Book Title: Jain Agamo ki Mul Bhasha Ardhamagadhi ka Shaurseni
Author(s): Sagarmal Jain
Publisher: Z_Vijyanandsuri_Swargarohan_Shatabdi_Granth_012023.pdf
Catalog link: https://jainqq.org/explore/210575/1

JAIN EDUCATION INTERNATIONAL FOR PRIVATE AND PERSONAL USE ONLY
Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन आगमों की मूलभाषा : अर्धमागधी या शौरसेनी? प्रो.(डॉ.,सागरमल जैन पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी...2 वर्तमान में 'प्राकृतविद्या' नामक शोधपत्रिका के बाद में अर्धमागधी में रूपान्तरित किया गया। अपने इस कथन माध्यम से जैनविद्या के विद्वानों का एक वर्ग आग्रह ह के पक्ष में वे श्वेताम्बर दिगंबर किन्ही भी आगमों का प्रमाण न प्रतिपादन कर रहा है कि जैन आगमों की मल भाषा शौरसेनी देकर प्रो. टाँटिया के व्याख्यान से कुछ अंश उद्धत करते हैं। प्राकत थी, जिसे कालान्तर में परिवर्तित करके अर्धमागधा डा. सुदीप जैन ने प्राकृतविद्या जनवरी-मार्च ९६ के सम्पादकीय बना दिया गया। इस वर्ग का यह भी दावा है कि शौरसेनी में उनके कथन को निम्न रूप में प्रस्तुत किया है-- प्राकृत ही प्राचीनतम प्राकृत है और अन्य सभी प्राकृतें यथा - "हाल ही में लालबहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ में सम्पन्न मागधी, पैशाची, महाराष्ट्री आदि इसी से विकसित हुई हैं, अतः द्वितीय आचार्य कुन्दकुन्दस्मृति व्याख्यानमाला में विश्वविश्रुत वे सभी शौरसेनी प्राकृत से परवर्ती भी हैं। इसी क्रम में दिगंबर - भाषाशास्त्री एवं दार्शनिक विचारक प्रो. नथमल जी टाँटिया ने परंपरा में आगमों के रूप में मान्य आचार्य कन्दकन्द के ग्रन्थों स्पष्ट रूप से घोषित किया कि श्रमण साहित्य का प्राचीनरूप, में निहित अर्धमागधी और महाराष्ट्री शब्द रूपों को परिवर्तित चाहे वे बौद्धों के त्रिपिटक आदि हों, श्वेताम्बरों के आचारांगसूत्र, दशवैकालिकसूत्र आदि हों अथवा दिगंबरों के षटखण्डागमसूत्र, कर उन्हें शौरसेनी में रूपान्तरित करने का एक सुनियोजित समयसार आदि हों, सभी शौरसेनी प्राकृत में ही निबद्ध थे। प्रयत्न भी किया जा रहा है। इस समस्त प्रचार-प्रसार के पीछे उन्होंने आगे सप्रमाण स्पष्ट किया कि बौद्धों ने बाद में श्रीलंका मूलभूत उद्देश्य यह है कि श्वेताम्बर-मान्य आगमों को दिगंबर में एक बृहत्संगीति में योजनापूर्वक शौरसेनी में निबद्ध बौद्धसाहित्य परंपरा में मान्य आगम तुल्य ग्रंथों से अर्वाचीन और अपने . का मागधीकरण किया और प्राचीन शौरसेनी निबद्ध बौद्ध-साहित्य शौरसेनी में निबद्ध आगम तुल्य ग्रंथों को प्राचीन सिद्ध किया के ग्रंथों को अग्निसात् कर दिया। इसी प्रकार श्वेताम्बर जैन जाए। इस पारस्परिक विवाद का एक परिणाम यह भी हो रहा साहित्य का भी प्राचीन रूप शौरसेनी प्राकृत में ही था, जिसका है कि श्वेताम्बर-दिगंबर परंपरा के बीच कटुता की खाई गहरी रूप क्रमशः अर्धमागधी में बदल गया। यदि हम वर्तमान होती जा रही है और इस सब में एक निष्पक्ष भाषाशास्त्रीय अर्धमागधी आगम साहित्य को ही मूल श्वेताम्बर आगम साहित्य अध्ययन को पीछे छोड़ दिया जा रहा है। प्रस्तुत निबंध में मैं मानने पर जोर देंगे, तो इस अर्धमागधी भाषा का आज से पंद्रह इन सभी प्रश्नों पर श्वेताम्बर परंपरा में आगम रूप में मान्य ग्रंथों सौ वर्ष पहिले अस्तित्व ही नहीं होने से इस स्थिति में हमें अपने के आलोक में चर्चा करने का प्रयत्न करूंगा। आगम साहित्य को भी ५०० ई. के परवर्ती मानना पड़ेगा।" क्या आगम साहित्य मूलतः शौरसेनी प्राकृत में उन्होंने स्पष्ट किया कि आज भी आचारांगसूत्र आदि की प्राचीन प्रतियों में शौरसेनी के शब्दों की प्रचुरता मिलती है, निबद्ध था ? जबकि नए प्रकाशित संस्करणों में उन शब्दों का अर्धमागधीकरण यहाँ सर्वप्रथम मैं इस प्रश्न की चर्चा करना चाहूंगा कि हो गया है। उन्होंने कहा कि पक्षव्यामोह के कारण.ऐसे परिवर्तनों क्या जैन आगम साहित्य मूलतः शौरसेनी प्राकृत में निबद्ध था से हम अपने साहित्य का प्राचीन मूल रूप खो रहे हैं। उन्होंने और उसे बाद में परिवर्तित करके अर्धमागधी रूप दिया गया? स्पष्ट शब्दों में कहा कि दिगंबर जैन साहित्य में ही शौरसेनी भाषा कछ जैन विद्या के विद्वानों की यह मान्यता है कि जैन आगम के प्राचीनरूप सरक्षित रूप में उपलब्ध हैं। साहित्य मूलतः शौरसेनी प्राकृत में निबद्ध हआ था और उसे निस्संदेह प्रो. टाँटिया जैन और बौद्धविद्याओं के वरिष्ठतम హరహరహరహరుశారుగాంచారయగారురరరర రరరరరరwronుగారుగారంలో Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यतीन्द्र सूरि स्मारकग्रन्थ - जैन आगम एवं साहित्य विद्वानों में एक हैं और उनके कथन का कोई अर्थ और आधार अवश्य हो रही है। डा. सुदीपजी प्राकृतविद्या जुलाई-सितंबर ९६ भी होगा। किन्तु ये कथन उनके अपने हैं या उन्हें अपने पक्ष की में डा. टाँटिया जी के उक्त व्याख्यानों के विचार-बिन्दुओं को पुष्टि हेतु तोड़-मोड़कर प्रस्तुत किया गया है, यह एक विवादास्पद अविकल रूप से प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं कि - 'हरिभद्र का प्रश्न है? क्योंकि एक ओर तुलसीप्रज्ञा के सम्पादक का कहना है सारा योगशतक धवला से है। कि टाँटिया जी ने इसका खण्डन किया है। वे तुलसीप्रज्ञा इसका तात्पर्य है कि हरिभद्र ने योगशतक को धवला के (अप्रैल-जून ९३.खंड २२,अंक ४) में लिखते हैं कि "डा. आधार पर बनाया है। क्या टाँटिया जी जैसे विद्वान् को नथमल टांटिया ने दिल्ली की एक पत्रिका में छपे और उनके इतना भी इतिहास-बोध नहीं है कि योगशतक के कर्ता हरिभद्र नाम से प्रचारित इस कथन का खंडन किया है कि महावीरवाणी सूरि और धवला के कर्ता में कौन पहले हुआ है? यह तो ऐतिहासिक शौरसेनी प्राकत में निबद्ध हुई। उन्होंने स्पष्ट मत प्रकट किया कि सत्य है कि हरिभद्रसूरि का योगशतक (आठवीं शती) धवला आचारांग, उत्तराध्ययन, सूत्रकृतांग और दशवैकालिक में (दसवीं शती) से पूर्ववर्ती है। मुझे विश्वास भी नहीं होता है कि अर्धमागधी भाषा का उत्कृष्ट रूप है।" टाँटिया जैसा विद्वान् इस ऐतिहासिक सत्य को अनदेखा कर दे। दूसरी ओर प्राकृतविद्या के सम्पादक डा. सुदीपजी का कहीं न कहीं उनके नाम पर कोई भ्रम खड़ा किया जा रहा है। डा. कथन है कि उनके व्याख्यान की टेप हमारे पास उपलब्ध है टांटिया जी को अपनी चुप्पी तोड़कर भ्रम का निराकरण करना और हमने उसे अविकल रूप से यथावत दिया है। मात्र इतना चाहिए था। वस्तुतः यदि कोई भी चर्चा प्रमाणों के आधार पर ही नहीं डा. सुदीपजी का तो यह भी कथन है कि तुलसीप्रज्ञा के नहीं होती है तो उसे मान्य नहीं किया जा सकता है, फिर चाहे उसे खण्डन के बाद भी वे टाँटिया जी से मिले हैं और टाँटियाजी ने कितने ही बड़े विद्वान् ने क्यों नहीं कहा हो। यदि व्यक्ति का ही उनसे कहा है कि वे अपने कथन पर आज भी दृढ़ हैं।टाँटियाजी महत्त्व मान्य है तो अभी संयोग से टॉटिया जी से भी वरिष्ठ के इस कथन को उन्होंने प्राकृतविद्या जुलाई-सितंबर ९६ के अंतरराष्ट्रीय ख्याति के जैन बौद्ध विद्याओं के महामनीषी और अंक में निम्न शब्दों में प्रस्तुत किया -- स्वयं टाँटिया जी के गुरु पद्म विभूषण पं. दलसुख भाई हमारे "मैं संस्कृत विद्यापीठ की व्याख्यानमाला में प्रस्तत तथ्यों बीच हैं, फिर तो उनके कथन को अधिक प्रमाणिक मानकर पर पर्णतया दृढ हँ तथा यह मेरी तथ्याधारित स्पष्ट अवधारणा है . प्राकृतविद्या के सम्पादक को स्वीकार करना होगा। खैर ये सब जिससे विचलित होने का प्रश्न ही नहीं उठता है।" (पृ. ९) प्रास्तविक बातें थीं, जिनसे यह समझा जा सके कि समस्या क्या है? कैसे उत्पन्न हुई और प्रस्तुत संगोष्ठी की क्या आवश्यकता है? यह समस्त विवाद दो पत्रिकाओं के माध्यम से दोनों हमें तो व्यक्तियों के कथनों या वक्तव्यों पर न जाकर तथ्यों के सम्पादकों के मध्य है, किन्तु इस विवाद में सत्यता क्या है और प्रकाश में इसकी समीक्षा करनी है कि आगामों की मूलभाषा डा. टाँटिया का मूल मन्तव्य क्या है, इसका निर्णय तो तभी क्या थी और अर्धमागधी और शौरसेनी में कौन प्राचीन है? संभव है, जब डा. टाँटिया स्वयं इस संबंध में लिखित वक्तव्य देते, किन्तु वे इस संबंध में मौन रहे हैं। मैंने स्वयं उन्हें पत्र लिखा आगमों की मूलभाषा अर्धमागधी था, किन्तु उनका कोई प्रत्युत्तर नहीं आया। मैं डा. टाँटिया की यह एक सुनिश्चित सत्य है कि महावीर का जन्मस्थान उलझन समझता हूँ एक ओर कुन्दकुन्द-भारती ने उन्हें कुन्दकुन्द- और कार्यक्षेत्र दोनों ही मख्य रूप से मगध और उसके समीपवर्ती व्याख्यान-माला में आमन्त्रित कर पुरस्कृत किया है, तो दूसरी प्रदेश में ही था, अत: यह स्वाभाविक है कि उन्होंने जिस भाषा ओर वे जैन विश्वभारती की सेवा में हैं, जब जिस मंच से बोले को बोला होगा वह समीपवर्ती क्षेत्रीय बोलियों से प्रभावित मागधी होंगे भावावेश में उनके अनुकूल वक्तव्य दे दिए होंगे और अब अर्थात् अर्धमागधी रही होगी। व्यक्ति की भाषा कभी भी अपनी स्पष्ट खण्डन भी कैसे करें? फिर भी मेरी अन्तरात्मा यह स्वीकार मातभाषा से अप्रभावित नहीं होती है। पनः श्वेताम्बर परम्परा में नहीं करती है कि डा. टाटिया जैसा गंभीर विद्वान् बिना प्रमाण मान्य जो भी आगम साहित्य आज उपलब्ध है. उसमें अनेक ऐसे के ऐसे वक्तव्य दे दे। कहीं न कहीं शब्दों की कोई जोड़-तोड़ संदर्भ है. जिनमें स्पष्ट रूप से यह उल्लेख है कि महावीर ने ansaniduirdandiromabrdindidrionirdostonirominionia-[१०३ideredniaiduirdwordGrandirisordibandhronibidrivarta Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ --- यतीन्द्र सूरि स्मारकग्रन्थ - जैन आगम एवं साहित्य अपने उपदेश अर्धमागधी भाषा में दिए थे। मात्र यही नहीं वर्तमान में भी दिगंबर परंपरा के महान संत इस संबंध में अर्धमागधी आगम साहित्य से कुछ प्रमाण एवं आचार्य विद्यासागर जी के प्रमुख शिष्य मुनि श्री प्रमाण सागरजी अपनी पुस्तक जैन-धर्मदर्शन (पृ. ४०) में लिखते हैं कि उन प्रस्तुत किए जा रहे हैं यथा-- भगवान् महावीर का उपदेश सर्वग्राह्य अर्धमागधी भाषा में हुआ। १. भगवं च णं अद्धमागहीए भासाए धम्ममाइक्खइ। समवायांग, जब श्वेताम्बर और दिगंबर दोनों ही परंपराएँ यह मानकर समवाय ३४, सूत्र २२ चल रही हैं कि भगवान का उपदेश अर्धमागधी में हुआ था और तए णं समणे भगवं महावीरे कुणिअस्स भंभसारपुतस्स इसी भाषा में उनके उपदेशों के आधार पर आगमों का प्रणयन अद्धमागहीए भासाए भासत्ति अरिहाधम्म परिकहइ। - हुआ तो फिर शौरसेनी के नाम से नया विवाद खड़ा करके इस औपपातिक सूत्र खाई को चौड़ा क्यों किया जा रहा है? यह तो आगमिक प्रमाणों ३. गोयमा। देवाणं अद्धमागहीए भासाए भासंति सवि य णं की चर्चा हुई। व्यावहारिक एवं ऐतिहासिक तथ्य भी इसी की अद्धमार्गहा भासा भासिज्जमाणी विसज्जति। भगवई, लाडनूं पुष्टि करते हैं-- शतक ५,उद्देशक ४,सूत्र ९३ १. यदि महावीर ने अपने उपदेश अर्धमागधी में दिए तो तए णं समणे भगवं महावीरे उसभदत्त माहणस्स देवाणंदा यह स्वाभाविक है कि गणधरों ने उसी भाषा में आगमों का माहणीए तीसेय महति महलियाए इसिपरिसाए मुणिपरिसाए प्रणयन किया होगा। अतः सिद्ध है कि आगमों की मूलभाषा जइपरिसाए...सव्व भासाणुगामणिए सरस्सईए क्षेत्रीय बोलियों से प्रभावित मागधी अर्थात् अर्धमागधी रही है। जोयणणीहारिणासरेणं अद्धमगहाए भासाए भासइ धम्म । २. इसके विपरीत शौरसेनी आगम तुल्य मान्य ग्रन्थों में परिकहइ। भगवई लाडनूं शतक ९,उद्देशक ३३,सूत्र १४९ किसी एक भी ग्रन्थ में एक भी संदर्भ ऐसा नहीं है, जिससे यह तए णं समणे भगवं महागीरे जामालिस्स प्रतिध्वनित भी होता हो कि आगमों की मूल भाषा शौरसेनी खत्तियकुमारस्स...अद्धमागहाए भासाए भासइ धम्म प्राकृत थी। उनमें मात्र यह उल्लेख है कि तीर्थंकरों की जो वाणी परिकहइ। भगवई लाडनूं शतक ९.उद्देशक ३३,सूत्र १६३ ।। खिरती है, वह सर्वभाषारूप परिणत होती है। उसका तात्पर्य ६. सत्तसत्तसमदरिसीहिं अद्धमागहाए भासाए सुत्तं उवदिटुं। मात्र इतना ही है कि उनकी वाणी जन साधारण को आसानी से आचारांग चूर्णि,जिनदासगणि पृ. २५५ समझ में आती थी। वह लोकवाणी थी। उसमें मगध के निकटवर्ती क्षेत्रों की क्षत्रीय बोलियों के शब्द-रूप भी होते थे और यही मात्र इतना ही नहीं, दिगंबर परंपरा में मान्य आचार्य कुन्दकुन्द कारण था कि उसे मागधी न कहकर अर्धमागधी कहा गया था। के ग्रन्थ बोधपाहुड, जो स्वयं शौरसेनी में निबद्ध है, उसकी टीका में दिगंबर आचार्य श्रुतसागर जी लिखते हैं कि भगवान् ३. जो ग्रन्थ जिस क्षेत्र में रचित या सम्पादित होता है, महावीर ने अर्धमागधी भाषा में अपना उपदेश दिया। प्रमाण के उसका वहाँ की बोली से प्रभावित होना स्वाभाविक है। प्राचीन लिए टीका के अनुवाद का वह अंश प्रस्तुत है। 'अध' मगध देश स्तर के जैन आगम यथा -आचारांग, सूत्रकृतांग इसिभासियाई भाषात्मक और अर्ध सर्वभाषात्मक भगवान् की ध्वनि खिरती (ऋषिभाषित), उत्तराध्ययन, दशवकालिक आदि मगध और उसके है। शंका-अर्धमागधी भाषा देवकृत अतिशय कैसे हो सकती है समीपवर्ती क्षेत्र में रचित हैं उनमें इसी क्षेत्र के नगरों आदि की क्योंकि भगवान की भाषा ही अर्धमागधी है? उत्तर-मगध देव के सूचनाएँ हैं। मूल आगमों में एक भी ऐसी सूचना नहीं है कि सानिध्य से होने से आचार्य प्रभाचन्द्र ने नन्दीश्वर भक्ति के अर्थ महावीर ने बिहार, बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आगे विहार में लिखा है "एक योजन तक भगवान् की वाणी स्वयमेव सुनाई किया हो। अतः उनकी भाषा अर्धमागधी रही होगी। देती है। उसके आगे संख्यात योजनों तक उस दिव्यध्वनि का विस्तार मगध जाति के देव करते हैं। अतः अर्धमागधी भाषा ४. पुनः आगमों की प्रथम वाचना पाटलीपुत्र में और देवकृत है। (षट्प्राभृतम् चतुर्थ बोधपाहुड टीका पृ. १७६/२१) दूसरी वाचना खण्डगिरि (उड़ीसा) में हुई, ये दोनों क्षेत्र मथुरा से दूसर Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यतीन्द्र सूरि स्मारकग्रन्त्य - जैन आगम एवं साहित्य - पर्याप्त दूरी पर स्थित हैं, अत: कम से कम प्रथम और द्वितीय आगमों के भाषिक स्वरूप में परिवर्तन : वाचना के समय तक अर्थात् ई.पू. दूसरी शती तक उनके शौरसेनी कब और कैसे? में रूपान्तरित होने का या उससे प्रभावित होने का प्रश्न ही नहीं यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि स्कंदिल की इस माथुरी वाचना उठता है। के समय ही समानान्तर रूप से एक वाचना वलभी (गुजरात) यह सत्य है कि उसके पश्चात् जब जैन धर्म एवं विद्या का में नागार्जन की अध्यक्षता में हई थी और इसी काल में उन पर केन्द्र पाटलीपुत्र से हटकर लगभग ई. पू. प्रथम शती में मथुरा मदागी भाव भी आया क्योंकि उस क्षेत्र की प्राकत महाराष्ट्री बना तो उस पर शौरसेनी का प्रभाव आना प्रारंभ हुआ हो। प्राकृत थी। इसी महाराष्ट्री प्राकृत से प्रभावित आगम आज तक यद्यपि मथरा से प्राप्त दूसरी शती तक के अभिलेखों का शौरसेनी श्वेताम्बर परंपरा में मान्य हैं। अतः इस तथ्य को भी स्पष्ट रूप से के प्रभाव से मुक्त होना यही सिद्ध करता है, जैनागमों पर समझ लेना चाहिए कि आगमों के महाराष्टी प्रभावित और शौरसेनी का प्रभाव दूसरी शती के पश्चात् ही प्रारंभ हुआ होगा। शौरसेनी प्रभावित संस्करण जो लगभग ईसा की चतर्थ-पंचम सभवतः फल्गमित्र (दसरा शती) के समय या उसके भी पश्चात् शती में अस्तित्व में आए उनका मल आधार अर्धमागधी स्कंदिल (चतुर्थ शती) की माथुरी वाचना के समय उन पर आगम ही थे। यहाँ भी ज्ञातव्य है कि न तो स्कंदिल की माथरी शौरसेनी प्रभाव आया था, यही कारण है कि यापनीय परंपरा में वाचना में और न नागार्जुन की वलभी वाचना में आगमों की वाचना में और न नागार्जन की वला मान्य आचारांग, उत्तराध्ययन, दशवैकालिक, निशीथ, कल्प आदि भाषा में सोच-समझ पूर्वक कोई परिवर्तन किया गया था। जो आगम रहे हैं, वे शौरसेनी से प्रभावित रहे हैं। यदि डा. टॉटिया वास्तविकता यह है कि उस यग तक आगम कण्ठस्थ चले आ ने यह कहा है कि आचारांग आदि श्वेताम्बर आगमों का शौरसेनी रहे थे और कोई भी कण्ठस्थ ग्रन्थ स्वाभाविक रूप से कण्ठस्थ प्रभावित संस्करण भी था, जो मथुरा क्षेत्र में विकसित यापनीय करने वाले व्यक्ति की क्षेत्रीय बोली से अर्थात उच्चारणशैली से परंपरा को मान्य था, तो उनका कथन सत्य है, क्योंकि भगवती अप्रभावित नहीं रह सकता है, यही कारण था कि जो उत्तर आराधना की टीका में आचारांग उत्तराध्ययन, निशीथ आदि के । भारत का निर्ग्रन्थ संघ मथुरा में एकत्रित हुआ उसके आगमजो संदर्भ दिए गए हैं, वे शौरसेनी से प्रभावित है। किन्तु इसका पाठ उस क्षेत्र की बोली, शौरसेनी से प्रभावित हुए और जो यह अर्थ कदापि नहीं है कि आगमों की रचना शौरसेनी में हुई थी पश्चिमी भारत का निर्ग्रन्थ संघ वलभी में एकत्र हआ उसके और वे बाद में अर्धमागधी में रूपान्तरित किए गए। ज्ञातव्य है आगम-पाठ उस क्षेत्र की बोली महाराष्ट्री प्राकृत से प्रभावित हुए। कि यह माथुरी वाचना स्कंदिल के समय महावीर-निर्वाण के पुनः यह भी स्मरण रखना चाहिए कि इन दोनों वाचनाओं में लगभग आठ सौ वर्ष पश्चात् हुई थी और उसमें जिन आगमों की सम्पादित आगमों का मल आधार तो अर्धमागधी आगम ही थे, वाचना हुई, वे सभी उसके पूर्व अस्तित्व में थे। यापनीयों ने यही कारण कि औरसेनी आगमन तो शद शौरसेनी में हैं और आगमों के इसी शौरसेनी प्रभावित संस्करण को मान्य किया था, न वलभी वाचना के आगम शद्ध महाराष्ट्री में है. उन दोनों में किन्तु दिगंबरों के लिए तो, वे आगम भी मान्य नहीं थे, क्योंकि अर्धमागधी के शब्द-रूप तो उपलब्ध होते ही हैं। उनके अनुसार तो इस माथुरी वाचना के लगभग दो सौ वर्ष पूर्व शौरसेनी आगमों में तो अर्धमागधी के साथ-साथ महाराष्ट्री ही आगम साहित्य तो विलुप्त हो चुका था। श्वेताम्बर परंपरा में प्राकृत के शब्द रूप भी बहुलता से मिलते हैं, यही कारण है कि मान्य आचारांग सूत्रकृतांग, ऋषिभाषित, उत्तराध्ययन भाषाविद् उनकी भाषा को जैन-शौरसेनी और जैन - महाराष्ट्री दशवैकालिक, कल्प, व्यवहार, निशीथ आदि तो ई. पू. चौथी कहते हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि जिन शौरसेनी आगमों की दुहाई शती से दूसरी शती तक की रचनाएँ हैं, जिसे पाश्चात्य विद्वानों ने दी जा रही है, उनमें से अनेक आगम ५० प्रतिशत से अधिक भी स्वीकार किया है। ज्ञातव्य है कि मथुरा का जैन-विद्या-केन्द्र अर्धमागधी और महाराष्ट्री प्राकृत से प्रभावित हैं। श्वेताम्बर और के रूप में विकास ई.पू. प्रथम शती से ही हुआ है और उसके दिगंबर मान्य आगमों में प्राकृत के रूपों का जो वैविध्य है, पश्चात् ही इन आगमों पर शौरसेनी प्रभाव आया होगा। उसके कारणों की विस्तृत चर्चा मैंने अपने लेख 'जैन आगमों में Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -चतीन्द्र सूरि स्मारकग्रन्थ - जैन आगम एवं साहित्य - हुआ भाषिक स्वरूप परिवर्तन : एक विमर्श' सागर जैन विद्याभारती क्षेत्रीय बोलियों का मिश्रण होता गया। उदाहरण के रूप में जब भाग-१ पृष्ठ २३९-२४३ में की है। प्रस्तुत प्रसंग में उसका निम्न पूर्व का भिक्षु पश्चिमी प्रेदशों में अधिक विहार करता है तो अंश दृश्य है-- उसकी भाषा में पूर्व एवं पश्चिम दोनों की ही बोलियों का प्रभाव जैन आगमिक एवं आगम रूप में मान्य अर्धमागधी तथा आ जाता है, फलतः उनके द्वारा कण्ठस्थ आगम के भाषिक शौरसेनी ग्रंथों के भाषिक स्वरूप में परिवर्तन क्यों हआ? इस स्वरूप की एकरूपता समाप्त हो गई। प्रश्न का उत्तर अनेक रूपों में दिया जा सकता है। वस्तुतः इन ४. सामान्यतया बुद्ध के वचन बुद्ध के निर्वाण के २००ग्रन्थों में हुए भाषिक परिवर्तनों का कोई एक ही कारण नहीं है, ३०० वर्ष के अंदर ही अंदर लिखित रूप में आ गए। अतः उनके अपितु अनेक कारण हैं, जिन पर हम क्रमशः विचार करेंगे - भाषिक स्वरूप में उनके रचनाकाल के बाद बहुत अधिक १. भारत में वैदिक परंपरा में वेद-वचनों को मंत्र रूप में परिवर्तन नहीं आया, तथापि उनकी उच्चारण-शैली विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न रही है। आज भी लंका, बर्मा, थाईलैंड आदि देशों मानकर उनके स्वर व्यंजन की उच्चारण योजना को अपरिवर्तनीय । बनाए रखने पर अधिक बल दिया गया, उनके लिए शब्द और के भिक्षुओं का त्रिपिटक का उच्चारण भिन्न-भिन्न होता है, फिर भी उनके लिखित स्वरूप में बहुत कुछ एकरूपता है। इसके ध्वनि ही महत्त्वपूर्ण रही और अर्थ गौण रहा। यही कारण है कि विपरीत जैन आगमिक एवं आगमतुल्य साहित्य एक सुदीर्घकाल आज भी अनेक वेदपाठी ब्राह्मण ऐसे हैं, जो वेदमंत्रों की उच्चारण तक लिखित रूप में नहीं आ सका, वह गुरुशिष्य परंपरा से शैली, लय आदि के प्रति तो अत्यंत सतर्क रहते हैं, किन्तु वे मौखिक ही चलता रहा, फलतः देशकालगत उच्चारण-भेद से उनके अर्थों को नहीं जानते हैं। यही कारण है कि वेद शब्दरूप उनको लिपिबद्ध करते समय उनके भाषिक स्वरूप में भी परिवर्तन में यथावत् बने रहे। इसके विपरीत जैन परंपरा में यह माना गया होता गया। मात्र यही नहीं, लिखित प्रतिलिपियों के पाठ भी कि तीर्थंकर अर्थ के उपदेष्टा होते हैं। उनके वचनों को शब्दरूप प्रतिलिपिकारों की असावधानी या क्षेत्रीय बोली से प्रभावित तो गणधर आदि के द्वारा दिया जाता है। अत: जैनाचार्यों के लिए हुए। श्वेताम्बर आगमों की प्रतिलिपियाँ मुख्यतः गुजरात एवं अर्थ या कथन का तात्पर्य ही प्रमुख था, उन्होंने कभी भी शब्दों राजस्थान में हुई, अतः उन पर महाराष्ट्री का प्रभाव आ गया। पर बल नहीं दिया। शब्दों में चाहे परिवर्तन हो जाए, लेकिन अर्थों में परिवर्तन नहीं होना चाहिए, यही जैन आचार्यों का प्रमुख ५. भारत में कागज का प्रचलन न होने से भोजपत्रों या ताड़पत्रों पर ग्रन्थों को लिखवाना और उन्हें सुरक्षित रखना जैन लक्ष्य रहा। शब्दरूपों की उनकी इस उपेक्षा के फलस्वरूप आगमों के भाषिक स्वरूप में परिवर्तन होते गए। इसी क्रम में ईसा की -मुनियों की अहिंसा एवं अपरिग्रह की भावना के प्रतिकूल था। लगभग ई. सन् की ५वीं शती तक इस कार्य को पाप-प्रवृत्ति चतुर्थ शती में अर्धमागधी आगमों के शौरसेनी प्रभावित और । माना जाता था तथा इसके लिए दण्ड की व्यवस्था भी थी। महाराष्ट्री प्रभावित संस्करण अस्तित्व में आए। फलतः महावीर के पश्चात् लगभग १००० वर्ष तक जैन साहित्य २. आगम साहित्य में जो भाषिक परिवर्तन हुए उनका श्रत परंपरा पर ही आधारित रहा। श्रुतपरम्परा पर आधारित होने दूसरा कारण यह था कि जैन-भिक्षु - संघ में विभिन्न प्रदेशों के से आगमों के भाषिक स्वरूप में वैविध्य आ गया। भिक्षु गण सम्मिलित थे। अपनी-अपनी प्रादेशिक बोलियों से ६. आगमिक एवं आगम तुल्य साहित्य में आज भाषिक प्रभावित होने के कारण उनकी उच्चारण-शैली में भी स्वाभाविक रूपों का जो वैविध्य देखा जाता है, उसका एक कारण लहियों भिन्नता रहती थी, फलतः उनके द्वारा कण्ठस्थ आगम साहित्य (प्रतिलिपिकारों) की असावधानी भी रही है। प्रतिलिपिकार के भाषिक स्वरूप में भिन्नताएँ आ गईं। जिस क्षेत्र का होता था, उस पर भी उस क्षेत्र की बोली, भाषा का ३. जैन भिक्षु सामान्यतया भ्रमणशील होते हैं, उनकी प्रभाव रहता था और वह असावधानी से अपनी प्रादेशिक बोली भ्रमणशीलता के कारण उनकी बोलियों, भाषाओं पर भी अन्य के शब्दरूपों को लिख देता था। उदाहरण के रूप में चाहे प्रदेशों की बोलियों का प्रभाव भी पड़ता ही था, फलतः आगमों मूलपाठ में गच्छति लिखा हो लेकिन यदि उस क्षेत्र में प्रचलन में के भाषिक स्वरूप में भी परिवर्तन हुआ और उनमें तत् तत् गच्छइ का व्यवहार है तो प्रतिलिपिकार गच्छइ रूप ही लिख देगा। Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यतीन्द्र सूरि स्मारकग्रन्थ - जैन आगम एवं साहित्य ७. जैन आगम एवं आगम तुल्य ग्रंथों में आए भाषिक खोखला है, यह सिद्ध हो जाता है। मात्र यही नहीं इससे यह भी परिवर्तनों का एक कारण यह भी है कि वे विभिन्न कालों एवं सिद्ध होता है कि शौरसेनी आगमतुल्य ग्रंथ न केवल अर्धमागधी प्रदेशों में सम्पादित होते रहे हैं। सम्पादकों ने उनके प्राचीन से प्रभावित हैं, अपितु उससे परवर्ती महाराष्ट्री प्राकृत से भी स्वरूप को स्थिर रखने का प्रयत्न नहीं किया, अपितु उन्हें सम्पादित प्रभावित हैं-- करते समय अपने युग एवं क्षेत्र की प्रचलित भाषा और व्याकरण १. आत्मा के लिए अर्धमागधी में आता, अत्ता, अप्पा, के आधार पर उनमें परिवर्तन भी कर दिया। यही कारण है कि आदि शब्द-रूपों के प्रयोग उपलब्ध हैं. जबकि शौरसेनी में 'त' अर्धमागधी में लिखित आगम भी जब मथुरा में संकलित एवं सम्पादित हुए तो उनका भाषिक स्वरूप अर्धमागधी की अपेक्षा साथ-साथ अप्पा शब्दरूप जो कि अर्धमागधी का है अनेक बार शौरसेनी के निकट हो गया, और जब बलभी में सम्पादित किये प्रयोग में आता है। केवल समयसार में ही नहीं, अपितु नियमसार गए तो वह महाराष्ट्री से प्रभावित हो गया। यह अलग बात है कि (१२०, १३२१, १८३) आदि में भी अप्पा शब्द का प्रयोग है। ऐसा परिवर्तन सम्पूर्ण रूप में न हो सका और उसमें अर्धमागधी के तत्त्व भी बने रहे। अतः अर्धमागधी और शौरसेनी आगमों में २. श्रृत का शौरसेनी रूप सद बनता है। शौरसेनी आगमतुल्य भाषिक स्वरूप का जो वैविध्य है वह एक यथार्थता है, जिसे हमें - ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर सुद सुदकेवली आदि शब्दरसों के प्रयोग स्वीकार करना होगा। भा हुए हैं, जबकि समयसार (वर्णी ग्रंथमाला) गाथा ९ एवं १० में स्पष्ट रूप से सुयकेवली, सुयणाण शब्दरूपों का भी प्रयोग मिलता क्या शौरसेनी आगमों के भाषिक स्वरूप में है। जबकि ये दोनों महाराष्ट्री शब्द-रूप हैं और परवती भी हैं। एकरुपता है? अर्धमागधी में तो सदैव सुत शब्द का प्रयोग होता है। किन्तु डा. सुदीप जैन का दावा है कि “आज भी शौरसेनी ३. शौरसेनी में मध्यवर्ती 'त' का 'द' होता है साथ ही आगम साहित्य में भाषिक तत्त्व की एकरूपता है, जबकि उसमें लोप की प्रवृत्ति अत्यल्प है, अत: उसके क्रियारूप हवदि, अर्धमागधी आगम साहित्य में भाषा के विविध रूप पाये जाते होदि, कुणदि, गिण्हदि, परिणमदि, भण्णदि, पस्सदि आदि बनते हैं। उदाहरणस्वरूप शौरसेनी में सर्वत्र 'ण' का प्रयोग मिलता है. हैं। इन क्रिया-रूपों का प्रयोग उन ग्रन्थों में भी हुआ, किन्तु उन्हीं कहीं भी 'न' का प्रयोग नहीं है। जबकि अर्धमागधी में नकार के ग्रन्थों के क्रिया-रूपों पर महाराष्ट्री प्राकृत का कितना व्यापक साथ-साथ णकार का प्रयोग भी विकल्पतः मिलता है। यदि प्रभाव है, इसे निम्न उदाहरणों से जाना जा सकता है - शौरसेनी-युग में नकार का प्रयोग आगमिक भाषा में प्रचलित समयसार, वर्णी ग्रंथमाला (वाराणसी) - होता तो दिगम्बर साहित्य में कहीं तो विकल्प से प्राप्त होता हीं।" - प्राकृतविद्या जुलाई-सितंबर ९६,पृ. ७ जाणइ (१०), हवई (११, ३१५, ३८६, ३८४), मुणइ यहाँ डा. सुदीप जैन ने दो बातें उठाई हैं, प्रथम शौरसेनी (३२), वुच्चइ (४५), कुव्वइ (८१, २८६, ३१९, ३२१, ३२५, ३४०) परिणमइ (७६,७९,८०) (ज्ञातव्य है कि समयसार के आगम साहित्य की भाषिक एकरूपता की और दूसरी णकार इसी संस्करण की गाथा क्र. ७७, ७८, ७९ में परिगमदि रूप भी और नकार की। "क्या सुदीप जी ! आपने शौरसेनी आगम मिलता है) इसी प्रकार के अन्य महाराष्ट्री प्राकृत के रूप जैसे साहित्य के उपलब्ध संस्करणों का भाषाशास्त्र की दृष्टि से कोई वेयई (८४), कुणई (७१, ९६, २८९, २९३, ३२२, ३२६), होइ प्रमाणिक अध्ययन किया है? यदि आपने किया होता तो आप ऐसा खोखला दावा प्रस्तुत नहीं करते? आप केवल णकार का (९४, ३०६,१९, ३४९, ३५८), करई (९४, २३७, २३८, ३२८, ३४८), हवई (१४१, ३२६, ३२९), जाणइ (१८५, ३१६, ३१९, ही उदाहरण क्यों देते हैं? वह तो महाराष्ट्री और शौरसेनी दोनों में । ३२०,३६१), बहइ (१८९), सेवइ (१९७),मरइ (२५७,२९०), सामान्य है। दूसरे शब्दरूपों की चर्चा क्यों नहीं करते हैं? " नीचे २४ (जबकि गाथा २५८ में मरदि है)। पावइ (२९१, २९२), धिप्पइ मैं दिगंबर शौरसेनी आगमतुल्य ग्रन्थों से ही कुछ उदाहरण दे रहा हूँ, जिनसे उनके भाषिकतत्त्व की एकरूपता का दावा कितना । (२९६), उप्पज्जइ (३०८), विणस्सइ (३१२, ३४५), दीसइ Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ -- यतीन्द्र सूरि स्मारकग्रन्य - जैन आगम एवं साहित्य (३२३) आदि भी मिलते हैं। ये तो कुछ ही उदाहरण हैं-ऐसे जो दिगंबर जैन समाज द्वारा ही प्रकाशित हैअनेकों महाराष्ट्री प्राकृत के क्रियारूप समयसार में उपलब्ध हैं। १. हाथीगुफा बिहार का शिलालेख-प्राकृत, जैन सम्राट् खारवेल, न केवल समयसार अपितु नियमसार, पंचास्तिकायसार, प्रवचनसार मौर्यकाल १६५वाँ. वर्ष पृ. ४ लेख क्रमांक २, 'नमो आदि की भी यही स्थिति है। अरहंतानं, नमो सवसिधानं' . ___ बारहवीं शती में रचित वसुनन्दीकृत श्रावकाचार (भारतीय ३२. वैकुण्ठ स्वर्गपुरी गुफा, उदयगिरि, उड़ीसा, प्राकृत, मौर्यकाल ज्ञानपीठ संस्करण) की स्थिति तो कुन्दकुन्द के इन ग्रन्थों से भी १६५ वाँ वर्ष लगभग ई. पू. दूसरी शती पृ. ११ ले.क. बदतर है, उसकी प्रारंभ की सौ गाथाओं में ४०% क्रियारूप महाराष्ट्री प्राकृत के हैं। ३. मथुरा, प्राकृत, महाक्षत्रप शोडाशके ८१ वर्ष का पृ. १२ इससे फलित यह होता है कि तथाकथित शौरसेनी आगमों क्रमांक ५ 'नम अरहतो वधमानस्।' के भाषागत स्वरूप में तो अर्धमागधी आगमों की अपेक्षा भी न ४. मथुरा, प्राकृत, काल निर्देश नहीं दिया है, किन्तु जे. एफ. केवल अधिक वैविध्य है, अपितु उस महाराष्ट्री प्राकृत का भी फलीट के अनुसार लगभग १४-१३ ई. पूर्व प्रथम शती व्यापक प्रभाव है, जिसे सुदीप जी शौरसेनी से परवर्ती मान रहे का होनी चाहिए। हैं। यदि ये ग्रन्थ प्राचीन होते तो इन पर अर्धमागधी और महाराष्ट्री का प्रभाव कहाँ से आता ? प्रो. ए.एन. उपाध्ये ने प्रवचनसार 'अरहतो वर्धमानस्य की भूमिका में स्पष्टत: यह स्वीकार किया है कि उसकी भाषा ६. मथुरा,प्राकृत सम्भवतः १४-१३ ई.पू. प्रथमशती,पृ. १५ पर अर्धमागधी का प्रभाव है। प्रो. खड़बड़ी ने तो षटखण्डागम लेख क्र. १०, ‘मा अरहतपूजा' । की भाषा को भी शुद्ध शौरसेनी नहीं माना है। ७. मथुरा, प्राकृत,पृ. १७ क्र. १४ 'मा अरतानं श्रमणश्रविका' । नकार और णकार में कौन प्राचीन ८. मथुरा प्राकृत,पृ. १७ क्रमांक १५ 'नमो अरहंतानं', अब हम णकार और नकार के प्रश्न पर आते हैं। भाई ९. मथुरा प्राकृत,पृ. १८ क्र. १६ 'नमो अरहतो महाविरस' सुदीप जी आपका यह कथन सत्य है कि अर्धमागधी में नकार १०. मथुरा, प्राकृत,हुविष्क संवत् ३९, हस्तिस्तम्भ पृ. ३४, क्र. और णकार दोनों पाए जाते हैं। किन्तु दिगंबर शौरसेनी ४३, 'अयर्येन रुद्रादासेन अरहंतनं पजाये।' आगमतुल्यग्रंथों ने सर्वत्र णकार का पाया जाना यही सिद्ध करता ११. मथरा.प्राकृत भग्न वर्ष ९३.प्र. ४६, क्रमांक ६७ नमो है कि जिस शौरसेनी को आप अरिष्टनेमि के काल से प्रचलित अर्हतो महाविरस्स' प्राचीनतम प्राकृत कहना चाहते हैं, उस णकारप्रधान शौरसेनी १२. मथुरा प्राकृत वासुदेव सं. ९८, पृ. ४७ क्र. ६०, ‘नमो का जन्म तो ईसा की तीसरी शताब्दी तक हुआ भी नहीं था। 'ण' । अरहतो महावीरस्स की अपेक्षा 'न' का प्रयोग प्राचीन है। ई.पू. तृतीय शती के अशोक के अभिलेख एवं ई.पू. द्वितीय शती के खारवेल के शिलालेख १३. मथुरा, प्राकृत,पृ. ४८,क्र.७१ 'नमो अरहंताण सिहकस।' से लेकर मथुरा के शिलालेख (ई.पू. दूसरी शती से ईसा की १४. मथुरा प्राकृत, भग्न पृ. ४८.क्र.७२ 'नमो अरहंतान', दूसरी शती तक) इन लगभग ८० जैन शिलालेखों में एक भी १५. मथुरा, प्राकृत,भग्न पृ. ४८, क्र. ७३ 'नमो अरहंतान'. णकार का प्रयोग नहीं है। इनमें शौरसेनी प्राकृत के रूपों यथा १६. मथरा, प्राकृत भग्न पृ.४८ क्र.७५, अरहंतान वर्धमानस्य . णमो, अरिहंताणं और णमो वड्ढमाणं का सर्वथा अभाव है। १७. मथुरा, प्राकृत,भग्न पृ.५१, क्र.८०, नमो अरहंतान...द्वन', यहाँ हम केवल उन्हीं प्राचीन शिलालेखों को उद्धृत कर रहे हैं, जिन न पालों का योग मारे जातोपी शरसेन प्रदेश, जहाँ से शौरसेनी प्राकृत का जन्म हुआ, अभिलेखीय साक्ष्य जैन शिलालेखसंग्रह. भाग-२ से प्रस्तत हैं. वहाँ के शिलालेखों में दूसरी तीसरी शती तक णकार एवंद के प्रयोग का अभाव यही सिद्ध करता है कि दिगंबर आगमों एवं anohriranihriranianoonardoisonitorianoranciniawardM[१०८roniroraniroraniranitoriranioranirdroidnisonitorolind Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यतीन्द्र सूरि मारकग्रन्थ - जैन आगम एवं साहित्य - नाटकों की शौरसेनी का जन्म ईसा की तीसरी शती के पूर्व का अवश्य है कि इनमें से कुछ के शौरसेनी प्राकृत से प्रभावित नहीं है, जबकि नकार प्रधान अर्धमागधी का प्रयोग तो अशोक संस्करण माथुरी वाचना लगभग चतुर्थ शती के समय अस्तित्व के अभिलेखों से अर्थात् ई.पू. तीसरी शती से सिद्ध होता है। में अवश्य आए थे, किन्तु इन्हें शौरसेनी आगम कहना उचित इससे यही फलित होता है कि अर्धमागधी आगम प्राचीन थे, नहीं होगा, वस्तुतः ये आचारांग, उत्तराध्ययन, दशवैकालिक आगमों का शब्द-रूपान्तरण अर्धमागधी से शौरसेनी में हुआ है, ऋषिभाषित आदि श्वेताम्बर परंपरा में मान्य आगमों के ही न कि शौरसेनी से अर्धमागधी में हुआ है। दिगंबर मान्य आगमों शौरसेनी संस्करण थे, जो यापनीय परंपरा में मान्य थे और की वह शौरसेनी जिसकी प्राचीनता का बढ़-चढ़कर दावा किया जिनकी भाषिक स्वरूप और कुछ पाठ भेदों को छोड़कर श्वेताम्बर जाता है, वह अर्धमागधी और महाराष्ट्री दोनों से ही प्रभावित है मान्य आगमों से समरूपता थी। इनके स्वरूप आदि के संबंध में और न केवल भाषायी स्वरूप के आधार पर वरन् अपनी विस्तृत चर्चा मैंने 'जैन धर्म का यापनीय संप्रदाय' नामक ग्रन्थ विषयवस्तु के आधार पर भी ईसा की चौथी-पाँचवीं शती के. के तीसरे अध्याय के प्रारंभ में की है। इच्छुक पाठक उसे वहाँ पूर्व की नहीं है। देख सकते हैं। यदि शौरसेनी प्राचीनतम प्राकत है तो फिर सम्पर्ण देश में वस्तुतः आज जिन्हें हम शौरसेनी आगम के नाम से ईसा की तीसरी चौथी शती तक का एक भी अभिलेख शौरसेनी जानते हैं उनमें मुख्यतः निम्न ग्रन्थ आते हैं-- प्राकृत में क्यों नहीं मिलता है। अशोक के अभिलेख, खारवेल (अ) यापनीय आगम के अभिलेख, बलडी का अभिलेख और मथुरा के शताधिक भिलेख कोई भी तो शौरसेनी प्राक़त में नहीं है। इन सभी १. कषायपाहुड लगभग ईसा की चौथी शती. गणधर अभिलेखों की भाषा क्षेत्रिय बोलियों से प्रभावित मागधी ही है। २.षटखण्डागम, ईसा की पाँचवीं शती का उत्तरार्द्ध, पृष्पदंत अतः उसे अर्धमागधी तो कहा जा सकता है, किन्तु शौरसेनी और भूतबली कदापि नहीं कहा जा स है। अतः प्राकृतों में अर्धमागधी ही ३. भगवतीआराधना, ईसा की छठी शती, शिवार्य प्राचीन है, क्योंकि मथुरा का प्राचीन अभिलेखों में भी 'नमो अरहंतानं', 'नमो वधमानस' आदि अर्धमागधी शब्द-रूप मिलते हैं। श्वेताम्बर ४. मूलाचार, ईसा की छठी शती, वट्टकेर आगमों एवं अभिलेखों में आए 'अरहंतानं' पाठ को तो प्राकृतविद्या ज्ञातव्य है कि ये सभी ग्रन्थ मलतः यापनीय परंपरा के हैं में खोटे सिक्के की तरह बताया गया है. इसका अर्थ है कि यह पाठ और इनमें अनेकों गाथाएँ श्वेताम्बर-मान्य आगमों, विशेष रूप शौरसेनी का नहीं है (प्राकृतविद्या, अक्टूबर-दिसंबर ९४, पृ. १०- से नियुक्तियों और प्रकीर्णकों के समरूप हैं। ११) अतः शौरसेनी उसके बाद ही विकसित हुई है। (ब) कुन्दकुन्द के ईसा की छठी शती के लगभग के ग्रन्थ शौरसेनी आगम और उनकी प्राचीनता ५. समयसार जब हम आगम की बात करते हैं तो हमें यह स्पष्ट रूप से ६. नियमसार समझ लेना चाहिए कि आचारांग आदि द्वादशांगी जिन्हें श्वेताम्बर, ७. प्रवचनकार दिगंबर और यापनीय परंपरा आगम कहकर उल्लेखित करती ८. पंचास्तिकायसार हैं, वे सभी मूलत: अर्धमागधी में निबद्ध हुए हैं। चाहे श्वेताम्बर परंपरा में नन्दीसूत्र में उल्लेखित आगम हो, चाहे मूलाचार, भगवती ९. अष्टपाहुड (इनका कुन्दकुन्द द्वारा रचित होना संदिग्ध आराधना और उनकी टीकाओं या तत्त्वार्थ और उसकी दिगंबर है, क्योंकि इनकी भाषा में अपभ्रंश के शब्द-रूप भी हैं) टीकाओं में उल्लेखित आगम हो, अथवा अंगपण्णति एवं धवला (स) अन्य ग्रंथ-ईसा की छठी शती के पश्चात् के अंग और अंगबाह्य के रूप में उल्लेखित आगम हों, उनमें से १०. तिलोयपण्णति-यतिवृषभ एक भी ऐसा नहीं जो शौरसेनी प्राकृत में निबद्ध था। हाँ, इतना anoraridwaraniwaridrowdnodrianirdwordrobraridwoM[१०९Haririwaririramidsranirandirirdriraniraniranitariand Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ___- यतीन्द्र सूरि स्मारकग्रन्थ - जैन आगम एवं साहित्य - ११. लोकविभाग करते थे। डा. सुदीप जी के शब्दों में इन दोनों महापुरुषों के १२. जंबुद्वीपपण्णति प्रभावक व्यक्तित्व के महाप्रभाव से शूरसेन जनपद में जन्मी शौरसेनी प्राकृत भाषा को सम्पूर्ण आर्यावर्त में प्रसारित होने का १३. अंगपण्णति सुअवसर मिला था। (प्राकृतविद्या जुलाई-सितंबर ९६, पृ. ६) १४. क्षपणसार यदि हम एक बार उनके इस कथन को मान भी लें तो प्रश्न १५. गोम्मटसार (दसवीं शती) उठता है कि अरिष्टनेमि के पूर्व नमि मिथिला में जन्म थे, किन्तु इनमें से कसायपाहड को छोडकर कोई भी ग्रन्थ वासुपूज्य चम्पा में जन्मे थे, सुपार्श्व, चंद्रप्रभ और श्रेयांस काशी ऐसा नहीं है, जो पाँचवीं शती के पर्व का हो। ये सभी ग्रन्थ . जनपद में जन्मे थे, यही नहीं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव और गुणस्थान सिद्धांत एवं सप्तभंगी की चर्चा अवश्य करते हैं और मर्यादा पुरुषोत्तम राम अयोध्या में जन्मे थे। ये सभी क्षेत्र तो मगध गुणस्थान की चर्चा जैन दर्शन में पाँचवीं शती से पर्व के ग्रन्थों में के ही निकटवर्ती क्षेत्र हैं, अतः इनकी मातृभाषा तो अर्धमागधी रही अनपस्थित है। श्वेताम्बर आगमों में समवायांग और आवश्यक. होगी। भाई सुदीप जी के अनुसार यदि शौरसेनी अरिष्टनेमि जितनी निर्यक्ति में दो प्रक्षिप्त गाथाओं को छोडकर गणस्थान की चर्चा प्राचीन है, तो फिर अर्धमागधी तो ऋषभ जितनी प्राचीन सिद्ध होती पूर्णतः अनुपस्थित है, जबकि षटखण्डागम. मलाचार. है, अतः शौरसेनी से अर्धमागधी प्राचीन ही है। भगवतीआराधना आदि ग्रन्थों में और कुन्दकुन्द के ग्रंथों में यदि शौरसेनी प्राचीन होती तो सभी प्राचीन अभिलेख इनकी चर्चा पाई जाती है, अतः ये सभी ग्रन्थ उनसे परवर्ती हैं। और प्राचीन आगमिक ग्रन्थ शौरसेनी में मिलने थे, किन्तु ईसा इसी प्रकार उमास्वाति के तत्त्वार्थसूत्र मूल और उसके स्वोपज्ञ की चौथी, पाँचवीं शती के पूर्व का कोई भी ग्रन्थ और अभिलेख भाष्य में भी गुणस्थान की चर्चा अनुपस्थित है, जबकि इसकी शौरसेनी में उपलब्ध क्यों नहीं होता है? परवर्ती टीकाएँ गुणस्थान की विस्तृत चर्चाएँ प्रस्तुत करती हैं। नाटकों में शौरसेनी प्राकत की उपलब्धता के आधार पर उमास्वाति का काल तीसरी-चौथी शती के लगभग हैं। अतः उसकी प्राचीनता का गुणगान किया जाता है, मैं विनम्रतापूर्वक यह निश्चित है कि गुणस्थान का सिद्धांत पाँचवीं शती में अस्तित्व पूछना चाहूँगा कि क्या इन उपलब्ध नाटकों में कोई भी नाटक में आया है। अत: शौरसेनी प्राकृत में निबद्ध कोई भी ग्रन्थ जो ईसा की चौथी-पाँचवीं शती से पूर्व का है? फिर उन्हें शौरसेनी गुणस्थान का उल्लेख कर रहा है, ईसा की पाँचवीं शती के पूर्व का की प्राचीनता का आधार कैसे माना जा सकता है। मात्र नाटक नहीं है। प्राचीन शौरसेनी आगमतुल्य ग्रन्थों में मात्र कसायपाहुड ही ___ ही नहीं, वे शौरसेनी प्राकृत एक भी ऐसा ग्रन्थ या अभिलेख ऐसा है जो स्पष्टत: गुणस्थानों का उल्लेख नहीं करता है, किन्तु दिखा दें जो अर्धमागधी आगमों और मागधी-प्रधान अशोक, उसमें भी प्रकारान्तर से १२ गुणस्थानों की चर्चा उपलब्ध है, अतः खारवेल आदि के अभिलेखों से प्राचीन हो। अर्धमागधी के यह भी आध्यात्मिक विकास की उन दस अवस्थाओं, जिनका अतिरिक्त जिस महाराष्टी प्राकृत को वे शौरसेनी से परवर्ती बता उल्लेख आचारांगनियुक्ति और तत्त्वार्थसूत्र में है, से परवर्ती और रहे हैं, उसमें हाल की गाथा सप्तशती लगभग प्रथम शती में गुणस्थान सिद्धांत के विकास के संक्रमण काल की रचना है, अतः रचित है और शौरसेनी के किसी भी ग्रन्थ से प्राचीन है। उसका काल भी चौथी से पाँचवीं शती के बीच सिद्ध होता है। पुन: मैं डा. सुदीप के निम्न कथन की ओर पाठकों का शौरसेनी की प्राचीनता का दावा, कितना खोखला ध्यान दिलाना चाहूँगा, वे प्राकृतविद्या, जुलाई-सितंबर ९६ में शौरसेनी की प्राचीनता का गणगान इस आधार पर भी लिखते हैं कि दिगबरों के ग्रंथ उस शौरसेनी प्राकत में है. जिससे किया जाता है कि यह नारायण कष्ण और तीर्थंकर अरिष्टनेमि मागधी आदि प्राकृतों का जन्म हुआ। इस संबंध में मेरा उनसे की मातभाषा रही है, क्योंकि इन दोनों महापुरुषों का जन्म शरसेन निवेदन है कि मागधी के संबंध में 'प्रकृतिः शौरसेनी' (प्राकृतमें हुआ था और ये शौरसेनी प्राकृत में ही अपना वाक व्यवहार प्रकाश ११/२) इस कथन की वे जो व्याख्या कर रहे हैं, वह भ्रान्त है और वे स्वयं भी शौरसेनी के संबंध में 'प्रकृतिः संस्कृतम्' Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - यतीन्द्र सूरिस्मारकग्रन्थ - जैन आगम एवं साहित्य प्राकृतप्रकाश १२/२. इस सूत्र की व्याख्या में प्रकृति का जन्मदात्री, महाराष्ट्री में रूपान्तरित हुए न कि शौरसेनी आगम अर्धमागधी में यह अर्थ अस्वीकार कर चुके हैं। इसकी विस्तृत समीक्षा हमने रूपान्तरित हुए, अत: ऐतिहासिक तथ्यों की अवहेलना कर मात्र अग्रिम पृष्ठों में की है। इसके प्रत्युत्तर में मेरा दूसरा तर्क यह है कुतर्क करना कहाँ तक उचित है। कि यदि शौरसेनी प्राकृत ग्रंथों के आधार पर ही मागधी के बुद्धवचनों की मूलभाषा मागधी थी, न कि शौरसेनी - प्राकृत आगमों की रचना हुई, तो उनमें किसी भी शौरसेनी प्राकृत के ग्रंथ का उल्लेख क्यों नहीं है। श्वेताम्बर आगमों में वे एक भी शौरसेनी को मूलभाषा एवं मागधी से प्राचीन सिद्ध करने संदर्भ दिखा दें, जिसमें भगवती-आराधना, मूलाचार, षटखण्डागम, हेतु आदरणाय प्रा. नथमलजा टाटिय हेतु आदरणीय प्रो. नथमलजी टाँटिया के नाम से यह भी प्रचारित तिलोयपण्णत्ति, प्रवचनसार, समयसार, नियमसार आदि का । किया जा रहा है कि "शौरसेनी पालि भाषा की जननी है, यह उल्लेख हुआ हो। टीकाओं में भी मलयगिरि जी ने मात्र समयपाहुड मरा स्पष्ट चितन ह। पहल बाद्धा के ग्रथ शारसना म थ उनका का उल्लेख किया है, इसके विपरीत मूलाचार, भगवती-आराधना जला दिया गया और पालि में लिखा गया। प्राकृत विद्या.जलाईऔर षटखण्डागम की टीकाओं में एवं तत्त्वार्थसूत्र की सर्वार्थसिद्धि. सितंबर ९६,पृ. १०। राजवार्तिक. श्लोकवार्तिक आदि सभी दिगंबर टीकाओं में इन टाँटियाजी जैसा बौद्धविद्या का प्रकाण्ड विद्वान ऐसी आगमों एवं नियुक्तियों के उल्लेख हैं। भगवतीआराधना की कपोलकल्पित बात कैसे कह सकता है? यह विचारणीय है। टीका में तो आचारांग, उत्तराध्ययन, कल्प तथा निशीथ से अनेक क्या ऐसा कोई भी अभिलेखीय या साहित्यिक प्रमाण उपलब्ध अवतरण भी दिए हैं। मूलाचार में न केवल अर्धमागधी आगमों है? जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि मूल बद्ध - का उल्लेख है, अपितु उनकी सैकड़ों गाथाएँ भी हैं। मूलाचार में वचन शौरसेनी में थे। यदि हो तो आदरणीय टॉटिया जी या भाई आवश्यकनियुक्ति, आतुरप्रत्याख्यान, महाप्रत्याख्यान, चंद्रवेध्यक, सुदीपजी उसे प्रस्तुत करें, अन्यथा ऐसी आधारहीन बातें करना उत्तराध्ययन, दशवैकालिक आदि की अनेक गाथाएँ अपने शौरसेनी विद्वानों के लिए शोभनीय नहीं है। शब्द-रूपों में यथावत् पाई जाती हैं। यह बात तो बौद्ध विद्वान् स्वीकार करते हैं कि मूल बुद्ध - दिगंबर परंपरा में जो प्रतिक्रमणसूत्र उपलब्ध है, उसमें वचन मागधी में थे और कालान्तर में उनकी भाषा को संस्कारित ज्ञातसत्र के उन्हीं १९ अध्ययनों के नाम मिलते हैं, जो वर्तमान में करके पालि में लिखा गया। यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि जिस श्वेताम्बर परंपरा में उपलब्ध ज्ञाताधर्मकथा में उपलब्ध हैं। तार्किक प्रकार मागधी और अर्धमागधी में किंचित् अन्तर है, उसी प्रकार दृष्टि से यह स्पष्ट है कि जो ग्रंथ जिन-जिन ग्रन्थों का उल्लेख मागधी और पालि में भी किंचित अन्तर है, वस्तुत: तो पालि करता है, वह उनसे परवर्ती ही होता है। पूर्ववर्ती कदापि नहीं। भगवान् बुद्ध की मूलभाषा मागधी का एक संस्कारित रूप है, शौरसेनी आगम या आगमतुल्य ग्रन्थों में यदि अर्धमागधी आगमों यही कारण है कि कुछ विद्वान पालि को गागधी का ही एक के नाम मिलते हैं तो फिर शौरसेनी और उसका रचित साहित्य प्रकार मानते हैं. दोनों में बहत अधिक अंतर नहीं है। पालि. अर्धमागधी आगमों से प्राचीन कैसे हो सकता है? संस्कृत और मागधी की मध्यवर्ती भाषा है या मागधी का ही आदरणीय टाँटिया जी के माध्यम से यह बात भी उठाई साहित्यिक रूप है। यह तो प्रमाणसिद्ध है कि भगवान् बुद्ध ने गई है कि मलतः आगम शौरसेनी में रचित थे और कालान्तर में मागधी में ही अपने उपदेश दिए थे, क्योंकि बौद्ध - ग्रन्थों का उनका अर्धमागधीकरण (महाराष्ट्रीकरण) किया गया। यह एक स्पष्ट मन्तव्य है कि मागधी ही मूल भाषा है। इस संबंध में ऐतिहासिक सत्य है कि जैन धर्म का उद्भव मगध में हुआ और बुद्धघोष का निम्न कथन सबसे बड़ा प्रमाण है - वहीं से वह दक्षिणी एवं उत्तरपश्चिमी भारत में फैला। अत: सा मागधी मूल भासा नरायाय आदिकप्पिका। आवश्यकता हुई अर्धमागधी आगमों के शौरसेनी और महाराष्ट्री ब्रह्मणो च अस्सुतालापा संबुद्धा चापि भासरे। रूपान्तरण की, न कि शौरसेनी आगमों के अर्धमागधी रूपान्तर . अर्थात् मागधी ही मूलभाषा है जो सृष्टि के प्रारंभ में उत्पन्न की। सत्य तो यह है कि अर्धमागधी आगम ही शौरसेनी या हई और न केवल ब्रह्मा (देवता) अपितु बालक और बुद्ध भी Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - यतीन्द्र सूरि स्मारकग्रन्य - जैन आगम एवं साहित्य - इसी भाषा में बोलते हैं। (See-The preface to the childer's Pali - वररुचिकृत प्राकृतप्रकाश। Dictionary) ब. १. शेष शौरसेनीवत् ८।४।३०२ इससे यही फलित होता है कि मूल बुद्धवचन मागधी में . मागध्यां यदुक्तं ततोअन्यच्छौरसेनीवद् द्रष्टव्यम्। थे। पालि उसी मागधी का संस्कारित साहित्यिक रूप है, जिसमें कालान्तर में बुद्धवचन लिखे गए। वस्तुतः पालि के रूप में २. शेषं शौरसेनीवत ८।४।३२३ मागधी का एक ऐसा संस्करण तैयार किया गया, जिसे संस्कृत पैशाच्यां यदुक्तं, ततोअन्यच्छेषं पैशाच्यां शौरसेनीवद के विद्वान और भिन्न-भिन्न प्रांतों के लोग भी आसानी से समझ भवति। सकें। अत: बुद्धवचन मूलतः मागधी में थे, न कि शौरसेनी में। बौद्धत्रिपिटक की पालि और जैन आगमों की अर्धमागधी में ३. शेषं शौरसेनीवत् ८।४।४४६ कितना साम्य है, यह तो सुत्तनिपात और इसिभासियाई के __ अपभ्रंशे प्रायः शौरसेनीवत् कार्य भवति। अपभ्रंशभाषायां तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है। प्राचीन पालि-ग्रन्थों प्रायः शौरसेनीभाषातुल्यं कार्यं जायते,शौरसेनी भाषायाः ये नियमाः की एवं प्राचीन अर्धमागधी आगमों की भाषा में अधिक दूरी सन्ति, तेषां प्रवृत्तिरपभ्रंशभाषायामपि जायते। हेमचन्द्रकृत नहीं है। जिस समय अर्धमागधी और पालि में ग्रन्थरचना हो रही प्राकृतव्याकरण। थी, उस समय तक शौरसेनी एक बोली थी, न कि एक साहित्यिक भाषा। साहित्यिक भाषा के रूप में उसका जन्म तो ईसा की अत: इस प्रसंग में यह आवश्यक है कि हम सर्वप्रथम इन तीसरी शताब्दी के बाद ही हआ है। संस्कृत के पश्चात सर्वप्रथम सूत्रों में प्रकृति शब्द का वास्तविक तात्पर्य क्या है, इसे समझें। साहित्यिक भाषा के रूप में यदि कोई भाषा विकसित हुई है तो यदि हम यहाँ प्रकृति का अर्थ उद्भव का कारण मानते हैं तो वे अर्धमागधी एवं पालि ही हैं, न कि शौरसेनी। शौरसेनी का निश्चित ही इन सूत्रों से यह फलित होता है कि मागधी या पैशाची कोई भी ग्रन्थ या नाटकों के अंश ईसा की तीसरी-चौथी शती का उद्भव शौरसेनी से हुआ, किन्तु शौरसेनी को एकमात्र प्राचीन से पूर्व के नहीं है, जबकि पालित्रिपिटक और अर्धमागधी भाषा मानने वाले तथा मागधी और पैशाची को उससे उदभत आगम साहित्य के अनेक ग्रन्थ ई.प. तीसरी-चौथी शती में मानने वाले ये विद्वान् वररुचि के उस सूत्र को भी उद्धृत क्यों निर्मित हो चुके थे। नहीं करते, जिसमें शौरसेनी की प्रकृति संस्कृत बताई गई है यथा . "शौरसेनी - १२/१- टीका शूरसेनानां भाषा शौरसेनी सा च 'प्रकृति : शौरसेनी' का सम्यक अर्थ लक्ष्यलक्षणाभ्यां स्पुटीकियते इति वेदितव्यम्। जो विद्वान् मागधी या अर्धमागधी को शौरसेनी से परवर्ती अधिकारसूत्रमेतदापरिच्छेदसमाप्ते: १२/१ प्रकृति: संस्कृतम १२/ पी से विकसित मानते हैं वे अपने कथन का आधार २ टीका-शौरसेन्यां ये शब्दास्तेषां प्रकृतिः संस्कृतम्। प्राकृत प्रकाश वररुचि (लगभग ७वीं शती) के प्राकृतप्रकाश और हेमचन्द्र १२/२" अतः उक्त सूत्र के आधार पर हमें यह भी स्वीकार (लगभग १२वीं शताब्दी) के प्राकृतव्याकरण के निम्न सूत्रों को करना होगा कि शौरसेनी प्राकृत संस्कृत से उत्पन्न हुई। इस बताते हैं प्रकार प्रकृति का अर्थ उद्गम स्थल करने पर उसी प्राकृतप्रकाश के आधार पर यह भी मानना होगा कि मूलभाषा संस्कृत थी अ. १. प्रकृतिः शौरसेनी १०/२ और उसी से शौरसेनी उत्पन्न हुई। क्या शौरसेनी के पक्षधर इस अस्याः पैशाच्याः प्रकृतिः शौरसेनी। स्थितायां शौरसेन्यां सत्य को स्वीकार करने को तैयार हैं। भाई सुदीपजी जो शौरसेनी पैशाची-लक्षणं प्रवर्तयितव्यम्। के पक्षधर हैं और प्रकृति : शौरसेनी के आधार पर मागधी को । शौरसेनी से उत्पन्न बताते हैं, वे स्वयं भी प्रकृतिः संस्कृतम्२. प्रकृतिः शौरसेनी ११(२१ प्राकृतप्रकाश १२/२ के आधार पर यह मानने को तैयार नहीं है अस्याः मागध्याः प्रकृतिः शौरसेनीति वेदितव्यम। कि प्रकृति का अर्थ उससे उत्पन्न हुई ऐसा है। वे स्वयं लिखते हैं Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - यतीन्द्र सूरि तारकग्रन्य जैन आगम एवं साहित्य ॐ - जितने भी प्राकृत-व्याकरणशास्त्र उपलब्ध हैं, वे सभी और उसके विभिन्न भेद अर्थात् विभिन्न साहित्यिक प्राकृतें हैं। संस्कृत भाषा में हैं एवं संस्कृत व्याकरण के माडल पर निर्मित सत्य यह है कि बोली के रूप में तो प्राकृतें ही प्राचीन हैं और हैं। अतएव उनमें प्रकृतिः संस्कृतम् जैसे प्रयोग देखकर कतिपयजन संस्कृत उनका संस्कारित रूप है, वस्तुतः संस्कृत विभिन्न प्राकृत ऐसा भ्रम करने लगते हैं कि प्राकृतभाषा संस्कृतभाषा से उत्पन्न बोलियों के बीच सेतु का काम करने वाली एक सामान्य साहित्यिक हुई, ऐसा अर्थ कदापि नहीं है। प्राकृतविद्या जुलाई-सितंबर ९६, भाषा के रूप में अस्तित्व में आई। पृ. १४। भाई सुदीपजी जब शौरसेनी की बारी आती है, तब . यदि हम भाषा-विकास की दृष्टि से इस प्रश्न पर चर्चा करें आप प्रकृति का अर्थ आधार माडल करें और जब मागधी का तो भी यह स्पष्ट है कि संस्कृत सुपरिमार्जित, सुव्यवस्थित और प्रश्न आए तब आप प्रकृतिः शौरसेनी का अर्थ मागधी शौरसेनी व्याकरण के आधार पर सुनिबद्ध भाषा है। यदि हम यह मानते से उत्पन्न हुई ऐसा करें यह दोहरा मापदण्ड क्यों? क्या केवल हैं कि संस्कृत से प्राकृतें निर्मित हुई हैं, तो हमें यह भी मानना * शौरसेनी को प्राचीन और मागधी को अर्वाचीन बताने के लिए? होगा कि मानव जाति अपने आदिकाल में व्याकरण शास्त्र के वस्तुतः प्राकृत और सस्कृत शब्द स्वय हा इस बात के प्रमाण है नियमों से संस्कारित संस्कत भाषा बोलती थी और उसी से कि उनमें मलभाषा कौन है? संस्कृत शब्द स्वयं ही इस बात का अपभ्रष्ट होकर शौरसेनी और शौरसेनी से अपभ्रष्ट होकर मागधी.. सूचक है कि संस्कृत स्वाभाविक या मूलभाषा न होकर एक पैशाची, अपभ्रंश आदि भाषाएँ निर्मित हुई। इसका अर्थ यह भी संस्कारित कृत्रिम भाषा है। प्राकृत शब्दों एवं शब्दरूपों का नाम जातिको होगा कि मानव जाति की मूल भाषा अर्थात् संस्कृत से अपभ्रष्ट व्याकरण द्वारा संस्कार करके जो भाषा निर्मित होती है, उसे ही होते-होते ही विभिन्न भाषाओं का जन्म हुआ, किन्तु मानव सस्कृत कहा जा सकता है। जिस सस्कारित न किया गया हो वह जाति और मानवीय संस्कृति के विकास का वैज्ञानिक इतिहास संस्कृत कैसे होगी? वस्तुतः प्राकृत स्वाभाविक या सहज भाषा है इस बात को कभी भी स्वीकार नहीं करेगा। और उसी को संस्कारित करके संस्कृत भाषा निर्मित हुई है। इस दृष्टि से प्राकृत मूलभाषा है और संस्कृत उससे उद्भूत हुई है। वह तो यही मानता है कि मानवीय बोलियों के संस्कार द्वारा ही विभिन्न साहित्यिक भाषाएँ अस्तित्व में आई अर्थात् हेमचन्द्र के पूर्व नमिसाधु ने रुद्रट के काव्यालङ्कार की विभिन्न बोलियों से ही विभिन्न भाषाओं का जन्म हआ है। वस्ततः टीका में प्राकृत और संस्कृत शब्द का अर्थ स्पष्ट कर दिया है। इस विवाद के मूल में साहित्यिक भाषा और लोकभाषा अर्थात् वे लिखते हैं-- बोली के अंतर को नहीं समझ पाना है। वस्तुतः प्राकृतें अपने. सकल जगज्जन्तुनां व्याकरणादिभिरनाहितसंस्कार: सहजो मूलस्वरूप में भाषाएँ न होकर बोलियाँ रही हैं। यहाँ हमें यह भी वचनव्यापार: प्रकृतिः तत्र भवं सैव वा प्राकृतम्। आरिसवयणे ध्यान रखना चाहिए कि प्राकृत कोई एक बोली नहीं अपितु सिद्धं, देवाणं अद्धमागहा वाणी इत्यादि,वचनाद्वा प्राक् पूर्वकृत् बोली-समूह का नाम है। जिस प्रकार प्रारंभ में विभिन्न प्राकृतों प्राकृतम्। बालमहिलादिसुबोधं सकलभाषानिन्धनभूत अर्थात् बोलियों को संस्कारित करके एक सामान्य वैदिक भाषा वचनमुच्यते। मेघनिर्मुक्तजलमिवैकस्वरूपं तदेव च का निर्माण हुआ, उसी प्रकार कालक्रम में विभिन्न बोलियों को देशविशेषात्संस्कारकरणात् च समासादित विशेष सत् संस्कृतादुत्तर अलग-अलग रूप में संस्कारित करके उनसे विभिन्न साहित्यिक भेदोनाप्नोति। काव्यालंकार -टीका, नमिसाधु २/१२ प्राकृतों का निर्माण हुआ। अत: यह एक सुनिश्चित सत्य है कि अर्थात् जो संसार के प्राणियों का व्याकरण आदि संस्कार बोली के रूप में प्राकृतें मूल एवं प्राचीन है और उन्हीं से संस्कृत से संहित सहज वचन व्यापार है उससे निःसत भाषा प्राकत है का विकास एक कामन भाषा के रूप में हुआ। प्राक़तें बोलियाँ जो बालक, महिला आदि के लिए भी सबोध है और पर्व में और संस्कृत भाषा है। बोली को व्याकरण से संस्कारित करके निर्मित होने से (प्राक + कृत) सभी भाषाओं की रचना का ___ एकरूपता देने से भाषा का विकास होता है। आधार है वह तो मेघ से निर्मुक्त जल की तरह सहज है उसी का भाषा से बोली का विकास नहीं होता है। विभिन्न प्राकृत देश-प्रदेश के आधार पर किया गया संस्कारित रूप संस्कृत बोलियों को आगे चलकर व्याकरण के नियमों से संस्कारित anitariasardarosamirmirandiindaindiandutorsrini११३dioidiosaritambarsamirsidasardaroramidarsrande Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - यतीन्द्र सूरि स्मारकग्रन्थ - जैन आगम एवं साहित्य - किया गया तो उनसे विभिन्न प्राकृतों का जन्म हुआ। जैसे श्वेताम्बर आगम शौरसेनी से अर्धमागधी में रूपान्तरित हुए। अपितु मागधी बोली से मागधी प्राकृत का, शौरसेनी बोली से शौरसेनी इससे तो यही फलित होता है कि अर्धमागधी आगम ही शौरसेनी प्राकृत का और महाराष्ट्र की बोली से महाराष्ट्री प्राकृत का विकास में रूपान्तरित हुए हैं। पुनः अर्धमागधी भाषा के स्वरूप के हुआ। प्राकृत के शौरसेनी, मागधी, पैशाची, महाराष्ट्री आदि भेद संबंध में दिगंबर विद्वानों में जो भ्रांति प्रचलित रही है उसका यहाँ तत्-तत् प्रदेशों की बोलियों से उत्पन्न हुए हैं न कि किसी प्राकृत स्पष्टीकरण भी आवश्यक है। संभवतः ये विद्वान् अर्धमागधी विशेष से। यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि कोई भी प्राकृत व्याकरण और महाराष्ट्री के अंतर को स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाए हैं तथा सातवीं शती से पूर्व का नहीं है। साथ ही उनमें प्रत्येक प्राकृत के सामान्यतः अर्धमागधी और महाराष्ट्री को पर्यायवाची मानकर लिए अलग-अलग मॉडल अपनाए गये हैं। वररुचि के लिए ही चलते रहे। यही कारण है कि उपाध्ये जैसे विद्वान् भी 'य' शौरसेनी की प्रकृति संस्कृत है। जबकि हेमचन्द्र के लिए शौरसेनी श्रुति को अर्धमागधी का लक्षण बताते हैं। जबकि वह मूलतः (महाराष्ट्री) प्राकृत है, अतः प्रकृति का अर्थ आदर्श महाराष्ट्री प्राकृत का लक्षण है, न कि अर्धमागधी का। अर्धमागधी या मॉडल है। अन्यथा हेमचन्द्र के शौरसेनी के संबंध में 'शेषं तोय' श्रुति प्रधान नहीं है। प्राकृतवत्' (८.४.२८६) का अर्थ होगा, शौरसेनी महाराष्ट्री से यह सत्य है कि श्वेताम्बर आगमों की अर्धमागधी भाषा में उत्पन्न हुई, जो शौरसेनी के पक्षधरों को मान्य नहीं होगा। कालक्रम में परिवर्तन हुए हैं और उस पर महाराष्टी प्राकृत की य' क्या अर्धगामधी-आगम मूलतः शौरसेनी में थे? श्रुति का प्रभाव आया है, किन्तु यह मानना पूर्णतः मिथ्या है कि श्वेताम्बर आगमों का शौरसेनी से अर्धमागधी में रूपान्तरण हुआ ___प्राकृतविद्या, जनवरी-मार्च ९६ के सम्पादकीय में डॉ. है। वास्तविकता यह है कि अर्धमागधी आगम ही माथरी और. सुदीप जैन ने प्रो. टाँटिया को यह कहते हुए प्रस्तुत किया है कि वल्लभी वाचनाओं के समय क्रमशः शौरसेनी और महाराष्ट्री से "श्वेताम्बर जैन साहित्य का भी प्राचीन रूप शौरसेनी प्राकृतमय प्रभावित हुए हैं। ही था, जिसका स्वरूप क्रमशः अर्धमागधी के रूप में बदल टाँटिया जी जैसा विद्वान इस प्रकार की मिथ्या धारणा को गया।" इस संदर्भ में हमारा प्रश्न यह है कि यदि प्राचीन श्वेताम्बर आगम-साहित्य शौरसेनी प्राकृत में था, तो फिर वर्तमान उपलब्ध प्रतिपादित करे कि शौरसेनी आगम ही अर्धमागधी में रूपान्तरित हुए यह विश्वसनीय नहीं लगता है। यदि टाँटिया जी का यह पाठों में कहीं भी शौरसेनी का प्रभाव क्यों नहीं दिखाई देता। . कथन, कि पाली त्रिपिटक और अर्धमागधी आगम मलतः शौरसेनी इसके विपरीत हम यह पाते हैं कि दिगंबर परंपरा में मान्य में थे और फिर पाली और अर्धमागधी में रूपान्तरित हुए, सत्य शौरसेनी आगम साहित्य पर अर्धमागधी और महाराष्ट्री प्राकृत है तो उन्हें या सुदीप को इसके प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए। का व्यापक प्रभाव है, इस तथ्य की सप्रमाण चर्चा हम पूर्व में वस्तुतः जब किसी बोली को साहित्यिक भाषा का रूप दिया कर चुके हैं। इस संबंध में दिगंबर परंपरा के शीर्षस्थ विद्वान् प्रो. जाता है तो एकरूपता के लिए नियम या व्यवस्था आवश्यक ए.एन. उपाध्ये का यह स्पष्ट मन्तव्य है कि प्रवचनसार की भाषा होती है और यही नियम भाषा का व्याकरण बनाते हैं। विभिन्न पर श्वेताम्बर आगमों की अर्धमागधी भाषा का पर्याप्त प्रभाव है प्राकृतों को जब साहित्यिक भाषा का रूप दिया गया तो उनके और अर्धमागधी भाषा की अमेक विशेषताएँ उत्तराधिकार के लिए भी व्याकरण के नियम आवश्यक हए और ये व्याकरण के रूप में इस ग्रन्थ को प्राप्त हुई हैं। इसमें स्वरपरिवर्तन, मध्यवर्ती नियम मख्यत: संस्कृत से गृहीत किए गए। जब व्याकरणशास्त्र व्यंजनों के परिवर्तन 'य' श्रुति इत्यादि अर्धमागधी भाषा के समान में किसी भाषा की प्रकृति बताई जाती है तब वहाँ तात्पर्य होता है ही मिलते हैं। दूसरे वरिष्ठ दिगंबर विद्वान् प्रो. खड़बड़ी का कहना कि उस भाषा के व्याकरण के नियमों का मूल आदर्श किस है कि षट्खण्डागम की भाषा शुद्ध शौरसेनी नहीं है। इस प्रकार भाषा के शब्दरूप हैं? उदाहरण के लिए जब हम शौरसेनी के यहाँ एक ओर दिगंबर विद्वान इस तथ्य को स्पष्ट रूप से स्वीकार व्याकरण की चर्चा करते हैं तो हम यह मानते हैं कि उसके कर रहे हैं कि दिगम्बर आगमों पर श्वेताम्बर आगमों की अर्धमागधी व्याकरण का आदर्श अपनी कुछ विशेषताओं को छोड़कर जिसकी भाषा का प्रभाव है वहाँ यह कैसे माना जा सकता है कि चर्चा उस भाषा के व्याकरण में होती है, संस्कृत के शब्दरूप हैं। Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यतीन्द्र सूरि स रकान्य - जैन आगम एवं साहित्य - किसी भी भाषा का जन्म बोली के रूप में पहले होता है प्रकृति कहा जाता है। मूलशब्द से जो शब्द रूप बना है वह पि.र बोली से साहित्यिक भाषा का जन्म होता है जब साहित्यिक तद्भव है। प्राकृत-व्याकरण संस्कृत शब्द से प्राकृत का तद्भव भाषा बनती है तब उसके लिए व्याकरण के नियम बनाए जाते शब्दरूप कैसा बना है, इसकी व्याख्या करता है। अतः यहाँ हैं, ये व्याकरण के नियम जिस भाषा के शब्दरूपों के आधार पर संस्कृत को प्रकृति कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि तद्भव उस भाषा के शब्दरूपों को समझाते हैं वही उसकी प्रकृति कहलाते शब्दों के संदर्भ में संस्कृत के शब्द को आदर्श मानकर या हैं।यह सत्य है कि बोली का जन्म पहले होता है, व्याकरण उसके माडल मानकर यह व्याकरण लिखा गया है। अतः प्रकृति का बाद बनता है। शौरसेनी अथवा प्राकृत की प्रकृति को संस्कृत अर्थ आदर्श या माडल है। संस्कृत शब्दरूप को मॉडल, आदर्श मानने का अर्थ इतना ही है कि इन भाषाओं के जो भी व्याकरण मानना, इसलिए आवश्यक था कि प्राकृत-व्याकरण संस्कृत के बने हैं वे संस्कृत शब्दरूपों के आधार पर बने हैं। यहाँ पर भी जानकार विद्वानों को दृष्टि में रखकर या उनके लिए ही लिखे गए ज्ञातव्य है कि प्राकृत का कोई भी व्याकरण प्राकृत के लिखने थे। जब डा. सुदीप जी शौरसेनी के संदर्भ में प्रकृति: संस्कृतम् या बोलने वालों के लिए नहीं बनाया गया, अपितु उनके लिए का अर्थ माडल या आदर्श करते हैं तो उन्हें मागधी, पैशाची बनाया गया जो संस्कृत में लिखते या बोलते थे। यदि हमें आदि के संदर्भ में 'प्रकृतिः शौरसेनी' का अर्थ भी यही करना किसी संस्कृत के जानकार व्यक्ति को प्राकृत के शब्द या शब्दरूपों चाहिए कि शौरसेनी को माडल या आदर्श मानकर इनका व्याकरण को समझाना हो तो हमें उसका आधार संस्कृत को ही बनाना होगा लिखा गया है, इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि मागधी आदि और उसी के आधार पर यह समझाना होगा कि संस्कृत के किस प्राकृतों की उत्पत्ति शौरसेनी से हुई है। हेमचन्द्र ने महाराष्ट्री शब्द से प्राकृत का कौन सा शब्दरूप कैसे निष्पन्न हआ है। प्राकृत को आधार मानकर शौरसेनी, मागधी आदि प्राकृतों को इसलिए जो भी प्राकृत-व्याकरण निर्मित किए गए अपरिहार्य समा समझाया है, अतः इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि महाराष्ट्री रूप से वे संस्कृत शब्दों या शब्दरूपों को आधार मानकर निर्मित पर प्राचीन है या महाराष्ट्री से मागधी, शौरसेनी आदि उत्पन्न हुई। किए गए, अपरिहार्य रूप से वे संस्कृत शब्दों या शब्दरूपों को प्राचीन कौन? अर्धमागधी या शौरसेनी आधार मानकर प्राकृत शब्दों या शब्द रूपों की व्याख्या करते इसी संदर्भ में टाँटिया जी के नाम से यह भी प्रतिपादित हैं। संस्कृत को प्राकृत की प्रकृति कहने का इतना ही तात्पर्य है। इसी प्रकार जब मागधी, पैशाची या अपभ्रंश की प्रकृति शौरसेनी किया गया है कि "यदि वर्तमान अर्धमागधी आगम साहित्य को को कहा जाता है तो उसका तात्पर्य होता है कि प्रस्तुत व्याकरण । ही मूल आगम साहित्य मानने पर जोर देंगे तो इस अर्धमागधी के नियमों में इन भाषाओं के शब्दरूपों को शौरसेनी शब्दों को भाषा का आज से १५०० वर्ष पहले अस्तित्व ही नहीं होने से इस आधार मानकर समझाया गया है। प्राकृतप्रकाश की टीका में स्थिति में हमें अपने आगम साहित्य को ही ५०० ई. के परवर्ती वररुचि ने स्पष्टतः लिखा है 'शौरसेन्या ये शब्दास्तेषां प्रकृतिः मानना पड़ेगा।" ज्ञातव्य है कि यहाँ भी महाराष्ट्री और अर्धमागधी संस्कृतम्' (१२/२) अर्थात् शौरसेनी के जो शब्द हैं उनकी के अंतर को न समझते हुए एक भ्रांति को खड़ा किया किया प्रकृति या आधार संस्कृत शब्द हैं। गया है। सर्वप्रथम तो यह समझ लेना चाहिए कि आगमों के प्राचीन अर्धमागधी के 'त' श्रुति प्रधान पाठ चूर्णियों और अनेक यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि प्राकृतों में तीन प्रकार के शब्द - प्राचीन प्रतियों में आज भी मिल रहे हैं, उससे नि:संदेह यह सिद्ध रूपलिते हैं, तद्भव, तत्सम और देशज। देशज शब्द वे हैं जो । होता है कि मूल अर्धमागधी 'त' श्रुति प्रधान थी और उसमें लोप किसी देश-विशेष में किसी विशेष अर्थ में प्रयुक्त हैं। इनके की प्रवृत्ति नगण्य ही थी और यह अर्धमागधी भाषा शौरसेनी अर्थ की व्याख्या के लिए व्याकरण की कोई आवश्यकता नहीं और महाराष्ट्री से प्राचीन भी है यदि श्वेताम्बर आगम शौरसेनी से होती है। तद्भव शब्द वे हैं जो संस्कृत शब्दों से निर्मित हैं, महाराष्ट्री जिसे दिगंबर विद्वान्, भ्रांति से अर्धमागधी कह रहे हैं, जबकि संस्कृत के समान शब्द तत्सम हैं। संस्कृत व्याकरण में बदले गए तो फिर उनकी प्राचीन प्रतियों में 'त' श्रुति के स्थान पर दो शब्द प्रसिद्ध हैं- प्रकृति और प्रत्यय। इनमें मूल शब्दरूप का '' श्रति के पाठ क्यों उपलब्ध नहीं होते हैं जो शौरसेनी का andidnianbidnidrodromorrorrowdubaridriodrira[११५/ doorbonirbrdasranAGAGrdasdrsandidroximiririrande Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - यतीन्द्र सूरि स्मारकग्रन्थ - जैन आगम एवं साहित्य विशेषता है। इस प्रसंग में डा. टाँटिया जी के नाम से यह भी एक भी ग्रन्थ है जो ई.पू. में लिखा गया हो? सत्य तो यह है कि कहा गया है कि आज भी आचारांग सूत्र आदि की प्राचीन ईसा की चौथी-पाँचवीं शताब्दी के पूर्व शौरसेनी में निबद्ध एक प्रतियों में शौरसेनी के शब्दों की प्रचुरता मिलती है। मैं आदरणीय भी ग्रन्थ नहीं था। जबकि मागधी के अभिलेख और अर्धमागधी. टाँटिया जी से और भाई सुदीप जी से साग्रह निवेदन करूँगा की के आगम ई.पू. तीसरी शती से उपलब्ध हो रहे हैं। पुनः यदि ये वे आचारांगऋषिभाषित सूत्रकृतांग आदि की किन्हीं भी प्राचीन लोग जिसे अर्धमागधी कह रहे हैं उसे महाराष्ट्री भी मान लें तो प्रतियों में 'द' श्रुति प्रधान पाठ दिखला दें। प्राचीन प्रतियों में जो उसके भी ग्रन्थ ईसा की प्रथम शताब्दी से उपलब्ध होते हैं। पाठ मिल रहे हैं, वे अर्धमागधी या आर्ष प्राकृत के हैं, न कि सातवाहन हाल की गाथासप्तशती महाराष्ट्री प्राकृत का प्राचीन शौरसेनी के हैं। यह एक अलग बात है कि कुछ शब्दरूप आर्ष ग्रन्थ है, जो इसी ई.पू. प्रथम शती से ईसा की प्रथम शती के अर्धमागधी और शौरसेनी में समान हैं। मध्य रचित है। पुनः यह एक संकलन-ग्रन्थ है जिसमें अनेक वस्तुतः इन प्राचीन प्रतियों में न तो 'द' श्रति देखी जाती है। ग्रन्थों से गाथाएँ संकलित की गई है इसका तात्पर्य यह हुआ कि और न 'न' के स्थान पर 'ण' की प्रवृत्ति देखी जाती है जिसे / इसके पूर्व भी महाराष्ट्री प्राकृत में ग्रंथ रचे गए थे। कालिदास के व्याकरण में शौरसेनी की विशेषता कहा जाता है। सत्य तो यह नाटक जिनमें शौरसेनी का प्राचीनतम रूप मिलता है, भी ईसा है कि अर्धमागधी आगमों का ही शौरसेनी रूपान्तरण हुआ है न की चतुर्थ शताब्दी के बाद के ही हैं। कुन्दकुन्द के ग्रन्थ स्पष्ट रूप कि शौरसेनी आगमों का अर्धमागधी रूपान्तरण। यह सत्य है से न केवल अर्धमागधी आगमों से अपितु परवर्ती 'य' श्रति कि न केवल अर्धमागधी आगमों पर अपितु शौरसेनी आगमतुल्य प्रधान महाराष्ट्री से भी प्रभावित हैं, किसी भी स्थिति में ईसा की कुन्दकुन्द आदि के ग्रन्थों पर भी महाराष्ट्री की 'य' श्रुति का स्पष्ट / ५वीं शताब्दी के पूर्व के सिद्ध नहीं होते हैं। षटखण्डागम और प्रभाव है। जिसे हम पूर्व में सिद्ध कर चुके हैं। कुन्दकुन्द के ग्रन्थों में गुणस्थान, सप्तभंगी आदि लगभग ५वीं शती में निर्मित अवधारणाओं की उपस्थिति उन्हें श्वेताम्बर आगमों क्या पंद्रह सौ वर्ष पूर्व अर्धमागधी भाषा एवं श्वेताम्बर और उमास्वाति के तत्त्वार्थसूत्र (लगभग चतुर्थ शती) से परवर्ती अर्धमागधी आगमों का अस्तित्व नहीं था? ही सिद्ध करती है, क्योंकि इनमें ये अवधारणाएँ अनुपस्थित हैं। इस संबंध में मैंने अपने न्थ 'गुणस्थानसिद्धांत-एक विश्लेषण' डा. संदीप जी द्वारा टाँटिया जी के नाम से उद्धृत यह और 'जैन धर्म का यापनीसम्प्रदाय' में विस्तार से प्रकाश डाला कथन कि 1500 वर्ष पहले अर्धमागधी भाषा का अस्तित्व ही है। इस प्रकार सत्य तो यह है कि अर्धमागधी भाषा या अर्धमागधी नहीं था पूर्णतः भ्रान्त है। आचारांग 'सूत्रकृतांग' ऋषिभाषित आगम नहीं, अपितु शौरसेनी भाषा और शौरसेनी आगम ही ईसा जैसे, आगमों को पाश्चात्य विद्वानों ने एक स्वर से ई.पू. तीसरी की ५वीं शती के पश्चात् अस्तित्व में आये। अच्छा होगा कि भाई चौथी शताब्दी या उससे भी पहले का माना है। क्या उस समय सुदीप जी पहले मागधी और पाली तथा अर्धमागधी और महाराष्ट्री ये आगम अर्धमागधी भाषा में निबद्ध न होकर शौरसेनी में निबद्ध के अंतर को एवं इनके प्रत्येक लक्षण को, तथा जैन आगमिक थे। ज्ञातव्य है कि 'द' श्रुति प्रधान और णकार की प्रवृत्ति वाली साहित्य के ग्रन्थों के कालक्रम को और जैन इतिहास को तटस्थ शौरसेनी का जन्म तो उस समय हआ ही नहीं था अन्यथा अशोक दृष्टि से समझ लें और फिर प्रमाण सहित अपनी कलम निर्भीक के अभिलेखों में और मथुरा (जो शौरसेनी की जन्मभूमि है) के रूप से चलाएँ, व्यर्थ की आधारहीन भ्रांतियाँ खड़ी करके समाज अभिलेखों में कहीं तो इस शौरसेनी के वैशिष्ट्य वाले शब्दरूप में कटुता के बीज न बोएँ। उपलब्ध होने चाहिए थे? क्या शौरसेनी प्राकृत में निबद्ध ऐसा witonitonianbarobroanoramidnironidirdrinironiro[116Honorardrinidirdindidroriramirariandinidiroren