Book Title: Anekant 1985 Book 38 Ank 01 to 04
Author(s): Padmachandra Shastri
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 111
________________ अनेकान्त वर्ष । किरणYJ वी. नि० सं० २५१२ वि० सं० २०४२ तू०-दिसम्बर १९८५ अनुकूलता-प्रतिकूलता हरिकृष्ण दास 'हरि' जीवन में कुछ अनुकूल होता है, कुछ प्रतिकूल । मन चाहता है-सब अनुकूल ही अनुकूल हो। क्या यह संभव है ? क्यों नहीं? तनिक गहरे जाइये। सब में सब है । प्रत्येक अनुकूल भी है, प्रतिकूल भी। अनुकूलता के पीछे से प्रतिकूलता झांक रही होती है और प्रतिकूलता के पीछे से अनुकूलता। सोलहों आने अनुकूलता है न प्रतिकूलता। मन की दृष्टि दोषपूर्ण है। इसलिए मनचाहा नहीं होता। शुद्ध दृष्टि सब देख सकती है और सब नहीं भी देख सकती है। जब जो जितना चाहिए, वह देखती है और जब जो जितना नहीं चाहिए, नहीं देखती है। मन की दृष्टि शुद्ध होते ही मनचाहा हुआ धरा है। प्रतिकूलता में अनुकूलता है ही। तब सहज उसके दर्शन कर सकेंगे और फलतः कूलना छूट जायेगा। जरा और समझदारी से काम लेने पर अनुकलता में प्रतिकूलता के भी दर्शन कर सकेंगे; फलस्वरूप फूलने से बचे रहेंगे। स्मरण रहे-कूलना कमजोरी लाता है और फूलने से गुब्बारे की तरह फट कर रह जाना पड़ता है। इतना करने पर एक और बात भी होगी। तब आपको सहज समता सून्दरी के दर्शन होंगे और जो आपमें उसे प्रेम के दर्शन हए, तो वह आपको वर भी लेगी। फिर तो सहज नित्य-निरन्तर पौबारह ही रहेंगे। क्यों, क्या नहीं ? और चाहिए भी क्या? -कूचा पातीराम, दिल्ली-६

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