-ज्ञान-निर्वाण स्थल, एकाध वे स्थान काल दोष से-प्राकृतिक, आपिक आदि अनेक अपवाद को छोड़कर, प्रायः असदिग्ध रूप से सुनिश्चित कारणों से-जैनजनशून्य हो गये, उनमे जो सुन्दर एवं रहते आये हैं, स्वय भगवान महावीर की जन्मभूमि विशाल महानगर थे वे भी अधिकांशतः ध्वस्त एवं निर्जर दीसावन, कैवल्य प्राप्ति स्थल और निर्वाण क्षेत्र की स्थिति होकर शनैः-शन: विस्मृति के गर्भ में विलीन हो गये

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