Book Title: Jinsutra Lecture 20 Palkan Pag Ponchu Aaj Piya ke
Author(s): Osho Rajnish
Publisher: Osho Rajnish
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बीसवां प्रवचन पलकन पग पोंछे आज पिया के Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रश्न-सार आपको सुनने के बाद मुझे व्यवहारिक जीवन में शिथिलता आती है। लेकिन जब आप प्रेम और भक्ति पर बोलते हैं तो मन खिल जाता है। कृपाकर मुझे मेरा मार्ग दें। मेरे भीतर स्तब्धता, सन्नाटा-सा लग रहा है और साथ ही अच्छे-बुरे विचारों का आक्रमण भी। मैं अपने को बहुत असहाय पा रही हूं। भय लगता है! आप महावीर की अहिंसा पर, बुद्ध के शून्य पर, या कुछ भी बोलते हैं तो उसमें अनिवार्यतः प्रेम जोड़ देते हैं। क्या हम संन्यासियों में प्रेम का अत्यंत अभाव देखकर ही प्रेम का पुनः पुनः स्मरण कराते हैं? मुझे समर्पण में बहुत आनंद आता है, ज्ञान से थोड़ा अहंकार जगता है। मैं कौन-सा ध्यान करूं-बताने की कृपा करें। Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हला प्रश्न: आपको सुनने के बाद मुझे जो तुम्हारे लिए ठीक है, उसे भूलकर भी दूसरे पर आरोपित व्यवहारिक जीवन में शिथिलता और उदासी का मत करना। वहीं हिंसा शुरू हो जाती है। जो तुम्हारे लिए ठीक अनुभव होता है। लेकिन जब प्रेम और भक्ति, है, उसे जीना। और किसी को भी इतना अधिकार मत देना कि आनंद और उत्सव पर आप बोलते हैं, तब मन खिल जाता है। वह तुम्हारे ऊपर अपने ठीक को थोप पाये। क्योंकि वहीं से और आनंद से भर जाता है। कृपापूर्वक मुझे मेरा मार्ग दें। गुलामी शुरू हो जाती है। | न किसी को गुलाम बनाना, न किसी के गुलाम बनना तो ही आनंद कसौटी है। सत्य की चिंता छोड़ो। जहां आनंद है, उसी तुम धार्मिक हो सकोगे। दिशा में चल पड़ो। सत्य मिलेगा ही। असत्य की दिशा में | और कसौटी एक ही है हाथ में कि जहां तुम्हें आनंद की पुलक आनंद हो ही नहीं सकता। इसीलिए तो हमने आनंद को ब्रह्म की मिले, वहां सरकते जाना। अगर झूठा होगा आनंद-उस झूठे परिभाषा बनाया है। सच्चिदानंद! आनंद को ही हम सुख कहते हैं। आनंद कसौटी है। आनंद पर कभी संदेह मत करना। अगर | सुख का अर्थ है: जिसने धोखा दिया आनंद का, लेकिन था आनंद न होगा तो जल्दी ही पता चल जायेगा। झूठा आनंद नहीं। सुख का अर्थ है : जाकर पता चला आनंद नहीं है। दूर से ज्यादा देर टिकेगा नहीं। ढोल सुहावना मालूम पड़ा था। मगमरीचिका थी। दर से कुछ डूबो! जहां से आनंद की किरण आती है वहीं सूरज है सत्य और समझे थे, पास कुछ और सिद्ध हुआ। इसलिए मैं तुमसे का। तुम किरण को पकड़ लो और चल पड़ो। सत्य की चिंता ही सुख से भी भागने को नहीं कहता; क्योंकि अगर तुम भाग गये छोड़ो। किरण पकड़ ली तो सूरज की दिशा पर चल पड़े। और मृगमरीचिका को बिना देखे, तो सुख तुम्हारा सदा पीछा करेगा। आदमी के पास दूसरा कोई उपाय नहीं है। सत्य से ही पता मैं तुमसे कहता हूं, सुख में भी जाओ, ताकि वह दुख हो जाये। चलेगा, क्या ठीक है। क्योंकि जो ठीक है, वही जीवन को अगर वह दुख है तो दुख हो जायेगा और अगर दुख नहीं है तो संगीत और आनंद से भरता है। | वहीं से तुम्हारी परमात्मा की सीढ़ियां शरू होंगी। और जब मैं कहता हूं, जो ठीक है, तो मेरा प्रयोजन लेकिन, मनुष्य के मन को आनंद के लिए तैयार नहीं किया व्यक्ति-व्यक्ति से है। जो तुम्हें ठीक है, जरूरी नहीं कि तुम्हारे गया है। इसलिए प्रश्न उठता है। इसलिए तुम अपनी इस पति को ठीक हो। जो तुम्हें ठीक है, जरूरी नहीं कि तुम्हारे बेटे स्वाभाविक रुझान को भी समस्या बना लेते हो। को ठीक हो। जो तुम्हें ठीक है, जरूरी नहीं कि तुम्हारे भाई को | अगर वैराग्य की बातें तुम्हें रस नहीं देतीं छोड़ो! तुम्हारे ठीक हो, मित्र को ठीक हो, पड़ोसी को ठीक हो। लिए न होंगी। इसका यह अर्थ नहीं है कि वे बातें गलत हैं। वे Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जन सूत्र भागः 11 किसी और के लिए होंगी। कोई महावीर उस रास्ते से चलकर | आंखें उधार नहीं मिलतीं और न दर्शन उधार मिलता है, मेरी पहुंचेगा। कुछ प्रयोजन नहीं तुम्हें उनसे। आंख से मैं देख सकता हूं। मेरी आंख से तुम न देख सकोगे। तुम्हारा हृदय तुम्हें प्रतिपल बताता है कि कौन-सी भूमि तुम्हारे मेरे लिए मैं जी सकता हूं, मेरे लिए तुम न जी सकोगे। और मेरे फूल को खिलायेगी। लिए मैं ही मर सकता हूं, तुम न मर सकोगे। फिर हर वृक्ष के लिए अलग भूमि होती है। कोई वृक्ष रेत में ही एक की जगह दूसरे के खड़े होने का कोई भी उपाय नहीं है। खड़ा होता है। कोई वृक्ष कंकड़-पत्थर चाहता है। कोई वृक्ष मगर वहीं हम धोखा देते हैं। काली भूमि चाहता है कि जरा-भी कंकड़-पत्थर न हों। जो एक महावीर ने कहा है तो ठीक कहा होगा। ठीक ही कहा है। के लिए अमृत है, वह दूसरे के लिए जहर हो जाता है। लेकिन तुम्हारे लिए कहा है, ऐसा महावीर को तुम्हारे हिसाब से इसलिए सदा ध्यान रखनाः कोई वक्तव्य सत्य के संबंध में बोलने का कोई कारण भी न था; तुम महावीर के सामने भी न सार्वभौम नहीं है-व्यक्ति-सापेक्ष है। थे। महावीर को तुम्हारा कोई पता भी नहीं है। महावीर ने तो वैराग्य की बात किसी को खिलाती होगी। असली सवाल अपना सत्य कहा है। इसे खयाल रखना। खिल जाना है। किसी को मरुस्थल की रेत में ही खिलने का यहां जो मैं तुमसे कह रहा हूं वह जरूरी नहीं है कि तुम्हारा सत्य सौभाग्य होता होगा। कैक्टस मरुस्थल में ही खिलते हैं। उनका हो। वह मेरा सत्य है, इतना जरूरी है। ऐसा मैंने जाना। ऐसा भी अपना सौंदर्य है। गुलाब वहां न खिलेंगे। गुलाब का अपना तुम भी जानोगे, इसकी कोई अनिवार्यता नहीं है। जान भी सकते सौंदर्य है। हो, न भी जानो! तो अपने हृदय से कभी भी जबर्दस्ती मत करना। अगर | मुझसे मेल खा जाओ, तुम्हारा व्यक्तित्व मुझसे मेल खाता हो, व्यक्ति अपने हृदय की मानकर चलता रहे, और हृदय के तो शायद जो मेरा सत्य है वह तुम्हारा भी अनुभव बन जाये। अतिरिक्त, हृदय के विपरीत किसी की न माने, तो सत्य से तुम लेकिन अगर व्यक्तित्व मेल न खाता हो, तो मेरा सत्य तुम्हारे भटक न सकोगे, पहुंच ही जाओगे। ऊपर-ऊपर रहेगा, भीतर-भीतर तो तुम्हारा ही सत्य रहेगा।। जहां आनंद न होगा और धोखा खाया, वहां धोखा कितनी देर सभी दर्शन आत्म-कथाएं हैं, 'आटो-बायोग्राफिकल' हैं। वे चलेगा? प्यासे आदमी को कितनी देर झूठे पानी से समझाओगे, व्यक्ति के संबंध में हैं। बुझाओगे? कितनी देर सांत्वना दोगे? जल्दी ही उसे समझ में | जब महावीर कुछ कहते हैं, तो वह महावीर के संबंध में आ जायेगाः यहां कोई जलधार नहीं है। हां, लेकिन यह हो | सूचनाएं हैं; जब बुद्ध कुछ कहते हैं तो बुद्ध के संबंध में। जब सकता है, उसे तुम इस झूठी जलधार के पास ही न पहुंचने दो, तो मीरा नाचती है और नाच से कुछ कहती है, तो अपने संबंध में कभी उसके अनभव में ही न आ सके कि मगमरीचिका थी. वहां कह रही है। कुछ था नहीं। तो शायद उसके मन में सपना अपने ताने-बाने | सत्य के संबंध में जिनती उदघोषणाएं हैं, वह उन व्यक्तियों की बुनता रहे ! शायद मन कहता रहे, वहां सुख था! वहां सुख था! | उदघोषणाएं हैं जिन्होंने सत्य को जाना। उनके माध्यम से सत्य ऐसा ही मैं तुम्हारे तथाकथित साधु-संन्यासियों में देखता हूं। आया। सत्य ने एक रूप लिया। जरूरी नहीं है वही रूप तुम्हारे संसार में सुख नहीं है, ऐसा उनका अनुभव नहीं है। ऐसा किसी लिए ठीक हो। तुम कैसे समझोगे? अनुभवी की बात को उन्होंने मान लिया है। उनका स्वयं का कुछ लोग हैं, जो इसलिए मान लेते हैं किसी की बात को, हृदय तो कह रहा था, सुख है। उस हृदय को तो इनकारा, क्योंकि और लोग उसकी बात को मानते हैं। अगर जीसस को अस्वीकार किया; किसी और को आरोपित कर लिया। अपने एक अरब आदमी मानते हैं तो कुछ तो इसीलिए मान लेंगे कि प्राणों की आवाज तो न सुनी; किसी और की आवाज पर चल | जिसको एक अरब मानते हैं, वह गलत कैसे हो सकता है? पड़े। फिर उनका जीवन बड़े दुख से भर जाता है। क्योंकि जहां | लेकिन ध्यान रखना, यह भी संभव है कि एक अरब जिसे उन्हें सुख दिखाई पड़ता था, वहां उन्हें अब भी दिखाई पड़ेगा। मानते हों वह तुम्हारे लिए न हो। वह एक अरब के लिए भी सही Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 2015 पलकन पग पोंछं आज पिया के हो और फिर भी तुम्हारे लिए सही न हो। क्योंकि परमात्मा असली नहीं है। एक-एक व्यक्ति को अनूठा रचता है, एक-एक व्यक्ति को परमात्मा दोबारा कोई चीज बनाता नहीं। परम कलाकार है! अद्वितीय रचता है। यही तो मनुष्य की महिमा है। ऐसा थोड़े ही है कि जगत चुक गया है, कि अब उसे कुछ सूझता मनुष्य की तो छोड़ दो फिक्र, एक पत्ते को इस बगीचे से तुम नहीं, कि फिर महावीर को बना दे, फिर राम को बना दे, फिर खोज लो, फिर वैसा पत्ता तुम सारी पृथ्वी पर खोजकर भी दूसरा कृष्ण को बना दे। न पा सकोगे। देखा तुमने, न महावीर दुबारा, न कृष्ण दुबारा, न राम दुबारा! एक कंकड़ उठा लो मार्ग से, फिर अनंत-अनंत चांद-तारों पर जो एक बार आता है, फिर दोबारा पर्दे पर आता ही नहीं। इसे भी खोजते रहो तो ठीक वैसा कंकड़ तुम्हें दुबारा न मिलेगा। स्मरण रखना। परमात्मा कोई फोर्ड-कार बनानेवाली असेंबली-लाइन नहीं है। तुम भी नये हो। सीख सबसे लेना, मानना अपनी। सुनना कि एक-सी कारें। परमात्मा कोई मैकेनिक नहीं है, तकनीशियन सबकी, अंतिम निर्णय हृदय से लेना। नहीं है-कलाकार है। तो अगर वैराग्य की बातें सुनकर शिथिलता और उदासी आती जितना बड़ा कवि होगा, उतना ही दुबारा किसी गीत को नहीं है; हृदय का फूल खिलता नहीं, कुम्हलाता है; कली फूल नहीं दोहराता। जितना बड़ा चित्रकार होगा, दुबारा फिर उसी चित्र को बनती, उलटा फूल अपनी पंखुड़ियां बंद कर लेता है-जैसे नहीं बनाता। दुबारा अगर बना भी ले वैसा चित्र तो आनंद | साझ सूरज के डूब जाने पर बहुत-से फूल अपनी पंखुड़ियां बंद अनुभव नहीं करता। कर लेते हैं तो समझ लेना, यह सत्य तुम्हारा सूरज नहीं। यह ऐसा हुआ कि एक आदमी ने पिकासो का एक चित्र खरीदा। होगा सत्य किसी और का, क्योंकि कुछ फूल हैं जो सूरज के कई लाख रुपये का चित्र था। तो स्वभावतः वह पता कर लेना | डूबने पर ही खिलते हैं। रातरानी है। उसका होगा, तुम्हारे लिए चाहता था कि चित्र नकली तो नहीं है। तो वह पिकासो के पास नहीं है। तुम्हारा रास्ता फिर बिलकुल साफ है। ही उस चित्र को लेकर गया। और उसने पिकासो से कहा कि मैं जहां तुम्हें आनंद की झलक मिले, साहस करके वहां जाना। यह खरीद रहा हूं, लाखों रुपये का मामला है, मैं इतना पूछने | जरूरी नहीं है कि हर बार तुम वहां आनंद पाओगे, यह मैं नहीं आया हूं कि यह असली है? तुम्हारा ही बनाया हुआ है, किसी कह रहा हूं। बहुत बार तुम पाओगे वहां कुछ भी न था, राख का की नकल तो नहीं? ढेर था। लेकिन तब भी अनुभव होगा। तब भी जीवन में प्रौढ़ता पिकासो ने उस चित्र की तरफ बड़ी बेरुखी से देखा और कहा, | आयेगी। राख का ढेर देखकर समझ आयेगी। आगे राख के ढेर नकली है, किसी और का बनाया है। पिकासो की प्रेयसी मौजूद पहचानने की कला आयेगी। दुबारा धोखा मुश्किल होगा। थी और वह बड़ी चकित हुई, क्योंकि यह चित्र उस प्रेयसी के तीसरी बार धोखा असंभव हो जायेगा। फिर एक ऐसी घड़ी आ सामने ही बनाया गया था। और पिकासो ने ही बनाया था। | जायेगी कि कितना ही लोभक दृश्य हो, तुम दूर से भी पहचान उसने कहा कि शायद तुम भूल रहे हो, शायद तुम्हारी स्मृति तुम्हें पाओगे कि कहां राख है, कहां अंगार है; कहां जीवन है, कहां धोखा दे रही है। यह चित्र तुमने मेरे सामने बनाया है। यह सब बुझा-बुझा है।। तुम्हारा ही बनाया हुआ है। - भूल-भूल करके ही आदमी सीखता है। गलत को गलत जान पिकासो ने कहा, मैंने बनाया है, लेकिन फिर भी नकली है। लेना सही की तरफ जाने का उपाय है। भ्रांत को भ्रांत पहचान क्योंकि इसे मैं पहले भी बना चुका हूं। इसको असली कहना | लेना, निर्धांत होने की व्यवस्था है। ठीक नहीं है, आथेंटिक नहीं है। एक दफा जो बना चुके, बात तो मैं तुमसे कहता नहीं कि तुम जल्दी भाग जाना, मेरी मानकर पुरानी हो गई। अब उसे कोई दूसरा नकल करे या मैं खुद ही | भाग जाना। तुम तो अपने ही अनुभव से जाना। होगा सुख, तो उसकी नकल करूं, इससे क्या फर्क पड़ता है? लेकिन यह चित्र | स्वर्ग का रास्ता बनेगा। नहीं होगा सुख, तो अनुभव जगेगा। मैं पहले भी बना चुका हूं। यह सिर्फ प्रतिध्वनि है, छाया है; एडीसन एक प्रयोग कर रहा था। उसमें सात सौ बार हारा। 4351 Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिन सूत्र भागः1 उसके सारे साथी-सहयोगी रुष्ट हो गये, परेशान हो गये। उसके बातों को बीच-बीच में मत डालना। क्योंकि फिर तुम सब विद्यार्थी तो घबड़ा गये कि अब यह कब खतम होगा; क्या पूरा विकृत कर दोगे। एक बार साफ हो गया कि प्रेम की चर्चा तुम्हें जीवन यह एक ही प्रयोग में करते रहना है; सात सौ बार! तीन उमंग से भर देती है तो फिर तुम विरागियों की चर्चा की बात ही साल खराब हो गये! एक दिन उसके सब सहयोगियों ने कहा, छोड़ देना। फिर वह रास्ता तुम्हारे लिए नहीं है। फिर उनकी बात 'आप सुनिये! आप तो रोज सुबह फिर प्रसन्नचित्त आ जाते हैं | तुम्हें झंझट में डाल देगी। प्रेमी की बात बड़ी अलग है। और फिर काम शुरू कर देते हैं। लेकिन हमारा भी सोचिये! यह | इश्क हायल है तेरे मिलने में जिंदगी इसी में गंवानी है? सात सौ दफे हार चुके; अब छोड़िये हमसे ये पर्दा हटाया न गया। भी! कुछ और करिये!' विरागी कहता है कि प्रेम को हटा लो तो परमात्मा से मिल एडीसन ने कहा कि तुमसे किसने कहा कि मैं सात सौ बार हार जाओ। प्रेमी कहता है: इश्क हायल है तेरे मिलने में! लोग चुका? मैं तो हर बार जीत के करीब आ रहा हूं। समझो कि सात कहते हैं कि प्रेम के कारण हम तुझसे नहीं मिल रहे हैं; होगा यही सौ एक दरवाजे हैं उसके, तो सात सौ दरवाजे तो हम खटखटा सही। हमसे यह पर्दा हटाया न गया। लेकिन हम यह पर्दा न चुके; वहां नहीं था द्वार, दीवाल थी। वह दरवाजे झूठे थे! अब | हटा सकेंगे। हम तो, अगर प्रेम के कारण ही तू चूक रहा है तो हम रोज-रोज करीब असली दरवाजे के आ रहे हैं। कितनी देर | चूके चले जायेंगे लेकिन यह प्रेम हमसे न हटाया जायेगा। यह चलेगा! तो सात सौ बार हम असफल हुए, यह तुमसे भक्त के लिए तो प्रेम ही परमात्मा है। ज्ञानी के लिए प्रेम बाधा किसने कहा? हर कदम हमें सफलता के करीब लाया है। हर है। वह प्रेम को कहता है, राग! हटाओ! वैराग्य को जगाओ! विफलता सफलता के करीब लाती है। सात सौ बार के अनुभव तो ही सत्य मिलेगा। ने हमें काफी प्रौढ़ बना दिया है। हमारी परख पैनी हो गई है। प्रेमी और भक्त कहता है, पर्दे को नहीं हटाना, अपने को मिटा अब हमें वो सात सौ मार्ग भटका नहीं सकते। और निश्चित ही | देना है। प्रेम ही प्रेम रह जाये, तुम न बचो! ठीक मार्ग के हम करीब आ रहे हैं। कितनी देर होगा, यह तो इश्क हायल है तेरे मिलने में कहना मुश्किल है। हमसे यह पर्दा हटाया न गया। और कहते हैं, उसके कोई पंद्रह दिन बाद ही एडीसन सफल हो तुझको देखा तो सेर चश्म हुए गया। उसने बिजली का पहला बल्ब बना लिया। आज सारी तुझको चाहा तो और चाह न की। दुनिया उसकी वजह से रोशन है। | -आंखों की सारी भूख मिट गई तुझे देखते ही! तेरी झलक जो बाहर के प्रकाश की खोज के संबंध में सही है, वही भीतर पाते ही! के प्रकाश की खोज के संबंध में भी सही है। तुझको देखा तो सेर चश्म हुए जहां सुख मिले-जाना! तुझको चाहा तो और चाह न की। मैं यहां तुम्हें डराने को नहीं हूं। डरकर कभी कोई जागा? मैं विरागी कहता है, सब चाह छोड़ो तो परमात्मा मिलेगा। प्रेमी तुम्हें घबड़ाता नहीं हूं। मैं तुमसे कहता हूं, जाओ! साहस से, कहता है, उसकी चाह आ गई तो सब चाह अपने से छूट जाती हिम्मत से! होगा सुख तो एक कदम और तुमने प्रभु की तरफ | है; छोड़ने की झंझट प्रेमी को नहीं है। उसकी चाह काफी है। लिया। नहीं होगा सुख, तो भी एक कदम प्रभु की ओर लिया। तुझको देखा तो सेर चश्म हुए एक द्वार बंद हुआ! इस तरफ जाने में कोई सार नहीं। एक रास्ता तुझको चाहा तो और चाह न की। गलत हुआ। सही रास्ते के करीब आने लगे। फिर उसको चाहने के बाद कहीं कोई और चाह बचती है। हृदय की सुनो। तो अगर भक्ति, प्रेम और उत्सव की बात पर ये दोनों अलग-अलग मार्ग हैं। विरागी कहता है, सब सनकर तुम्हारे हृदय में कोई धुन बजती है, तुम्हारे हृदय की वीणा | चाह छोड़ो-इतना कि परमात्मा की चाह भी छूट जाये। वह भी कंपित होने लगती है, तो वही तुम्हारा मार्ग है। फिर वैराग्य की | एक रास्ता है। अचाह में झूब जाओ। परमात्मा तक की चाह न 4361 Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पलकन पग पोंछ आज पिया के बचे-उतनी भी चाह की रेखा न रह जाये भीतर। परिपूर्ण | भीतर के बीज फूटने लगें; जिस भाषा के संपर्क में तुम्हारा अचाह में खड़े हो जाओ। जरा भी कंपन न रह जाये चाह का, व्यक्तित्व निखार लेने लगे; रस जगे; गीत जगे; नृत्य उठे-तो वासना का। उसी घड़ी मिलन! फिर समझना कि हृदय साफ-साफ इशारा कर रहा है किस तरफ प्रेमी कहता है, उसकी चाह में ऐसे डूब जाओ कि तुम न बचो; चलो। फिर और सारी चिंताएं छोड़ देना-किस घर में पैदा हुए, तुम्हारी सारी जीवन-ऊर्जा बस उसकी चाहत, उसका प्रेम बन | किस धर्म में पैदा हुए, कौन-सा सिखावन, कौन-सी शिक्षा दी जाये। उसी घड़ी मिलन! गई, कौन-सा शास्त्र पकड़ाया गया, फिर सब गौण है। हृदय से दोनों तरफ से मिलन हुआ है। दोनों में कौन ठीक और गलत, | परमात्मा ने बोल दिया कि तुम्हारे लिए जाने का रास्ता कौन है। इस तरह कहने की बात ही नासमझी है। इतना ही देख लेना, लेकिन ऐसा सभी को न होगा। तुम्हारा हृदय किसके साथ खिलता है! यहां कुछ हैं जिनको प्रेम की बात सुनकर बेचैनी शुरू हो जाती तन से तो सब भांति विलग तुम है, घबड़ाहट शुरू हो जाती है। विराग की बात सुनकर वह शांत लेकिन मन से दूर नहीं हो बैठ जाते हैं, कि अब चलो ठीक बात हुई। वह भी गलत नहीं जुड़े न पंडित, सजी न वेदी हैं। उनको जो रुचता है, उनको जो पचता है। वे शायद जीवन में वचन हुए न मंत्र उचारे काफी जले हैं। और जैसा दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर जनम-जनम को किंतु वधू यह पीने लगता है; प्रेम ने शायद उन्हें काफी जलाया है। यद्यपि जो हाथ बिकी बेमोल तुम्हारे प्रेम उन्होंने अब तक जाना था, वह बिलकुल ही क्षुद्र था, व्यर्थ झूठे-सच्चे, कच्चे-पक्के था, नाममात्र को था। लेकिन उसने इतना जला दिया है कि अब रिश्ते जितने दुनियाभर के तो वह परमात्मा की भक्ति की बात या प्रेम की बात सुनकर भी सबसे तुम मुक्त, प्रेम चौंक जाते हैं। वे छाछ को भी फूंक-फूंककर पीते हैं। मगर के वृंदावन से दूर नहीं हो। ठीक, अगर विराग से उनके हृदय का भाव खुलता है, शांति तन से तो सब भांति विलग तुम मिलती है और एक सुख की दशा पैदा होती है, तो वही ठीक। लेकिन मन से दूर नहीं हो। उसी से वे चलें। और सब नाते-रिश्ते होंगे संसार के, लेकिन भक्त कहता है, और जिस बात पर मैं जोर देना चाहता हूं, वह यह कि कभी प्रेम का नाता संसार का नहीं है। प्रेम तो वृंदावन है। वह कोई भूलकर भी किसी को तुम अपनी भांति चलाने की चेष्टा मत नाता नहीं है। वह कोई बनने मिटनेवाली बात नहीं है। वह कोई करना। यह चेष्टा हम सबके मन में पैदा होती है। यह हमारे संबंध नहीं है। वह तो एक आनंद की, अहोभाव की दशा है। अहंकार का बड़ा गहरा हिस्सा है। हम दूसरे को अपनी प्रतिछवि वृंदावन है। में बनाना चाहते हैं। बाप अपने बेटे को ढालना चाहता है ठीक झूठे-सच्चे, कच्चे-पक्के अपने जैसा। मां अपनी बेटी को दालना चाहती है ठीक अपने रिश्ते जितने दुनियाभर के जैसी। मित्र मित्र को ढालने में लग जाता है। हम सब इस चेष्टा सबसे तुम मुक्त, प्रेम में होते हैं कि अगर हमारा बस चले तो सारी दुनिया को हम के वृंदावन से दूर नहीं हो।। अपनी प्रतिछवि में ढाल दें। इससे अहंकार को बड़ी तृप्ति और सब होगा बाधा! प्रेम-और बाधा! भक्त को बाधा | मिलती है। इससे मैं तो हो जाता हूं आदर्श; और सभी हो जाते हैं नहीं दिखाई पड़ती। भक्त तो प्रेम से ही उसके पास पहुंचता है। मेरी छायाएं। इससे मैं तो हो जाता हूं सभी जीवन का मापदंड। प्रेम में डूबकर ही उसमें डूबता है। | इस भ्रांति से थोड़े सजग होना। ये विरागी की और प्रेमी की अलग-अलग भाषाएं हैं। इनमें जो तुम्हें अपना सत्य खोजना है। और सभी सत्य निजी सत्य हैं। भाषा तुम्हारे हृदय में रम जाये; जिस भाषा की वर्षा में तुम्हारे | दूसरे पर थोपना नहीं है। तो न तो थोपना और न किसी को थोपने Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ DEUSH जिन सूत्र भाग 1 देना। अगर इन दो बातों से तुम बच गये—क्योंकि बड़ा खतरा जीवनभर हम एक-दूसरे को दबाने की चेष्टा करते यह है कि जो नहीं थोपते, वे दसरों को थोपलेने देते हैं। जो दसरे हैं-जाने-अनजाने उपायों से। बाप बेटे को बदलना चाहता को नहीं थोपने देते, वे खुद दूसरों पर थोप देते हैं। है। बदलने की चेष्टा में सिर्फ वह यह कहना चाहता है कि इस दुनिया में वस्तुतः समझपूर्वक जीना बड़ा कठिन है। समझ मालिक मैं हूं। बेटा भी बड़ा होकर इस बूढ़े बाप को बदलने की के दोनों तरफ नासमझी की अतियां हैं। चेष्टा करेगा, क्योंकि तब बाप कमजोर होने लगेगा। तब बेटा मैक्यावली ने कहा है, इसके पहले कि कोई तुम पर आक्रमण | इसको समझाने लगेगा कि क्या करना उचित है और क्या करना करे, तुम आक्रमण कर देना। क्योंकि यही सुरक्षा का सर्वोत्तम उचित नहीं है, कि तुम सठिया गये हो, कि तुम्हारी बुद्धि तुमने खो उपाय है। तो यहां प्रत्येक व्यक्ति यही कोशिश कर रहा है कि दी, कि तुम्हें इस दुनिया का पता नहीं है जो आज है; तुम जिस इसके पहले कि कोई तुम्हारी गर्दन पकड़े, तुम पकड़ लो। इसके दुनिया की बातें कर रहे हो, वह गई-गुजरी हो चुकी; अब तुम पहले कि तुम्हें कोई बदले, तुम बदल दो। इसके पहले कि मेरी सुनो! तुम्हारी कोई परिभाषा करे, तुम परिभाषा कर दो। इस जगत में इन दोनों अतियों से बचना बड़ा कठिन है। मगर तुमने देखा, पूरे जीवन हम एक-दूसरे को परिभाषित कर रहे जो बच जाये वही साधक है। न तो तुम दूसरे को दबाने की हैं, हम हजार-हजार तरकीबों से एक-दूसरे की परिभाषा करते कोशिश करना और न किसी को अवसर देना कि तम्हें दबा दे। हैं। पति खड़ा है, कार में हार्न बजा रहा है, पत्नी देर लगाती एक बात तुम साफ कर देना कि चाहे कोई भी कीमत हो, कितनी है-वह यह घोषणा कर रही है देर लगाकर कि खड़े रहो; ही जोखिम हो, मैं अपने हृदय की मानकर चलूंगा। चाहे सब मालिक कौन है, जाहिर हो जाना चाहिए। वह पति को परिभाषा | खोना पड़े! इसी को मैं संन्यास की भाव-दशा कहता हूं। दे रही है। संन्यास कोई बाह्य कृत्य नहीं है—एक भीतरी अंतर्घोषणा है ध्यान रखना, जो जिसको प्रतीक्षा करवा सकता है, वह उसकी कि अब से मैं अपने हृदय की मानकर चलूंगा, चाहे इसके लिए परिभाषा कर देता है। तुम दफ्तर में गये किसी से मिलने तो मुझे सब गंवाना पड़े; चाहे इसके लिए मुझे दीन-दरिद्र हो जाना मैनेजर तुम्हें बिठा रखेगा थोड़ी देर, चाहे उसको कोई काम न हो। पड़े; चाहे राह का भिखारी हो जाना पड़े। राह के भिखारी होने क्लर्क भी तुम्हें बड़ी देर बाद देखेगा, चाहे वह कुछ भी न कर रहा की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर यह भी होना पड़े तो मेरी तैयारी हो। वह वैसे ही अपने रजिस्टर उलटने लगेगा, क्योंकि वह तुम्हें | है; लेकिन अब एक बात मैंने तय कर ली कि अपने हृदय के परिभाषा देना चाहता है कि साफ हो जाना चाहिए कि यहां कौन अतिरिक्त और किसी की मानकर न चलूंगा। अब मेरा हृदय ही मालिक है! | मेरा वेद होगा। और मेरा हृदय ही मेरी भगवदगीता होगी। हृदय मैं तुमको प्रतीक्षा करवा सकता हूं, तो मैं मालिक हूं! ही मेरा कुरान और मेरी बाइबिल होगी। . जो प्रतीक्षा करवा सकता है वह ऊपर है। तो पति भी सांझ को और तुम चकित होओगे कि जिस दिन तुम हृदय की सुनने क्लब-घर में देर तक बैठा ताश खेलता रहता है, पत्नी को राह | लगोगे, उस दिन तुम्हारे जीवन में गति आ जायेगी। कुछ दिखवाता है कि घर बैठी रहो, करती रहो प्रतीक्षा खाने के लिए! अड़चनें आयेंगी समाज की तरफ से, दूसरों की तरफ से; क्योंकि जरा देर करके ही आयेगा। वह यह साफ बता देना चाहता है कि कल तक जिनकी तुमने मानी थी, अचानक वे इतने जल्दी राजी न कौन मालिक है। हो जायेंगे। वे इतनी जल्दी स्वीकार न कर लेंगे। लेकिन भीतर तुमने देखा, बड़े नेता सभा में आयें तो हमेशा देर से आयेंगे। | तुम पाओगेः उमंग आ गई! तरंग आ गई! एक ज्वार आ गया बड़ा नेता, और वक्त पर आ जाये। यह बात हो ही नहीं सकती। शक्ति का! भीतर तुम पाओगे कि अब तुम दीन-दरिद्र नहीं हो; जितना बड़ा नेता, उतनी देर करके आयेगा। उतनी लोगों को तुम सम्राट हो गये। प्रतीक्षा करवा देगा। उनको जाहिर करवा देगा कि तुम कौन हो, तो जो तुम्हें रुचे। विराग तो विराग! उससे भी लोग परमात्मा तुम्हें साफ हो जाना चाहिए। तक पहुंचे हैं। भक्ति तो भक्ति! 438 Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पलकन पग पोंछं आज पिया के दूसरा प्रश्न : मेरे भीतर जैसे स्तब्धता, सन्नाटा-सा लग रहा हैं, तो हाथ खाली हो जाते हैं। हाथों का खाली हो जाना सत्य के है। खाली-खाली, शून्यता जैसे छा गई हो। और साथ ही उतरने के लिए अत्यंत जरूरी है। लेकिन व्यर्थ के जाने और सत्य अच्छे-बुरे विचारों का आक्रमण भी हावी होता रहता है। मैं | के आने के बीच में थोड़ा अंतराल है। उस अंतराल में बड़ी पीड़ा क्या करूं? मैं बावरी-सी हो गई हूं। मैं अपने को बहुत होती है। उस अंतराल को जो पार नहीं कर पाता, वह घबड़ाकर असहाय, अकेली और असुरक्षित पा रही हूं। भय लगता है। फिर बाहर निकल आता है। | इसीलिए 'सरोज' ने पूछा है : 'एक तरफ खाली-खालीपन 'सरोज' का प्रश्न है। और शून्यता छा गई है और दूसरी तरफ अच्छे-बरे विचारों का ऐसा होता है। ऐसा होना स्वाभाविक है। क्योंकि जैसे ही हम आक्रमण भी होता रहता है।' भीतर जाते हैं, हम अकेले हो जाते हैं। इसीलिए तो लोग भीतर | वह आक्रमण इसीलिए हो रहा है। वह आक्रमण हो रहा है, जाने से डरते हैं। ऐसा नहीं, बल्कि तुम चेष्टा कर-करके अच्छे-बुरे विचारों को बाहर हैं और लोग, भीतर तो कोई भी नहीं। भीतर तो तुम हो पकड़ रही हो, ताकि भीतर जो निस्तब्धता है वह एकदम भयावनी और बस तुम हो। बाहर अनंत लोग हैं, चहल-पहल है। भीतर न हो जाये। कुछ तो सहारा रहे। विचार ही सही, कुछ तो तरंगें तो सन्नाटा है। बाहर बहुत भरावट है, भीतर तो शून्य है। और उठती रहें, तो कुछ व्यस्तता बनी रहे। क हम बाहर जीए, संबंधों में जीए, औरों के साथ लोग खाली होने की बजाय दुखी होना भी पसंद करते हैं, जीए, भीड़-बाजार, घर-गृहस्थी-हजार व्यस्तताएं। क्योंकि कम से कम दुख तो है! कुछ तो है हाथ में! हाथ __ तो जब भीतर चलना शुरू करोगे तो अचानक अनुभव में बिलकुल खाली तो नहीं। कंकड़-पत्थर सही, न हुए आना शुरू हो गया, वह सब तो दूर छूट गया और इस भीतर तो हीरे-जवाहरात! लेकिन कोई यह तो नहीं कह सकता कि कुछ तुम्हारा निकटतम प्रियजन भी नहीं आ सकता। यह तो तुम्हारा भी नहीं है। नितांत एकांत है। यह तो इतना निजी है, इतना प्राइवेट है कि तुम __ अधिक लोग दुख को भी नहीं छोड़ते, क्योंकि उनको डर अपने प्रेमी को भी इसमें निमंत्रित न कर सकोगे। यहां तो बस लगता है—छोड़ दिया इतने दिनों का संग-साथ, तो अकेले हो तुम हो और तुम हो। जायेंगे। तो शुरू-शुरू में बड़ी निस्तब्धता, सन्नाटा, सूनापन | तुमने कभी खयाल किया, बहुत दिन बीमार रहने के बाद अगर नकारात्मक मालूम होगा। तुम बिस्तर से उठो तो बड़ी बेचैनी मालूम पड़ती है : अब कहां राह देखी नहीं और दूर है मंजिल मेरी जायें। अब तो बिस्तर पर होना जीवन की शैली हो गयी थी। कोई साकी नहीं, मैं हं, मेरी तन्हाई है। अगर दो-चार साल बिस्तर पर रह गये, तो जो आदमी दो-चार घबड़ाहट भी होगी; क्योंकि राह देखी नहीं, मंजिल का कोई साल बिस्तर पर रह जाता है, फिर वह उठता ही नहीं; इसलिए पक्का पता नहीं कहां है, कहां जा रहे हैं, क्या हो रहा है। मील के नहीं कि बीमारी ठीक नहीं होती, बीमारी ठीक भी हो जाये तो अब पत्थर भी नहीं हैं भीतर। कौन लगायेगा मील का पत्थर? कोई| वह बीमारी को पकड़ लेता है। चिकित्सक इस घटना से नक्शा भी नहीं है भीतर का। कौन देगा नक्शा? वहां कोई हाथ भलीभांति परिचित हैं कि अगर बीमारी ज्यादा दिन रह जाए तो लेकर चलानेवाला भी नहीं है। तो अचानक आदमी असहाय बीमार को फिर ठीक करना मुश्किल हो जाता है। क्योंकि उसकी मालूम होता है। बीमारी आदत का हिस्सा हो जाती है। अब बीमारी को वह अपने इस असहाय अवस्था से अगर गुजर गये, अगर इस असहाय जीवन के ढंग में समा लेता है। अब इस ढंग को छोड़ने में अवस्था को शांति से पार कर लिया, तो तुम्हारे जीवन में पहली | अड़चन होगी। दफा आत्मबल का जन्म होगा। लेकिन उसके पहले असहाय अगर तुम एक दुख के आदी हो गये हो तो तुम उस दुख को अवस्था से गुजर जाना जरूरी है। जब झूठी चीजें हाथ से छूटती सम्हाले रहोगे। 439 www.jainelibrarorg Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिन सत्र भार इसलिए अकसर मैं देखता हूं कि लोग दुख की सीमाएं और सौभाग्य से मिलता है। अब मिल गया है तो इसे खराब मत स्थितियों को भी छोड़ते नहीं। अगर किसी पत्नी से तुम्हारा करो। अब तो इस शून्य में डूबो। यद्यपि प्राथमिक चरण पर जीवन सतत कलह में गुजर रहा है तो भी तुम अलग नहीं होते। डूबना ऐसा ही लगेगा, जैसा मरे, मौत हुई। या किसी पति के साथ जीवन एक नारकीय स्थिति बन गई है, तो और एक अर्थ में ठीक भी है, तुम तो मरोगे ही। तुम जैसे अब भी अलग नहीं होते। क्यों? हजार बहाने तुम खोजते हो, | तक रहे हो, इस शून्य में डूबोगे, मिट जाओगे। नये का जन्म लेकिन वह सब बहाने हैं। मौलिक बात यह है कि अब इस दुख होगा, आविर्भाव होगा। की भी आदत हो गई है। 'क्या करूं? मैं बावरी-सी हो गई हैं।' / और एक बड़ा अनुभव पश्चिम में आना शुरू हुआ है, जहां कि | पागलपन जैसा ही लगेगा। भीतर जाओ तो शून्यता; बाहर लोग काफी पति-पत्नियां तीव्रता से बदलते हैं। एक अनुभव आओ तो व्यर्थ के विचारों का ऊहापोह है। बाहर आओ तो कोई आना शुरू हुआ है कि जो आदमी एक पत्नी को छोड़कर दूसरी | सार नहीं है और भीतर जाओ तो घबड़ाहट! एक अनंत शून्य पत्नी को खोजता है, वह फिर करीब-करीब वैसी ही स्त्री को मुंह-बाए खड़ा है। तो पागलपन मालूम पड़ेगा। यह पागलपन खोज लेता है जैसी उसने छोड़ी। उसी तरह की कर्कशा या उसी तभी तक मालूम होगा जब तक शून्य से रस नहीं बैठता। तरह की उपद्रवी! छोड़ा नहीं है अभी एक को, और वह दूसरी | शून्य में रस लो, पहचान बनाओ! शून्य को गुनगुनाओ। को फिर वैसा का वैसा खोज लेता है! क्या कारण होगा? अब शून्य को नाचो! जब शून्य आ जाये तो अहोभाव अनुभव करो। तो उसको उसी तरह की स्त्री में रस आने लगा। तो अब वह फिर परमात्मा को धन्यवाद दो। यह उसकी अनुकंपा है। खोज लेता है। उसकी चाह का ढंग रुग्ण हो गया। अब वह शून्य इस जगत में परमात्मा की सबसे बड़ी देन है, प्रसाद है। गलत की तरफ उत्सुक हो जाता है। वह फिर वैसी ही थोड़े-से सौभाग्यशाली लोगों को मिलता है। और जिनको व्यक्तित्ववाली स्त्री को खोज लायेगा, जो फिर कहानी को मिलता है, वे भी सभी सम्हाल नहीं पाते। बहुत-से तो उसे नष्ट दोहरायेगी। फिर त्याग करेगा। कर देते हैं। क्योंकि वह देन इतनी बड़ी है कि तुम्हारी पात्रता एक आदमी के बाबत मनोवैज्ञानिकों ने अध्ययन किया। उसने छोटी पड़ जाती है। आठ तलाक किये और हर बार वैसी ही पत्नी खोज लाया। _ 'मैं अपने को बहुत असहाय, अकेली, असुरक्षित पा रही आदमी तो वही है-खोजनेवाला वही है तो फिर वही | हूं...।' खोज लायेगा। कोई हर्जा नहीं। मन कहेगा, कोई सुरक्षा खोज लो। मन तुम जरा खयाल करना अपने जीवन में, तुमने बहुत-से दुख | कहेगा, किसी तरह किसी को अपने इस एकांत में ले आओ। पकड़ तो नहीं रखे हैं जो कि जाना चाहते हैं, लेकिन तम नहीं जाने वह अगर भूल की तो शून्य की शुद्धता नष्ट हो जायेगी। फिर दे रहे हो! संसार निर्मित हो जायेगा। ऐसे ही तो हम बहुत बार वापिस तो जब व्यक्ति को सन्नाटा होगा तो वह पुराने विचारों को | कोल्ह के बैल बन जाते हैं। आमंत्रित करेगा, बुलायेगा। वह आक्रमण नहीं है, तुम्हारा ___ अब यह एक खिड़की खुली है, इसे बंद मत कर देना। बुलावा है। क्योंकि उस भांति थोड़ी देर को भीतर की रिक्तता भर असहाय मालूम होते हो, असहाय सही। स्वीकार करो! जाती है। उथल-पुथल मच जाती है। असुरक्षित मालूम होते हो, असुरक्षित सही। स्वीकार करो। यह विचार है, क्रोध है, झगड़ा है, कोई सपना है, कोई योजना जो तथ्य सामने प्रगट हो रहा है, इसे इनकार मत करो और है-उतनी देर को तुम अपने भीतर के आकाश को भर लेते हो। बदलने की चेष्टा मत करो। इसे भरपूर नजर देखो, अहोभाव से उतनी देर को शून्य भूल जाता है। दखो, कृतज्ञता से देखो। कहो कि प्रभु ने यही चाहा कि शून्य शन्य में रस लो, तो धीरे-धीरे ये विचार समाप्त हो जायेंगे। होना है, जरूर शन्य से ही जन्म होता होगा। यह मेरी राह शन्य यह शून्य बड़ा महिमाशाली है। शून्य को ही तो ध्यान कहा है। के मंदिर से ही गुजरती है, तो इससे गुजर जाना है। 4400 Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पलकन पग पोंछु आज पिया के जल्दी ही इस शून्य का चेहरा बदलना शुरू हो जायेगा। अगर तुम्हें आग में डाले। बड़ी जलन होगी, बड़ी पीड़ा होगी। उस तुमने इसे स्वीकार किया तो इस शून्य में तुम्हें सौंदर्य दिखाई पड़ने | पीड़ा के बिना कोई भी जन्मा नहीं है। उस पीड़ा के बिना किसी लगेगा। जिसे हम स्वीकार करते हैं, उसमें सौंदर्य दिखाई पड़ने को नये जन्म का आविर्भाव नहीं हुआ है। लगता है। इसलिए तो अपनी मां किसी को असुंदर नहीं मालूम हए होश गुम तेरे आने से पहले होती। अपना बेटा किसी को असुंदर नहीं मालूम होता। जिसे | हमीं खो गये तुझको पाने से पहले हम स्वीकार करते हैं, वहां सौंदर्य का आविर्भाव हो जाता है। हुए तुझ बिन बसर क्या बताऊं सौंदर्य हमारे स्वीकार से पैदा होता है। किसे होश था तेरे आने से पहले। सौंदर्य कहीं बाहर कोई गण नहीं है हमारे स्वीकार की छाया हए होश गम तेरे आने से पहले। है। स्वीकार करो-और सौंदर्य पूर्ण बनने लगेगा। स्वीकार उसके आने के पहले तुम्हारा होश भी खो जायेगा, तम भी खो करो-और सौंदर्य में बड़ा आनंद आने लगेगा। स्वीकार | जाओगे। क्योंकि तुमने जिसे अब तक समझा है 'मैं', वह सिर्फ करो-और शून्य शांति, और परम शांति का धाम बन जायेगा। कूड़ा-कर्कट है। वही तो बाधा है। अगर अस्वीकार किया तो दौड़कर बाहर जाने के अतिरिक्त कोई हमीं खो गये तुमको पाने से पहले। उपाय नहीं है। और बाहर से ही तो थककर भीतर आ रहे थे। एक बड़ी महत्वपूर्ण बात याद रखना H आदमी कभी परमात्मा फिर बड़ी विक्षिप्तता पैदा होगी। से मिलता नहीं। जब तक आदमी है तब तक परमात्मा नहीं। शून्य परमात्मा का पहला अनुभव है। पूर्ण परमात्मा का | और जब परमात्मा प्रगट होता है, आदमी खो चुका होता है। अंतिम अनुभव है। शून्य की तरह परमात्मा आता है; पूर्ण की आदमी तो बीमारी है। मिट जाने पर उस परम धन्यता का तरह विराजमान होता है। शून्य की तरह आता है, क्योंकि हमारा आविर्भाव होता है। तुम जब खाली कर देते हो सिंहासन, तभी मिटना जरूरी है। शून्य की तरह आता है, क्योंकि हम सिर्फ | परमात्मा उस पर विराज पाता है। तुम जब तक बैठे हो, तब तक कूड़ा-कर्कट का ढेर हैं। हमें आग देना जरूरी है, ताकि हम जल विराज नहीं पाता। जायें और वही बचे जो कुंदन है। सिर्फ शुद्ध स्वर्ण बचे और ये पंक्तियां बड़ी मधुर हैं: कचरा जल जाये। हुए होश गुम तेरे आने से पहले तो जब सुनार सोने को आग में डालता है तो सोना भी घबड़ाता हमीं खो गये तुझको पाने से पहले होगा, चिंतित होता होगा, बच जाना चाहता होगा, अंगीठी के हुए तुझ बिन बसर क्या बताऊं बाहर आ जाना चाहता होगा। लेकिन उसे पता नहीं कि सुनार की -दिन तेरे आने के पहले कैसे बीते, यह भी कैसे बताऊं! आकांक्षा क्या है। सुनार सोने को नहीं जलाना चाहता। और किसे होश था तेरे आने से पहले! सुनार भलीभांति जानता है कि सोना जलता नहीं। जो जल जाये न तो तेरे आने के पहले होश था, क्योंकि हम बेहोश थे संसार वह सोना नहीं है। वह डाल ही रहा है आग में इसलिए कि जो में; न तेरे आने के बाद होश रहा, क्योंकि हम बेहोश हुए तुझमें। सोना नहीं है, उससे सोना अलग हो जाये। तो यह जो इन दोनों बेहोशियों के बीच-संसार की बेहोशी शून्य आग है। और परमात्मा उन्हीं को डालता है जिन पर और परमात्मा की बेहोशी; संसार की शराब और परमात्मा की उसकी अनुकंपा है। शराब-इन दोनों मधुशालाओं के बीच जो थोड़ी-सी यात्रा है पात्रता से ही शून्य उत्पन्न होता है। घबड़ाना मत! छलांग वहीं थोड़ा-सा होश रहता है। लोग या तो धन में खोये हैं, पद में लगाकर अंगीठी के बाहर मत गिर जाना। नहीं तो पहले से भी खोये हैं, मद से भरे हैं; और या फिर लोग परमात्मा में खो जाते ज्यादा कूड़ा-कर्कट संगृहीत हो जायेगा। स्वीकार करना। हैं। दोनों के बीच में, दो मधुशालाओं के बीच में जो थोड़ा-सा भीतर की यात्रा पर शून्य मिला—यह पहली खबर मिली कि फासला है, वहीं थोड़ा-सा होश रहता है। तुम पात्र होने लगे। कम से कम तुम इतने पात्र हुए कि परमात्मा 'सरोज' अभी उसी यात्रा पर है-दो मधुशालाओं के बीच Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न m जिन सूत्र भागः1 BN 58 Post mari viral / में। अगर भीतर गई तो भी होश खो जायेंगे। अगर घबड़ाकर विराजमान हो जाता है। जिसको लोग सिर्फ पैर की ठोकरें बाहर आ गई तो फिर होश खो जायेंगे। और जब दो मारकर निकल जाते थे, उसी के चरणों में लोग आकर i मधुशालाओं में ही चुनना हो, जब दो शराबों में ही चुनना हो तो | झुकाने लगते हैं, फूल चढ़ाने लगते हैं। फिर परमात्मा की ही शराब चुन लेना। संसार की तो बहुत कसम तुम्हारी बहुत गम उठा चुका हूं मैं चखी, बहुत स्वाद लिया—कुछ पाया नहीं। अब इस गलत था दावा-ए-सब्रो-शकेब, आ जाओ अपरिचित, अनजान का भी एक स्वाद ले लें। हिम्मत करना। करारे-खातिरे बेताब-थक गया हूं में। बावलापन तो उठेगा। कसम तुम्हारी बहुत गम उठा चुका हूं मैं! बंगाल में संतों का एक संप्रदाय है, उसका नाम ही 'बाउल' चाहे कितनी ही पीड़ा हो, जाना उसी की तरफ! है-बावरे, पागल! बड़े अदभुत संत हुए बाउल। नाचते कसम तुम्हारी बहुत गम उठा चुका हूं मैं! हैं-आनंद-मग्न! उस भीतर की शराब में मस्त, मदहोश! कहना भी हो, शिकायत भी करनी हो, तो उसी से करना। धीरे-धीरे उनका नाम ही 'बावरा' हो गया। लेकिन जिसे तुम | बाहर मत लौटना। यह तो कसम खा लेना कि अब बाहर नहीं समझदारी कहते हो, उससे वह लाख गुना कीमती है। लौटना है। क्योंकि बाहर को देख तो चुके बहुत, पाया क्या? तुम्हारी समझदारी भी हाथ में क्या लाती है? कुछ ठीकरे इकट्ठे | अब लौटकर भी क्या पायेंगे? हो जाते हैं, जो मौत छीन लेती है। कुछ नाम-धाम हो जाता है, कसम तुम्हारी बहुत गम उठा चुका हूं मैं जो तुम्हारे जाते ही पोंछ दिया जाता है, दूसरों के लिए जगह गलत था दावा-ए-सब्रो-शकेब... बनानी पड़ती है। और मैंने जो धैर्य और सहनशक्ति के बहुत दावे किये थे, वह दुनिया का होश है न कुछ अपनी खबर मुझे सब गलत थे। तुम उन पर ज्यादा अब भरोसा मत करो, आ बेखुद बना दिया है यूं तेरे जमाल ने। जाओ! उसमें डूबो! बेखुदी खुदा को पाने का उपाय है। आदमी ने अपने अहंकार में बहुत दफा सोचा है कि मैं मिटना होने की एकमात्र संभावना। सहनशक्ति रखता हूं, शांति रखता हूं, धैर्य रखता हूं, मेरा धैर्य यह शून्य डरायेगा, घबड़ायेगा। जैसे कोई पक्षी अब तक | अडिग है। घोंसले में रहा हो और आज अचानक खुले आकाश में: गलत था दावा-ए-सब्रो-शकेब... घबड़ायेगा! चिंतित होगा, बेचैन होगा! लौट-लौट पड़ेगा मन | -वे सब दावे जो मैंने किये थे-आत्मबल के, धैर्य के, कि चल पड़ो अपने घोंसले की तरफ, कहां इन तूफानों में उलझने | सहनशक्ति के सब गलत थे। क्षमा करो मुझे! लगे? कहां ये हवाएं और आकाश और बादल, और कहां ये गलत था दावा-ए-सब्रो-शकेब, आ जाओ सूरज और ये चांद-तारे! और यह कितना विराट है! भागो! करारे-खातिरे-बेताब थक गया हूं मैं। अपने घोंसले में छिप जाओ। ठीक वैसी दशा है। मन बहत और अब तो मैं थक गया हूं। करेगा घोंसले में उतर आने का। 'सरोज' पूछती है कि असहाय, बेसहारा...। लेकिन अब लौटना मत। अब उसको पुकारा है तो पुकारे ही तो अब बाहर मत लौटना। अब उसी से कहना कि थक गई है चले जाना। और अब सुख आये कि दुख, पीड़ा हो कि बहुत और अब मुझसे नहीं सहा जाता। लेकिन भीतर की तरफ जलन-अंगीकार कर लेना, क्योंकि हमें पता नहीं है शायद यही से आंख मत हटाना। कठिन होंगे ये क्षण। लेकिन जो गुजर हमारे जीवन-निर्माण के लिए जरूरी है। जाता है इन क्षणों से, वह एक बिलकुल नये अभिनव जीवन को छैनी से जब कोई पत्थर को तोड़ने लगता है, तो पत्थर भी तो | उपलब्ध हो जाता है। ये क्षण क्रांति के क्षण हैं। रोता होगा। लेकिन छैनी से टूट-टूटकर ही पत्थर प्रतिमा बनता | सौ में से निन्यानबे लोग तो कभी इस दशा को पहुंचते नहीं। है। जो राह के किनारे पड़ा था, वह मंदिर के अंतर्गर्भ में फिर जो सौ लोग पहुंचते हैं उनमें से निन्यानबे बाहर वापस लौट Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ : पलकन पग पोंछं आज पिया के आते हैं। इसलिए शास्त्र कहते हैं, बड़ा दुर्गम है मार्ग। प्राण तो खो ही गये हैं, लाश रह गई है। हां, लाश को भी ठीक पहुंच-पहुंचकर छूट जाता है। हाथ में आते-आते मंजिल हजारों से रासायनिक द्रव्य लगाकर रखो तो सुंदर मालूम हो सकती है। कोस के फासले पर हो जाती है। लेकिन लाश लाश है। सुंदरतम व्यक्ति की भी लाश लाश है। प्राण ही खो गये! प्राण तो विधायक तत्व है। तीसरा प्रश्नः आप महावीर की अहिंसा पर बोलते हैं तो प्रेम | प्रेम विधायक तत्व है। प्रेम का अर्थ है: कुछ तुम्हारे भीतर है। जोड़ देते हैं; बुद्ध के शून्य पर बोलते हैं तो प्रेम जोड़ देते हैं। अहिंसा का तो कुल इतना ही अर्थ है कि दूसरे के साथ बुरा मत आप कुछ भी बोलते हैं तो प्रेम उसमें अनिवार्यतः जोड़ देते हैं। करना। क्या हम संन्यासियों में प्रेम का अत्यंत अभाव देखकर ही आप | और यह मैं तुमसे कहना चाहता हूं: जब तक तुम दूसरे के प्रेम का पुनः पुनः स्मरण कराते हैं। कृपाकर कहें। साथ भला करने में न लग जाओ, तुम बुरा करने से न बच सकोगे। तुम कुछ तो करोगे। जीवन कृत्य है, कर्म है। अगर मैं जोड़ता नहीं, उघाड़ता हूं। अहिंसा नाम की मंजूषा में प्रेम का तुम्हारे रास्ते पर फूल न बिछाऊंगा तो मैं कांटे बिछाऊंगा। और ही धन छिपा है। खोलता हूं मंजूषा को। तुमसे कहता हूं, इसके ऐसा आदमी तुम न पाओगे जो कहे कि मैं सिर्फ कांटे नहीं भीतर तो देखो! यह मंजूषा बाहर से भी बड़ी सुंदर है! बड़ी| बिछाता तुम्हारे रास्ते पर, फूल से मुझे क्या लेना-देना। तुम नक्काशी है इस पर! बड़े कारीगरों ने मेहनत की है! लेकिन पाओगे कि यह आदमी या तो इतना सिकुड़ जायेगा, जैसे जैन मंजूषा कितनी ही सुंदर हो, मंजूषा है; भीतर तो देखो! मुनि सिकुड़ गये हैं कि फिर यह डरने लगेगा जीवन में उतरने से; अहिंसा तो शब्द है; सार तो प्रेम है! और अगर सार मर जाये क्योंकि उतरा कि कुछ कृत्य हुआ, कृत्य हुआ तो या तो कांटे तो फिर अहिंसा पर तुम कितनी ही नक्काशी करते रहो, फिर बिछाओ या फूल बिछाओ। और इसकी सारी शिक्षण की मंजूषा को तुम ढोते रहो सदियों-सदियों तक—उससे जीवन, | व्यवस्था यह हो गई : कांटे मत बिछाना। फूल बिछाने की तो उससे अमृत, उससे आनंद का आविर्भाव न होगा। फिर अहिंसा इसने हिम्मत खो दी। फूल बिछाने का तो खयाल ही छोड़ दिया। तार्किकों के हाथ में पड़ जायेगी। फिर वे शब्द की ही बाल की कांटे नहीं बिछाना है! खाल निकालते रहेंगे। तुम अगर किसी व्यक्ति की बीमारियां भर अलग करना चाहते महावीर ने अहिंसा शब्द का उपयोग किया प्रेम के लिए। मैं हो और उसके जीवन में स्वास्थ्य की आकांक्षा नहीं करते तो तुम कहता हूं कि अहिंसा को हटाओ और भीतर झांककर देखो। | उसे स्वास्थ्य न दे पाओगे और बीमारियां भी अलग न कर खोलो इस मंजूषा को! पाओगे। क्योंकि बीमारी का अलग होना और उसके भीतर जोड़ता नहीं हूं, उघाड़ता हूं। स्वास्थ्य का जन्म होना, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अहिंसा हो ही कैसे सकती है बिना प्रेम के? दूसरे को दुख न दूसरे को दुख न दूं, यह गौण बात है। दूसरे को मेरे जीवन से दो-यह हो ही कैसे सकता है जब तक कि दूसरे के प्रति प्रेम का सुख मिले—यह मूल बात है। आविर्भाव न हुआ हो? और अगर तुमने इसे नियम और प्रेम का इतना ही अर्थ है कि तुम दूसरे की प्रसन्नता में प्रसन्न होने औपचारिक व्यवस्था की तरह मान लिया कि दूसरे को दुख नहीं लगे। क्या है प्रेम का अर्थ? तुम कहते हो, मुझे अपनी पत्नी से देना है, क्योंकि दूसरे को दुख देने से नर्क मिलता है-प्रेम के प्रेम है या बेटे से प्रेम है या मित्र से प्रेम है-क्या मतलब है? कारण नहीं, भय के कारण दूसरे को दुख नहीं देना है तो इतना ही मतलब है कि जब तुम्हारा बेटा प्रसन्न होता है, तब तुम तुम्हारी अहिंसा में बहुत अहिंसा न होगी। तुम्हारी अहिंसा में भी प्रसन्न होते हो। जब दूसरे की प्रसन्नता तुम्हें प्रसन्न करने लगती हिंसा प्रगट होगी। तुम्हारी अहिंसा में फिर प्रेम के फूल न है, तो प्रेम। और जब दूसरे की प्रसन्नता तुम्हें अप्रसन्न करने खिलेंगे। तुम्हारी अहिंसा निर्जीव होगी। | लगती है, तो घृणा। जब दूसरे की अप्रसन्नता तुम्हें प्रसन्न करने ऐसा हुआ है, जैनों की अहिंसा निर्जीव हो गई है। उसमें से लगती है तो क्रोध, घृणा, वैमनस्य, शत्रता, हिंसा। और जब 1443 | Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिन सूत्र भागः1 SITE Samji दूसरे की प्रफुल्लता तुम्हें छूने लगती है और प्रसन्न करने लगती | इसे तुम कभी भूलना मत। मैं कोई उनकी व्याख्या नहीं कर रहा है, तो प्रेम। | हूं। उनके शब्द प्यारे हैं, पुनरुज्जीवित करने जैसे हैं। उन पर धूल अहिंसा का मेरे लिए अर्थ है कि तुम्हें सबकी प्रसन्नता प्रसन्न | जम गई बहुत, उनकी धूल झाड़ देने जैसी है। लेकिन जो मैं तुमसे करने लगे। तो तुम्हारे ऊपर कितनी विराट वर्षा न हो जायेगी! कह रहा हूं, महावीर तो उसमें बहाना हैं; कह तो मैं तुमसे वही धर्म-मेघ-समाधि ! तुम्हारे ऊपर धर्म के मेघ बरस उठेंगे। सब रहा हूं जो मैं कह सकता हूं। तरफ से किसी की भी प्रसन्नता तुम्हें प्रसन्न करने लगे! एक वृक्ष ऐसा मुझे दिखाई पड़ता है कि अहिंसा का मूल प्राण प्रेम है। में फूल खिले और तुम प्रसन्न हो जाओ! सुबह सूरज ऊगे और ऐसा मुझे दिखाई पड़ता है कि जब व्यक्ति निर्वाण को उपलब्ध तुम प्रसन्न हो जाओ! एक बच्चा मुस्कुराये और तुम प्रसन्न हो | होता है, सब भांति अहंकार-शून्य हो जाता है, तब जो शेष रह जाओ! यहां कहीं भी मुस्कुराहट हो और तुम्हारे भीतर भी आनंद | जाता है, वही प्रेम का विराट आकाश है। लेकिन यह मेरी दृष्टि प्रविष्ट हो जाये! तो सारा जगत तुम्हें प्रसन्न करने लगेगा। ऐसी है। और अगर मुझे चुनना हो महावीर में और अपने में, तो मैं प्रसन्न दशा का नाम ही संन्यास है। अपने को चुनता हूं, महावीर को नहीं चुनता। और मैं तुमसे भी और, अगर हर एक की प्रसन्नता तुम्हें दुखी करती है, जैसा कि यही कहता हूं, तुम्हें अगर चुनना हो मुझमें और अपने में तो संसार में होता है-उसी दुख का नाम संसार है। तुम किसी को अपने को चुनना, मेरी चिंता मत करना। क्योंकि आत्यंतिक हंसते नहीं देख सकते। हंसते देखते ही ईर्ष्या पैदा होती है। तुम चुनाव तो स्वयं का है। किसी का बड़ा मकान बनते नहीं देख सकते। बड़ा मकान बनते प्रेम, मेरे लिए धर्म का सार है। और मेरे देखे धर्म नष्ट हुआ, ही तुम्हारे भीतर अप्रसन्नता पैदा होती है—स्पर्धा, प्रतियोगिता, सड़ गया...जहां-जहां से प्रेम अलग हो गया धर्म से, वहीं-वहीं हिंसा, ईर्ष्या ! तुम अगर दूसरे की हंसी में हंसते भी हो तो थोथी धर्म लाश हो गया। हंसी हंसते हो, ऊपर-ऊपर हंसते हो, लोकचार, उपचार। तुम भी थोड़ा सोचो, तुम्हारे जीवन में जब प्रेम न रह जाये, तो सामाजिक शिष्टाचार है। | तुम जिंदा लाश होओगे! जब तक प्रेम है तभी तक धड़कन है। 'अहिंसा' शब्द ने बड़ा खतरा किया है। वह नकारात्मक है। | चाहे उस प्रेम का कोई भी रूप हो, चाहे वह कामवासना हो और मैं उसके भीतर छिपे हुए अकारात्मक विधायक प्रेम को उघाड़ना चाहे प्रभु-वासना हो; चाहे धन का हो, चाहे धर्म का हो; चाहे चाहता हूं। जोड़ता नहीं हूं, उघाड़ रहा हूं। देह का हो, चाहे आत्मा का हो; क्षुद्र से क्षुद्र प्रेम हो या विराट से बुद्ध ने जिसे शून्य कहा है, निर्वाण कहा है; कहा है कि तुम विराट प्रेम हो लेकिन प्रेम के बिना तम एकदम खाली हो मिट जाओ; जब तुम मिट जाते हो तो तुम्हारे भीतर जो बचता है, | जाओगे। अचानक तुम पाओगे तुम जी रहे हो, लेकिन जीवन वही प्रेम है। जितना अहंकार होगा उतना ही प्रेम कम होगा। जब बचा नहीं। निकल गया! पक्षी उड़ चुका है, पिंजड़ा पड़ा रह कोई अहंकार नहीं रह जाता तो प्रेम ही प्रेम, प्रेम का सागर है! गया है। . और, इसे भी स्मरण रखना कि जब मैं बुद्ध पर बोलता हूं तो | निराले हैं अंदाज दुनिया से अपने अपने पर ही बोलूंगा। बुद्ध तो खूटी हो सकते हैं ज्यादा से | कि तकलीद को खुदकुशी जानते हैं ज्यादा। महावीर पर बोलता हूं तो महावीर खूटी हो सकते हैं। कोई कैद समझे मगर हम तो ए दिल टांगूंगा तो मैं अपने को ही, और कोई उपाय नहीं है। और कोई मुहब्बत को आजादगी जानते हैं। उपाय हो भी नहीं सकता। तो जब मैं महावीर पर बोल रहा हूं तो निराले हैं अदांज दुनिया से अपने तुम यह मत समझ लेना कि मैं सिर्फ महावीर पर बोल रहा हूं। मैं कि तकलीद को खुदकुशी जानते हैं। कोई यंत्र नहीं हूं। मेरी अपनी दृष्टि है। तो महावीर के शब्द हाथ दूसरे के पीछे जो अंधा होकर चल रहा है वह आत्मघात कर में लूंगा, लेकिन रंग तो मेरा ही उन पर पड़ेगा। उनके शास्त्र को रहा है। उलटूंगा-पलटूंगा, लेकिन अर्थ तो मेरा होगा। कि तकलीद को खुदकुशी जानते हैं Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पलकन पग पोंछ आन पिया के कोई कैद समझे मगर हम तो ऐ दिल खुलेगा। और अगर प्रेम सध जाये तो सब सध जाता है। तो मुहब्बत को आजादगी जानते हैं। किरणों के भीतर किरणों के द्वार खुलते जाते हैं। कोई कहता हो कि कैद है...। अगर प्रेम कैद है तो वह प्रेम संत अगस्तीन से किसी ने पूछा कि मुझे एक शब्द में सारा प्रेम ही नहीं। कहीं कुछ भूल हो रही है। तुमने कुछ को कुछ शास्त्र समझा दें, ताकि मैं सदा याद रख सकूँ। तो अगस्तीन ने समझ रखा है। क्योंकि प्रेम ने तो सदा मुक्त किया। प्रेम ने तो बहुत सोचा और कहा कि फिर अगर ऐसा ही कोई शब्द चाहते इतना मुक्त किया कि तुम्हारा परमात्मा पूरा-पूरा निखार को हो, तो प्रेम। इस एक शब्द को याद रखना। इसके विपरीत मत उपलब्ध हो जाता है। जो प्रेम बांध ले वह प्रेम नहीं; जो मुक्त जाना। और सदा इसके अनुकूल व्यवहार करना; शेष सब करे, वही प्रेम है। जो तुम्हारे स्वत्व को प्रगट करे, वही प्रेम है। अपने से सुधर जायेगा। जो तुम्हारे सत्व को निखारे, शुद्ध करे, वही प्रेम है। तुम जरा सोचो। तुम्हारे जीवन में प्रेम आ जाये, मंदिर न भी प्रेम ने कभी किसी को बांधा नहीं। गये तो तुम मंदिर पहुंच जाओगे। तुम्हारे जीवन में प्रेम आ जाये तो जिन लोगों ने कहा है कि प्रेम बंधन है, उन्होंने प्रेम के कुछ और तुमने शास्त्र न भी पढ़े तो तुम शास्त्र पढ़ लोगे। ढाई आखर गलत रूप जाने होंगे। और जिन्होंने सोचा कि प्रेम को छोड़कर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय! प्रेम सम्हल जाये तो कुछ बड़ी हम मुक्त हुए, उन्होंने जिंदगी को गंवाने को जीवन समझ लिया दार्शनिक चर्चाओं में पड़ने की जरूरत नहीं है। होगा। वे सिकुड़नेवाले लोग रहे होंगे। प्रेम अस्तित्वगत धर्म है। ‘एक्ज़ीसटेंशियल'! बाकी सब मेरे देखे, फैलो तो ही तुम परमात्मा तक पहुंचोगे। जितने बकवास है। फैलो, जितने विस्तीर्ण होने लगो, उतना शुभ है। अलम-नसीबों, जिगर-फिगारों चौथा प्रश्न : मुझे समर्पण में बहुत आनंद आता है। मेरी अलम-नसीबों, जिगर-फिगारों प्रार्थना शब्दों-शब्द परमात्मा या आपके लिए होती है। ज्ञान की सुबह अफलाक पर नहीं है। का शब्द अच्छा लगता है, मगर थोड़ा अहंकार जगता है। मेरा -जो दुखी हैं, जो कारागृह में पड़े हैं, जिनके हृदय घायल हैं, प्रतिपल ध्यान में जा रहा है, ऐसा भाव सदा रहता है। तो मैं उनकी सुबह कहीं दूर किसी आकाश पर नहीं है। कौन-सा ध्यान करूं-यह बताने की कृपा करें! जहां पे हम तुम खड़े हैं दोनों सहर का रौशन उफक यहीं है। समर्पण. जिसे सध रहा हो-ध्यान हो गया। और अन्यथा -और जहां हम दोनों खड़े हैं, ठीक इसी जगह सुबह का ध्यान करने की कोई भी जरूरत नहीं है। जिसे शरणागति में मजा सूरज ऊगेगा। जहां हम हैं वहीं सूरज ऊगेगा। आ रहो हो, बस इसी मजे के सहारे को पकड़कर और-और गहरे यहीं पे गम के शरार मिलकर मजे में उतरते जाओ। रोओ, आंसू बहाओ-आनंद से, शफक का गुलजार बन गये हैं। प्रफुल्लता से। यहीं पे कातिल दुखों के तेशे एक मित्र परसों आकर कह रहे थे कि थोड़ी घबड़ाहट होती है, कतार अंदर कतार किरनों क्योंकि जब भी ध्यान करने बैठता हूं, मस्ती आती है तो आंसू के आतिशी हार बन गए हैं! आने लगते हैं और शरीर कंपने लगता है और रोमांच हो जाता जहां हम हैं. जैसे हम हैं. वहीं ठीक हमारी ही मौजदगी और है। तो मैंने पछा. क्या करते हो? तो उन्होंने कहा, मैं रोक लेता हमारी आज की इस स्थिति में, द्वार खुल सकता है। वह द्वार प्रेम हूं जबर्दस्ती। सुशिक्षित व्यक्ति हैं—अब रोएं! और काफी उम्र हो गई है। वृद्ध हैं, कोई पैंसठ के करीब उम्र हो गई है। तुम परमात्मा को आकाश में मत खोजना, अन्यथा भटकोगे | जिंदगीभर कभी रोए नहीं, आंख कभी गीली न की। रोमांच हो व्यर्थ। तुम तो परमात्मा को हृदय के प्रेम में खोजना, तो द्वार जाता है। शरीर कंपने लगता है। कोई समझेगा कि क्या का है। 1445 Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिन सूत्र भागः पागलपन हो गया कि बीमारी हो गई कछ, तो रोक लेते हैं। निखार लो, रो लो! कहीं ऐसा न हो कि वह आ जाये और मैंने उनको कहा कि अब यह खतरनाक कर रहे हो। एक तरफ तुम्हारी आंखें गीली न हों। तो पैदा कर रहे हो-प्रार्थना, पूजा, ध्यान से और फिर रोक है खबर गर्म उनके आने की रहे हो। यह तो विरोधाभासी कृत्य हो जायेगा। यह तो तुम्हारी आज ही घर में बोरिया न हुआ। जीवन-ऊर्जा में विरोध, संकट पैदा हो जायेगा। यह तो बिछाने को आसन घर में नहीं है और उनके आने की खबर आ खरतनाक है। प्रसन्न होओ, आंसुओं को आनंद से बहने दो! | गई है! आनंद के लक्षण हैं आंसू! लेकिन हमने एक ही ढंग के आंसू कोई फिक्र नहीं, बिना आसन के चल जायेगा। लेकिन और जाने हैं—वे दुख के आंसू हैं। | भी कुछ ज्यादा महत्वपूर्ण जरूरी चीजें हैं। आदमी ने कई महत्वपूर्ण चीजों के अनुभव खो दिये; उनमें एक | पलकन पग पोंछू आज पिया के महत्वपूर्ण आंसू भी हैं। आंसू को सीमित कर लिया है; जब अंसुअन पूर्छ हाल हिया के। दुखी होते हैं, तभी रोते हैं। आंसू का दुख से कुछ लेना-देना नहीं | बोरिया न हुआ, चलेगा। लेकिन कहीं ऐसा न हो कि पैर है। आंसू का संबंध तो अतिरेक से है। दुख ज्यादा हो जाये तो पोंछने के लिए पलकें न हों! कहीं ऐसा न हो कि हाल हिया के आंसू की जरूरत आ जाती है। आनंद ज्यादा हो जाये तो आंसू पूछने के लिए आंसू न हों! की जरूरत आ जाती है। जो इतना ज्यादा हो जाये कि प्याली के पलकन पग पोंछू आज पिया के ऊपर से बहने लगे, तो आंसू आते हैं। आंसू का कोई संबंध न अंसुअन पूर्वी हाल हिया के। दुख से है न सुख से है-अतिरेक से है। उसकी तैयारी करो! निमंत्रण भेज दिया, तो आता ही होगा। तो तुम कभी आनंद में रोये या नहीं? अगर आनंद में नहीं रोये बुलाया है तो आयेगा ही। अब तुम उसके आने की चिंता न तो तुमने आंसुओं की जो सबसे ऊंची चरम अनुभूति थी वह चूक | करके, अपनी तैयारी करो। गये। तब तुमने बहुत साधारण-सी अनुभूति दुख की जानी। और बड़ी से बड़ी तैयारी है कि तुम हृदय भरकर रो सको, कि और दुख के कारण, लोग कहते हैं कि हिम्मत रखो, रोओ मत! तुम परिपूर्ण डूबकर नाच सको, कि अवाक, आश्चर्यचकित और लोग कहते हैं, मर्द बनो, रोओ मत! यह क्या बच्चों के जैसे घड़ियां बीत जायें और तुम ठगे-से रह सको! या स्त्रियों जैसे रोने लगे? तुम मिले, प्राण में रागिनी छा गई! आंसू का जो एक और अनूठा रूप है—आनंद का, अहोभाव भूलती सी जवानी नई हो उठी का-उससे मनुष्यता वंचित ही हो गई है। जिस दिवस प्राण में नेह बंसी बजी . नारद ने अपने सूत्रों में कहा है: भक्त रोमांचित होता! बालपन की रवानी नई हो उठी आंसुओं से भर जाता! गदगद हो जाता! कंपित होने लगती कि रसहीन सारे बरस रस भरे उसकी देह ! रो-रोआं पुलकित हो जाता! हो गए, जब तुम्हारी छटा भा गई तो जिसको समर्पण में, शरणागति में, आनंद आ रहा है, वह तुम मिले, प्राण में रागिनी छा गई! ध्यान की फिक्र न करे। प्रार्थना! जलाये धूप-दीप! नाचे। भक्त तो यह मानकर ही चलता है कि तुम चल ही पड़े रोये! पुलकित हो! थोड़े क्षणों को पागल होने की कला सीखे! होओगे! खबर मिल ही गई होगी तुम्हें! थोड़े क्षणों को भूले समझदारी और संसार! थोड़ी देर को मीरा वह तैयारी में जुट जाता है। बने! लोक-लाज खोई! साधक तो भगवान को खोजता है; भक्त तो भगवान को ध्यान की कोई जरूरत नहीं है-प्रार्थना की जरूरत है। ध्यान | मानता है। साधक को तो अभी तय करना है कि भगवान है या है संकल्प के मार्ग पर। प्रार्थना है समर्पण के मार्ग पर। इसके नहीं। भक्त को उतना तो तय है कि भगवान है; अब इतना ही पहले कि परमात्मा आये, प्रार्थना खूब कर लो, आंखों को खूब | देखना है कि मेरी पात्रता है या नहीं। इस भेद को स्मरण रखना। 446 Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पलकन पग पोंछु आज पिया के साधक सत्य को खोजने के लिए अपनी पात्रता इकट्ठी करता तो ऐसा हुआ होगा। है। भक्त, सत्य तो है ही, प्रभू तो है ही, अब मैं उसके योग्य बन, बहत युवक मझे सनने आ जाते हैं, यवतियां सनने आ जाती इसके लिए अपनी पात्रता इकट्ठी करता है। दोनों की दिशाओं में हैं। यह शुभ लक्षण है। क्योंकि बूढ़े धर्म की बात सुनने आयें, बड़ा फर्क है। | यह अशुभ लक्षण है। बूढ़े तो धर्म की बात सुनने तभी आते हैं सत्य का खोजी विचार-निर्विचार के पंखों से चलता है। जब जिंदगी में उनके सब उपाय व्यर्थ हो गये, मौत करीब आने भक्त-न विचार, न निर्विचार; भाव, भक्ति, पूजा, प्रार्थना! लगी! मौत के भय से! और जब बूढ़े ही मंदिर, मस्जिदों में आने एक तो तय ही है बात कि परमात्मा है, इसलिए खोजने का उसके | लगते हैं और जवान वहां से खो जाते हैं, तो वे मंदिर-मस्जिद भी पास सवाल नहीं है। वह खोजने की झंझट में नहीं पड़ता। उसे कब्रों जैसे हो जाते हैं, मुर्दा हो जाते हैं। शुभ है तो अपने होने की वजह से इतना पर्याप्त प्रमाण मिल गया है कि युवतियां भी धर्म को समझने की कोशिश करें, क्योंकि उनके जीवन है, जीवन का स्रोत भी है। अपनी किरण को देखकर ही कारण धर्म भी यवा रहता है। जब भी धर्म जद समझ गया कि सूरज भी है, अन्यथा किरण कैसे होती? मैं हूं, उसमें वृद्ध तो आते ही हैं, युवा भी आते हैं। इतना काफी है। तू भी है। अब कैसे मैं अपने को तैयार कर लूं? | और यह फर्क समझ लेना। मुझे तो जो वृद्ध भी सुनने आते हैं, तो अत्यंत प्रेम से भरकर प्रतीक्षा करो! उसकी पग-ध्वनि वे भी तभी आ सकते हैं जब वे किसी गहरे अर्थ में अभी भी युवा सुनो! आता ही होगा! द्वार पर कान लगाकर बैठ जाओ। उसके हों। और मंदिर-मस्जिदों में अगर कभी कोई जवान भी पहुंच विरह में, जब तक नहीं आया है, उसकी अनुपस्थिति में, उसके| जाता है तो तभी पहुंचता है जब वह किसी गहरे अर्थ में बूढ़ा हो अभाव में भी, उसके भाव को अनुभव करो। उसका अभाव भी चुका; वह जिंदा नहीं है अब, रुग्ण है। क्योंकि मैं जो कह रहा प्यारा है। इसे समझना। हूं, वह जीवन-विरोधी नहीं है। मैं जो कह रहा हूं, वह महाजीवन संसार की चीजें मिल भी जायें तो कुछ नहीं मिलता; और की खोज है। परमात्मा न भी मिले, सिर्फ उसकी याद भी मिल जाये तो सब तो अनेक बार ऐसा हो जायेगा कि युवा-युवती आ जायेंगे मिल जाता है! सुनने, सुनकर उनको कई रूपांतरण होंगे। जिसे उन्होंने कल तक हंसी-खुशी समझा था, वह हंसी-खुशी मालूम न होगी। अच्छा आखिरी प्रश्नः आपको सुनने के पूर्व मैं कालेज की है, कुछ बोध जगना शुरू हुआ। क्योंकि अब तक जिसे हंसती-खेलती छात्रा रही; सुनने के बाद न जाने क्या हुआ कि | हंसी-खुशी जाना था, वह केवल नासमझी थी, वह केवल कहीं भी रुचि नहीं लगती-सुख-भोग में भी नहीं। सत्संग में बचपना था। अभी खिलौनों से खेलते रहे थे। मेरे पास आकर आती भी हूं और आने से कतराती भी हूं। कृपापूर्वक उनको दिखाई पड़ जायेगा, ये तो खिलौने हैं। रस खो जायेगा। मार्ग-दर्शन दें। असली जीवन की शुरुआत के पहले खिलौनों में रस खो जाना जरूरी है। जो हंसना-खेलना इतनी सरलता से खो जाये, उसका कोई | फिर आने में डर भी लगेगा। आने का मन भी होगा। आने से मूल्य नहीं। मैं तुम्हें ऐसा हंसना-खेलना सिखाऊंगा जो फिर खो बचना भी संभव नहीं है और डर भी लगेगा। डर लगेगा कि कहीं न सके। ऐसा न हो कि सारा जीवन का रस खो जाये। और आने से रुकना एक तो बचपन है, जिसमें बच्चे प्रसन्न होते हैं। उस प्रसन्नता भी असंभव होगा, क्योंकि कोई रस पैदा होगा जो पुकारेगा और का कोई बहुत मूल्य नहीं है—जिंदगी उसे नष्ट कर देगी। फिर बुलायेगा। एक दुविधा पैदा होगी। यह भी शुभ लक्षण है। यह एक और बचपन है, जो जीवन की चरम प्रौढ़ता से उपलब्ध होता सोच-विचारशील व्यक्ति का लक्षण है। है। संत फिर छोटे बच्चों जैसे हो जाते हैं। फिर एक हंसना और सोच-विचारशील व्यक्ति को जीवन में हजार ऐसे मौके आते खेलना पैदा होता है; उसे फिर कोई भी न छीन सकेगा। | हैं, जहां उसे तय करना पड़ता है; जहां आधा मन कहता है मत Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - जिन सूत्र भागः1 1 जाओ, आधा कहता है जाओ। कायर आदमी उस आधे मन की निकल गया। मान लेता है, जो कहता है मत जाओ। साहसी व्यक्ति उस आधे यह स्थिति सभी के सामने आयेगी। मेरे साथ चलना है तो मन की मानता है जो कहता है, करो अभियान! खोजो नये को! बहुत कुछ जो तुम्हारी जिंदगी में तुम्हें कल तक मूल्यवान मालूम अपरिचित राह को चुनो! होता रहा, मूल्यहीन हो जायेगा। लेकिन मैं तुमसे कहता है, पश्चिम के एक बहुत बड़े कवि से किसी ने पूछा कि तुम्हारे | अज्ञात के लिए सदा अपने द्वार खुले रखना। क्योंकि वही द्वार जीवन में सबसे महत्वपूर्ण बात जिसने तुम्हारे जीवन के अर्थ को | है, जिससे परमात्मा प्रवेश करता है। निर्णीत किया, कौन-सी थी? तो उसने कहा कि जब मेरे पिता मर रहे थे तो उन्होंने मुझे पास बुलाया और कहा कि सुन, जीवन आज इतना ही। के हर कदम पर दो रास्ते खुलते हैं। एक रास्ता जाना-माना, जिस पर तुम चलते रहे हो; और एक रास्ता अपरिचित अनजाना, जिस पर तुम कभी नहीं चले हो। मन सदा कहेगा, जाने-माने को चुन लो, क्योंकि मन बहुत आर्थोडाक्स है। जाने-माने को कभी मत चुनना, क्योंकि जिस पर चलते ही रहे हो, अब और चलकर क्या होगा? अनजाने को चुन लेना। और जिंदगी के हर रास्ते पर दो कदम खुलते हैं। दो रास्ते खुलते हैं। सदा अनजाने को चुनते रहना। उस कवि ने कहा, मैंने पिता की बात मान ली। बड़ी कठिन थी। और कई बार भूला। कई बार चूका। लेकिन फिर भी उस सूत्र को सम्हाले रहा। इसी तरह मेरे जीवन में रोज-रोज सत्य की नयी-नयी सुबह हुई; सत्य का नया-नया सूरज निकला। अपरिचित, अनजान, अज्ञात-उसे जो चुनता है, उसने परमात्मा को चुना। तो डर लगेगा यहां आने में। क्योंकि मैं तुम्हें रोज अनजान की तरफ, अपरिचित की तरफ धक्के दूंगा। मन कहेगा, रुक जाओ, मत जाओ। ' इलाहाबाद में मैं बोल रहा था कई वर्षों पहले। जिन मित्र ने मुझे बुलाया था, वे हिंदी के एक कवि और लेखक हैं। वे सामने ही बैठे थे। कोई दस-पंद्रह मिनट मैंने देखा कि उनकी आंखों से आंसू गिरते रहे; फिर वे एकदम से उठे और भवन के बाहर निकल गये। उन्होंने ही मुझे बुलाया था। फिर तीन दिन उनका कोई पता ही न चला। जब विदा का दिन आया तो वह मुझे स्टेशन छोड़ने आये। मैंने पूछा कि कहां चल दिये। उन्होंने कहा कि पंद्रह मिनट तो मैं सुनता रहा, फिर मैं डरा। फिर मुझे लगा कि यह आदमी खतरे में ले जायेगा। तो मैंने कहा कि इसके पहले कि कोई झंझट शुरू हो, यहां से निकल जाना चाहिए। तो मैं 448