Book Title: Anekant 1985 Book 38 Ank 01 to 04
Author(s): Padmachandra Shastri
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 90
________________ अनेकान्त स्वतन्त्रता प्राप्ति (१९४७ ई.) के उपरान्त आधुनिक युग अर्थात् जाति नाम-कर्म के उदय से होने वाली मनुष्यकी नई परिस्थितियों मे उसमे और अधिक वेग आया। आति है। प्रचलित जाति-उपजातियां परिस्थितिजन्य है, प्रतिक्रियावादियों के भरपूर प्रयत्नों के बावजूद आज का मनुष्यकृत हैं; कृत्रिम और काल्पनिक है-वे प्राकृतिक या जनमानस सामाजिक कुरीतियों और धार्मिक शिथिनाचार शाश्वत नही हैं। अनेक प्राचीन जातियां समय के गर्भ में के प्रति सजग हो गया है, और व्यवहार में जाति-पाति विलीन हो गयी या अन्य जातियों में अन्तर्युक्त हो गई, के पुराने बधन बहुन ढीले पड़ते जाते हैं। वस्तुत. आज तो और अनेक नवीन जातियां-उपजातियाँ उत्पन्न होती रही विश्वमानस अन्तर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, प्रादेशिक, सामाजिक, है। अतएव धार्मिक दृष्टि से, धार्मिक समाज के संगठन साम्प्रदायिक प्राय सभी स्तरों पर जातिवाद के भेदपरक की दृष्टि से, व्यक्ति और समष्टि के हित में, कम से कम एवं पृथकतावादी दूषगों का विरोधी हो उठा है। यह समस्त साधर्मी जन तो उक्त भेदभावों से ऊपर उठकर समय की मांग है। अपने संगठन को अखण्ड एव सौहार्दपूर्ण बनाये रक्खें, यह आवश्यक है। तीर्थकर नामा सर्वातिशय पुण्यप्रकृति के वस्तुतः, धर्म तो मनुष्यो के जोड़ने के लिए है, तोड़ने आस्रव एव वन्ध को कारण सोलह-भावनाओं में परिगणित के लिए नही, जबकि प्रचलित जाति-उपजातिवाद एक ही साधर्मी-वात्सल्य भावना का महत्त्व इसी दृष्टि से आंकना धर्म के अनुयायियों में और एक ही राष्ट्र के नागरिको मे उचित होगा। परस्पर फूट डालकर विघटन का पोपण करता है। जैन सिद्धान्त के अनुसार तो सभी मनुष्यो की एक ही जाति ज्योति निकुंज, चार बाग, लखनऊ एक दिन तुमसे मिलगी Oडा. सविता जैन सम्यक्त्व की राहों पर चलकर, रास्ता यद्यपि कठिन है, एक दिन तुमसे मिलंगी ॥ लोन को ऑधी प्रबल है। यद्यपि तुमको जानती हूं, छा रहे घन मोह-तम के, पर नहीं पहचानती हूं। क्रोध की बिजली चमकती। चोन्ह ही लगी तुम्हें मैं मोह की गहरी है बलबल, वीतरागी लौ जला कर। काम के निशिचर है प्रहरी। सम्यक्त्व की राहों पर चलकर, निर्जग का पुल बना कर, एक दिन तुमसे मिलूंगी ॥ पार इन सब को करूंगी। सम्यक्त्व .. इन्द्रियां भटका रही हैं, अहं का मद पिला रही हैं। पर नहीं होने मैं बुंगो, इनका यह षड्यन्त्र हाबी। पंच मदों को जलाकर, भस्म मैं उनकी पीयूंगी ॥ सम्यक्त्व... ७/३५ दरियागंज, नई दिल्ली-२

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