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प्रेषक नाम :: पता:
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प्रति, डॉ.अ.म., घाटगे भांडारकर प्राच्यविद्या संशोधन मंडल, पुणे ४११ 008 (भारत)
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सर्वसमावेशक सु विस्तृत प्राकृत शब्दकोश के लिए प्रश्नावली विव्दानोसे प्रार्थना है कि वे इस प्रश्नावली में प्रस्तुत मुददोंपर जहातक हो सके अपने . स्पष्ट एवं निश्चित अभिमत व्यक्त करें। प्रश्नावली में समाविष्ट न किये गये विषयों. पर भी अपने पर्यायी सुझाव भेज सकेते है। कितने प्रश्नों के जबाब देने है, सो उनकी इच्छा पर निर्भर है। शीघ्रतापूर्वक भेजे जबाबों का स्वागत होगा।'
। विस्तार प्राकृत भाषाओं के सभी शब्दों का समावेश करनेका विचार है। नियमोके स्पष्टीकरणार्थ वैयाकरणों द्वारा प्रस्तत सभी शब्दों का समावेश करना क्या आवश्यक मानते है ? यदी हाँ, तो विना संदर्भक उनके निश्चित अर्थ देना कहातक संभवनीय है , उच्चारण में समान किन्तु व्यत्पत्ति एवं अर्थ में भिन्नता होनेसे अर्थक अभावमें उनको कहीं स्थान
दिया जाये । २.. कोशमैं अन्तभाव करनेके लिए काल मर्यादा
निम्नतम क्या हो १ सन १५00 यह निर्णायक मर्यादा कहातक उचित होगी। इसके बाद हुए ग्रंथ, जो अन्तर्भत किये जाये, आप कृपया साचित करे। उपलब्ध साहित्य में जिनका प्रयोग न भी मिलता हो, ऐसे प्राकृत व्याकरणों में यत्र तत्र उल्लिखित सभी धात्वा देशों का कोश में
अंत भाव करना कहातक उचित होगा ? ४.. कोशों में देशी शब्दों के अर्थ संस्कृत में दिए
गये है। साहित्य में प्रयोग के अभाव में उनके सर्वसामान्य संस्कृत प्रतिशब्द दिये जाएँ या
सभी अर्थ १ ५. अशोक के शिलालेखों का अन्तभाव इस कोश में
न करने में सुविधा होगी, कारण कुछ अपवादों के अलावा उनका अध्ययन एवं सूचीकरण हो चुका है। क्या अन्य प्राकृत शिलालेखों का अन्तभाव किया जाए १ उनका समावेभ किस प्राकृत भाषामें हो १ -हस्व दीर्घ स्वरों एवं एकाक्षर या .
3.
उपर
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२
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दित्वव्यंजन के द के अभावात्मक खदाई के कारण प्राकृत शब्दों मे उनका अन्तभाव होना क्या ठीक होगा १ ७. संस्कृत नाटय साहित्य के प्राकृत शब्दों का
एवं परंपरागत भाषाओं में निर्धारण किया जा सकता है, परन्तु अलंकार शास्त्र, प्रबंधीचरित्रों में यत्र-तत्र उपलब्ध शब्दों के बारे में कौनसी नितिबरती जाए ? धवला, जयधवला एवं महाधवला जैसे ग्रंथो में दिगद धिीत शब्दोंतक ही सीमित विचार क्या
ठीक होगा। ९. जो पुस्तकें संस्कृत एवं प्राकृत में मिश्रित है,
उनमें से साहित्य का संचयन किस प्रकार किया जाए १ जब दीर्घ फखरे तथा प्रकरण प्राकृत में होते है, तब वे अलग कर के प्रयक्त किए जा सकते है, परन्तु कुछ चाणियों में एकही वाक्य अंध अंशतः प्राकृत एवं अंशत: संस्कृत में हो तो उध्दरण
किस प्रकार किया जाए ? १०. बिना लंबाई का विचार किए लौकिक एवं.
तांत्रिक न्याय का समावेश करें ? क्या प्राकृत साहित्य में कथाओं पर आधारित न्याय बहुलता से पाये जाते हैं, क्या उनका अन्तर्भाव किया जाए १ बिना कहा नियाँ जाने वे समझ में नही आ सकते, तो क्या कहानियां भी अन्तर्भूत की जाएँ ? लिए गये उध्दारणों के बारेमे क्या सभी के अनुवाद देना आवश्यक है १ या कुछ एकों के अथवा शंकास्पद बाबतों में ही सिर्फ अनवाद
दिये जाए? २. जिनका उदगम ज्ञात न हो. तो वैसा स्पष्ट
उल्लेख किया जाए या अज्ञात उदगम की बाब
पाठकी के तर्क पर छोड दी जाए ? १. दिपदीय एवं . १३.. संस्कृत के अलावा अन्य भाषाओं से लिए गये
पब्दिों के बारेमें वैसा उल्लेख करना क्या
आवश्यक है ? - १४. द्विपदीय एवं त्रिपदीय सामासिक शब्दों.
जिनमें प्रथम पद का तृतीय पदसे सीधा सम्बन्ध हो, वो अन्तभाव का समर्थन किस प्रकार किया जाए ?
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३ -
स्थानांग समवायांग नदीसूत्र आदि जैन साहित्य में द्विभाजन प्रक्रिया से बने हुअ दीर्घ सामासिक शब्दों के बारे में आपका अभिमत क्या है ?
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सन्दर्भ शब्द
१५. प्राकृत शब्दों की व्युत्पत्ति स्पष्ट हो इस लिए समानार्थी संस्कृत शब्द पृथक्करण एवं अवतरण चिन्हों के साथ देना सोचा गया है । देखिए मैक्डोनेल की फन्साईज संस्कृत डिक्शनरी " ऐसा करने से क्या उदिदष्ट साध्य होगा १ यथा सम्भव उच्चारण- चिन्हों का प्रयोग करे क्या १
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एम. मैय- होफर का पाली शब्दसूचि (Hand buch des Pali II) की तरह व्यत्पत्ति के बारे में संस्कृत के अलावा अन्य भाषाओं का आश्रय लेना कहाँ तक उचित होगा ?
१६. संदर्भ शब्द कोश में प्रातिपादिक स्वरूप में दिया जाए या प्रथमा एकवचन में १ यदि प्रातिपदिक स्वरूप में देना पसन्द हो तो जिनके दीर्घ स्वर प्रथमा एकवचन में -हस्वीभूत (उदा.- कहा का कह: ) हो जाते है, ऐसे अपभ्रंश शब्दों के बारे में क्या किया जाए ? उनका उल्लेख स्वतंत्र रूपसे करे क्या ?
१७. मत्वर्थीय इन प्रत्यय युक्त संस्कृत शब्दोंका मूल रूप कैिनसा स्वीकृत हो ? प्राकृत में उनका अन्त्यस्वर इ हो या ई ?
१८.. काव्य या स्तोत्र अन्तर्गत भाषा लेख के अवतरण विना संस्कृत प्रतिशब्दों के किस प्रकार उद्धृत किये जाए ? प्राकृत का विशिष्ट पर्याय किस प्रकार सूचित करे ?
१९. क्लिष्ट शब्दों के बारे में कौनसी नीति का अवलंब करे ? उनका विभाजन करके मूल रूप से यथा स्थान करें ? या एकही स्थानपर विभिन्न अर्थ दें ? सभंग रेषयुक्त अर्थों के बारे में खास विचार करना है ।
२०. समानोच्चारित शब्दों की विभिन्नता किस प्रकार दिग्दर्शित हो १ उनके व्याकरणान्तर्गत रूप या संस्कृत संवरूप भिन्न हो तो वह दिग्दर्शित करना आवश्यक है १
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समास के कारण समानोच्चारित बने शब्दों का दिग्दर्शन कैसे हो ? छोटी त्रोटक रेषा के द्वारा देवनागरी लिपि में समासत्व दिखाया जाये इसके लिए यदि hypher प्रयुक्त करना हो तो कैसे सूचित करें १
२१. नामों से बने क्रिया विशेषणों को नामों में ही सम्मिलित किये जाएँ या क्रिया विशेषण के तौर पर विविक्त रखें ?
२२. धातु (क्रिया) किस प्रकार में दिये जाएँ ? प्राकृत भाषा शास्त्र के अनुसार स्वरान्त रूप दें या critical pali Dictimany की तरह तृतीय पुरुष एकवचन के रूप में दें?
२३. क्रिया (धातु) के स्वरूप किस प्रकार हो ? प्राकृत में देना हो तो वे सभी स्वरान्त हो ? अकारान्त क्रियाओं के सुणह, सुणेह जैसे भिन्न रूप हो तो इन दो प्रकारों में भेद किस प्रकार बनायें ?
२४. संस्कृत में गण एवं पद सहित क्रि याओं (धातुओं) की विशेषितानुसार उल्लेख होता है । किन्तु प्राकृत में वैयाकरणों ने गण तथा पद का उल्लेख नहीं किया है । अतः गण या पद का उल्लेख न किया जाए
इससे आप सहमत है ? अन्य कोई विभाजन प्रकार का विचार करें क्या १
२५. प्रयोजक, कमणि, इच्छार्थक आदि क्रियाओं के दुय्यम रूप स्वतंत्र रूप से दिये जाएँ ? या क्रिया के अंतर्गत ही वे दिए जाएँ ? अन्यान्य स्थानों पर भाषाशास्त्रीय बदलाव के कारण मूल क्रिया रूपसे वह विलग हो जाता है ।
२६. उपसर्ग युक्त क्रियाएँ स्वतंत्ररूप से दें १ या मूल क्रिया में ही उनका अन्तर्भाव करें. १
२७. नाममात्र उपपद या गति क्रिया के पूर्व आने पर उनका अलग प्रयोग न करें तो चल सकता है क्या ?
२८. त, ता (या) त्तण जैसे प्रत्ययों द्वारा साधित होना आवश्यक है ? विशेषता का दिग्दर्शन उल्लेख या अवतरण
शब्दों का अलग अन्तर्भूत २९. किशान्तर्गत शब्दों की करते समय वैयाकरणों के आवश्यक है क्या ?
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- ५ - II शब्दों का वर्गीकरण
३0. व्याकरणात्मक रूपों के वर्गीकरण के बारें में
कौनसा तरीका अपनाया जाए १ यो स्पीय व्याकरण की तरह आठ जातियां लें या संस्कृत के अनुसार नाम, क्रियाएं एवं अव्यय ले १ या अन्य किसी समन्वयात्मक पध्दती
का अवलंब किया जाए ? ३१. केवल नाममात्र दर्जे के अनुसार पब्दिों की
जाति निर्णित की जाए क्या १ आवश्यक या सुविधाजनक महसूस होने पर शब्द . संबन्ध या शब्दरचना की तला न ले तो
चल सकता है क्या ? ३२. नामों या क्रियाओं को छोड किया विशेषण
कृदन्त, परसर्ग, उपसर्ग आदि के लिए अविभक्तिक संज्ञा से काम चल सकेगा १ जिनके अन्यान्य रूप बनते है ऐसे विशेषण सर्वनाम संख्या विशेषण आदि का अन्तभाव नाम-वर्ग में करे क्या ?
रूपों की नोध ३३. क्रियाओं के विभिन्न रूपों की सिर्फ नोंध
की जाए या उनके पुरुष, वचन, काल आदि
के प्रयोग भी दिये आएं १ । ३४. क्रियाओं के रूप देते समय केवल अनियमित वा . पर्यायी रूपों की ही नोंध सिमित हो ? क्या नामों के स्पों के बारेमें भी यही तरीका
अपनाया जाएँ ? ३५. नामों के सभी रूप एकही स्थानपर दिए जाएं
या उदाहरणसहित विभक्ति एवं वचन के। अनुसार विविक्त अर्थों में विभाजित किये जाएं १ देखिए क्रिटिकल पाली डिक्शनरी में "आकार" [
शुध्दिलेखन पध्दति ३६.. विचार यह किया गया है कि प्रथम प्राकृत
ब्द एवं तदनंतर तत्सम संस्कृत पाब्द देवनागरी में दिये जाएं । तो क्या प्राकृत एवं तत्सम संस्कृत शब्दों के रूप भी देवनागरी में देना आवश्यक है ?
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३७.. यह ठीक है कि हेमचंद्र के यनति के नियमा
नुसार वह अ अधवा आ के बाद लिखा जाए। उस नियम का पालन करना क्या आपको पसन्द है १ अथवा सभी स्थानों पर उसका उपयोग करना आपको मंजूर है ? यति को प्राकृत भाषा की विशेषता मानकर केवल जैन साहित्य में ही उसका स्वीकार किया जाए और नाटाकेंसहित अजैन साहित्य में वह दर्लक्षित हो १ ससंगति कायम रखने के लिए अन्य
कोई तरीका है ? ३९. आगमों अकारान्त नामों के रूप एकारान्त
एवं ओकारान्त पाये वाते है। इन दोनों के रूप केवल अर्धमागधी के एवं जैन शौरसेनी के स्वीकृत स्वीकृत करना कहाँ तक उचित होगा १ यह खेद शंच ग्रंथ प्राचीन या अवींचीन हो अथवा गदय वा पदय
से संबन्धित नहीं किया जा सकेगा। ४०. स्वरों के अनुवा सिकीकरण की विशिष्टता मान्य
करने से शब्दान्नक्रम पर कोई परिणाम नही होगा किन्तु अनुस्वार यदि एक वर्ण मान्य हो तो उसका शब्दानुक्रम पर परिणाम होगा। क्या यह आपको.... मान्य है ? यदि न हो तो आप कौनसा पर्याय
सूचित करेंगे? ४१. न एवंण प्रयोग यदि एकाध नियम व्दारा
'निश्चित कर लें तो मान्य विकल्प के उध्दरण का अमान्य विकल्प के साथ उल्लेख करना क्या
आवश्यक होगा ? ४२. शब्दों के अधिक पर्याय यदिलेने हो तो अधिक
भिन्न शबदों का कोश में अन्तर्भाव करना पडेगा उदा.- "नयन" के नयण नअण णयण, णअण हृदय के हियय, हिअय, हिअअ, हिअं। फिर भी
प्रमुख शब्द का चुनाव करना अनिर्णित रहेगा। ४३.
महाप्राण व्यंजन की द्विरूक्ति में अल्पप्राण को महाप्राण के साथ जोडकर लिखना पडेगा। इससे
अक्षरानुक्रम साध्य होगा | क्या यह उचित होगा? ४४. प्राथमिक अवस्था में यदि कोई वणे मान्य
रखा जाये, तो क्या सभी अवस्थाओं में वही पध्दति स्वीकृत करनी होगी ?
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४५.. न(न्न), ज (ण) के लेखन में प्रचलित
विभिन्न प्रकारों में से आप किसे मान्य रखेग १ अ. आदय न एवं ण विभिन्न कृतियों में
जैसे पाये जाते है अथवा "पाइयसददमहण्णव" के अनुसार सभी "ण' में लिए जायें ? संस्कृत के हो या न हो """ पर से न्न एवं पण ? उदा. वर्ण का वण, किन्तु प्रज्ञा का
पणा। ४६. प्राकृत वैयाकरणों ने जिसका उल्लेख नहीं
किया है, परन्तु प्राकृत साहित्य के हस्त लिखितों ने अनेक बार पायी जानेवाली तश्रुति के बारे में आपकी क्या राय है ? अ. मूल संस्कृत शब्द में त हो तो मात्र वह
वैसाही रहने दिया जाए १ ब.. अथवा ऐसे सभी त के ऐवज में य का प्रयोग
किया जाए ? क. हस्त लिखितों एवं संपादित ग्रंथी में विना
कोई भेदभाव के प्रयुक्त हो तो लिखित त या य अथवा य का त में हम रूपांतर करे
क्या १ इ. विभिन्न ग्रंथों में सि प्रकार पाये जाते • है, उसी प्रकार उनका उपयोग करने में
सतत पुनरावृत्ति एवं अर्थहीन गडबडी नहीं
होगी ? इ. त का लिखना भाषा की प्राचीनता से कोई
संबन्ध रखता है १ वह पुरानी प्रथा जारी
रखना है या संस्कृत का प्रभाव है ? फ जैसा कि य के बारेमें होता है। अक्षा के
उपर या नीचे नक्ता टेने जैसा केई मार्ग
आप सूचित करेंगे, १ . ४७. सामासिक शब्दों में से लियाढिवा संयुक्त
व्यंजन शब्दारंभ में वैसा ही रखें क्या ?
कुछ कोशों में इस तरह किया गया है। ४८. -हस्व ह एवं -हस्व ए के उपयोग के बारे
में सामान्य नियम आप स चित करेग १ इसके
लिए आप कोई तरीका सूचित करेगे १ ४९. मूल ह से प्राकृत में आया हुवा ह, संयुक्ताक्षर
पूर्व का ई प्राकृत में बना ह, -हस्व ए के, लिये लिखा जानेवाला -हस्व ह इनका भेद
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दशान के लिए क्या व्युत्पत्तिशास्त्र का - आश्रय लिया जाए १ उदा.- इत्थ, एत्थ, इत्थी
उ एवं ओ के बारे में भी वही लागू होगा । ५०. जब सामान्य नियम काम आता हो, तब
संयुक्ताक्षर पूर्व -हस्व या दीर्घ ए तथा ओ
में फर्क करना क्या आवश्यक है ? ५१. अन्तिम अनुस्वार तथा बाद में आये हुए
अनुनासिक एवं न्न, पण म्म जसे द्वित्व अनुनासिक में भेद करना क्या आवश्यक है ? संस्कृत के संख्याबध्द संयुक्ताक्षरों से आगत द्वित्वभत अनुनासिक का प्रयोग करना क्या आप पसन्द करेगे या अनुस्वार १ अनेक संपादक सप्तमी एकवचन का प्रत्यय म्मि लिखना पसन्द करते है।
अकारादिक्रम ८१२. बहुतांश शब्दों के बाद संस्कृत प्रतिशब्द दिये जाने के कारण अक्षरानुक्रम यथासम्भव संस्कृत
रखना उचित होगा । कुछ कुछ बदल करना भी जरूरी होगा। ५३. विसर्ग के अलावा प्राकृत की सर्वसाधारण अक्षर. रचना संस्कृत से मिलती जलती कोश में उप'यो जित है । सरसरी तौर पर इसी का अनुसरण होगा | अधिक उपयुक्त सुधार संभवनीय हो तो
कृपया सुझाएँ। ५४. अनुनासिक एवं अनुस्वार इन दोनों के लिए
अनुस्वार का ही उपयोग सर्वत्र किया जायेगा। क्या आप इससे सहमत है १ अथवा विराम चिह्न के पूर्व परसवर्ण, एवं उष्मवर्ण, अर्धस्वर तथा महा
प्राण के पूर्व अनुस्वार देना आप पसन्द करेगे ? ५५. मूल पब्दिरूप के बाद तुरन्त अनुस्वार आयेगा,
फिर उसका उद्भव कहीं से भी हो बिना अर्थ का विचार किये इसि के बाद इसि, सम्म के बाद सम्म आयेगे. क्या यह लिखना स्वीकार्य होगा ?
५६. संस्कृत के अनुस्वार ळ को ल माना जायेगा और
वही उसका अक्षरानुक्रम रहेगा ।
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५८.
१७. सभी जगह अनुस्वार उपयो जित होने
पर भी परसण का निर्धारण कर उसको स्थान दिया जायेगा। -हस्व ए एवं ओ तथा दीर्घ ए एवं ओ अक्षरानुक्रम के लिए समान माने जायेगे । 'तिर्फ उच्चारण भेट की निशाणी द्वारा
फर्क बताया जायेगा। ५९, विराम चिह्न के पूर्व के म को अनस्वार
लिखना आप पसन्द करेंगे या संस्कृत की तरह म् लिखना ?
जननकारी
जान कारी ६०. शब्दकोश ज्ञानकोश से भिन्न है, यह विचार
मे. लेते हुए सांस्कृतिक जानकारी का किस प्रमाण में कोश में अन्तभाव किया जाये ? अ. व्यक्तियों के नाम ब. ग्रंथ, प्रकरण, सूक्त आदि के नाम क. प्रासाद, उद्यान आदि के नाम
ड लेखकों के नाम ६१. वाक्प्रचारों का कहाँतक उपयोग किया
जाये १ इस बारे में कोई नियम बनाये जा
सकेग १ . ६२. धब्दों, खास कर सामान्य कोशा के शब्दों,
के संदर्भ देना जरूरी है क्या ?
अ
थे
६३. खगोलशास्त्र गणित, तर्कशास्त्र, दीनशास्त्र,
कर्मकांड, कर्म सिध्दान्त, काव्यशास्त्र, नाटय शास्त्र, कला, शिल्पकला, ज्योतिष के शिष्ट शब्दों का खास एवं तान्त्रिक अर्थ देने पर "यह आगमिक पशब्द है" इस प्रकार के विधान की क्या उपयोगिता है ? विशिष्ट ग्रन्थों में पाये गये शब्दों को इस प्रकार बताना क्या आवश्यक है १ सयोग्य प्राकृत अवतरणों के अभाव में तान्त्रिक शब्दों का स्पष्टीकरण करने के लिए संस्कृत अवतरण दें क्या १ ।
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६५. अनेकार्थक शबदों के विभिन्न अथा की
जानकारी देना मद्देनजर रखते हुए उनका शाखाबध्द विभाजन करना आवश्यक है। तीन प्रकार के क्रमांक देने से यह साध्य हो सकता है - १. अरे बिक क्रमांक २. कैपिटल अक्षरों के क्रमांक ३. रोजन क्रमांक अधिक विभाजन दिगदर्शित करने के लिए गोल कोप्टक में रोमन क्रमांक दिये जाएँ। इसरो अधीक व्यापक पद ति का अवलंब
करना क्या आवश्यक है ? . ६६.. सबसे छोटे उपसमूह में अवतरण ऐतिहासिक
क्रम से दिये जाएँ, यह सझाव है । उपभोक्ताद्वारा अवतरणों के साथ अर्य यथास्थान देने में अधिक कठिनाई तो होगी, फिर भी उच्चस्तर पर देना क्या आप पसन्द करेगे ?
६७.. स्वीकृत स्पष्टीकरणों का समर्थन करने के
प्रयत्न किस हद तक किये जाएँ ?
६८.. स्वीकृत स्पष्टीकरणों के अलावा अन्य अर्थों
का अन्तभाव आवश्यक है क्या ?
भाषाशास्त्रीय स्पष्टीकरण चातकोनात्येक कोष्टक में एवं अन्य भाषा विरहित सन्दर्भ गोल कोष्टक में दिये जा रहे है। इसके लिए आप कोई अन्य तरी का सुझायरे १
उप भा पाएँ.
७०. उपभाषाओं का निर्देशन किस प्रकार किया
जाएँ ? प्राकृत वैयाकरण की प्राच्य शाखा की तरह अन्यान्य विभाषाओं के नामों का सूचन करें ? अपभशा की तथाकथित उपभाषाओं के बारे में क्या किया जाएँ १ ।
७१. अन्य भाषाओं के शब्दो रूपों में साधर्म्य हो
या भिन्नता हर एक भाषा के बारे में स्वतंत्र रूप से नोंध की जाए १.
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- ११ - यादि शब्द एक ही तो उपभाजाएँ एकत्रित की जाए? यादि मय, मग, मद आदि स्वतन्त्र रूपले दिये जाएँ १ तो मअ, सय, मउ का क्या किया जाए ? यदि स्वतंत्र रूप से अन्तर्भाव करें तो अवतरण भी स्वतन्त्र रूपसे देने होगे और अथों की पुनरुक्ति होगी।
-ग्रन्थ
७२.. कृपया ऐसे ग्रन्थों के नाम सूचित करें,
जिनमें सूचि नहीं है, फिर भी कोश में
जिनके अवतरण लेना आवश्यक हो ? ७३.. परिपाटी के अनुसार आगम ग्रन्थों त हित
सभी प्राकृत ग्रन्थों के नाम संस्कृत में दिये गए है। फिर भी कछपाकत ग्रन्थ ऐसे हैं। जिनके अधिकृत प्राकृत नाम वैवर नहीं है। तो क्या हम उनके लिए प्राकत नाम तैयार. करें ? अथवा प्राकृत कृति होना सूचित करते हु
हुए उनके संस्कृत नाम ही है देंश . ७४. संस्कृत एवं प्राकृत दोनों नाम देना क्या
आवश्यक है ? यदि नहीं, तो कौन से नाम
प्रयुक्त करें ? ७५. ग्रन्धों के नामों के बारे में निम्न योजना
के विषय में आपकी क्या राय है १ अ. आगम ग्रन्थों के सिर्फ प्राकृत नाम देना ब. संपूर्णतया प्राकृत नियुक्तिओं, चूणिओं
एवं भाषा के नाम देना क.. अन्य सभी ग्रन्थों के संस्कृत नाम देना
(ग्रन्थ प्राकृत होने का सूचित करते हुए) ७६.. नाटकों के नाम संस्कृत में ही दिए जायेंगे
तथा तट्टकों के शीर्षक भी संस्कृत में दिए जायेगे (मात्र वे सट्टक होना सूचित किया जायेगा) आधानिक जमाने में जिनके नाम दिए गये हैं. उनके बारे में क्या किया जाए १ उदा.- मल रयणावली का देशी नाम माला, लेखकने । दिए जिणधम्मप्प डिबोह का कुमारपाल - प्रतिबोधा
७७
.... १२
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________________ -12 - 78.. लेखक का अभिमत न भी हो तो भी परंपरागत दो नामों में अधिक लोकप्रिय नाम स्वीकृत होगा। दहमुहवह या रावण वध के स्थान पर सेतुबन्ध एवं व्याख्या - प्राप्ति के स्थान पर भगवती अधिक जाने जाते हैं। 79. संदर्भ के लिए आगम ग्रन्थों का विभाजन अन्यान्य प्रकार किया गया है। सूत्रों के क्रम में भी भिन्नता पायी जाती है। इस कारण एक प्रति में से दूसरी प्रति में अवतरण पाना असम्भव सा होता है तथा टिीकाओं में संदर्भ भी नहीं पाये जाते / अतः ग्रन्थकताओं द्वारा निर्देशित विभाजन का स्वीकार ही सुविधाजनक होगा और तदनुसार सन्दर्भ भी, बशर्ते कि सन्दर्भ तीन या चार स्थानों से अधिक न हों। अनेक स्थानों पर दोनों प्रकारो का समन्वय उचित होगा। उस अवस्थामें उनमें से एक गोल कोष्टक में दिया जायेगा। द्विअंकी संदर्थ अरेबिक में, तीन अंकी रोसन में तथा चार अंकी कैपिटल रोमन में दिए जागे। शुध्दीकरण (दुरुस्ती) 81. पूर्व निर्मित कोशों में अशुध्दिया या गलत अर्थ हो तो, उनकी ओर ध्यान आकर्षित करें क्या ? 82. अवतरण शुध्दिी के असंख्य स्थान पाये जायेंगे। यह विश घिद सीधी की जाए या उसका निर्देश किया जाए 1 83. पूर्वर चित कोशों में से प्राप्त शब्द या अर्थ सिध्द न होता हो तो उसकी उपेक्षा करें या चौकोन कोष्टक में प्रश्न चिहन के साथ दिया जाए 1 इस प्रश्नावली में अनुल्लिखित किन्तु आपकी राय में कोश को अधिक उपयुक्त बना सके ऐसे सझाव भी अवश्य प्रेषित करें।