Book Title: Vakrokti Jivitam
Author(s): Radhyshyam Mishr
Publisher: Chaukhamba Vidyabhavan

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Page 493
________________ ४३२ वक्रोक्तिजीवितम् की परम्परा । तथा यह सोने की सान पर खींची गई रेखा के समान चमकदार बिजली है न कि मेरी प्यारी उर्वशी ।। ३५ ॥ (अन्यश्च ) पयां स्पृशेद्वसुमतीम्..... | इत्यादि ।। ३६ ।। ( और भी) ( उदाहरण संख्या ३।२६ पर पूर्वोद्धृत ) पद्धयां स्पृशेद्वसुमतिम्-|| इत्यादि श्लोक ।। ३६ ।। (अन्यच्च ) तरङ्गभ्रूभङ्गा क्षुभितविहगश्रेणिरसना | इत्यादि ३७ ।। (तथा ) उदाहरण संख्या ३।४१ पर पहले उद्धृत तरंग भ्रभङ्गाक्षुभितविहगश्रेणिरसना ।। इत्यादि श्लोक ॥ ३७ ।। यथा वा-- किरातार्जुनीये बाहुयुद्धप्रकरणम् । अथवा जैसे-किरातार्जुनीय में बाहुयुद्ध का प्रकरण जहाँ वीर रस उद्दीप्त किया गया है। पुनरिमामवान्यथा प्रथयात-- फिर इसी ( प्रकरणवक्रता ) को दूसरे उङ्ग से प्रस्तुत करते हैं प्रधानवस्तुनिष्पत्त्यै वस्त्वन्तरविचित्रता। यत्रोल्लसति सोल्लेखा सापराप्यस्य वक्रता ॥ ११ ॥ प्रधाम ( आधिकारिक ) वस्तु की सिद्धि के लिए जहां अन्य (प्रासङ्गिक ) बस्तु को उल्लेखपूर्ण विचित्रता उन्मीलित होती है वह इस ( प्रकरण ) की अन्य ( सातवीं ) वक्रता होती है ।। ११॥ .. __ अपरापि अस्य प्रकरणस्य वक्रता वक्रभावो भवतीति सम्बन्धः । यतोलसति उन्मीलति सोल्लेखा अभिनवोद्भेदमङ्गीसुभगा..."प्रतिरूपमितरद्वस्तु तस्य विचित्रता वैचित्र्यं नूननचमत्कार इति यावत् । किमर्थम्--प्रधानवस्तुनिष्पत्तये । प्रधानमविकृतं प्रकरणं कामपि वक्रि. माणमाक्रामति । इस प्रकरण की दूसरी भी वक्रता अर्थात् बांकपन होता है। जहाँ ( उशसितं अर्थात् उन्मीलित होती है ) उल्लेखपूर्ण अर्थात् नवीन उन्मेष की भङ्गिमा से रमणीय..."प्रतिरूप जो दूसरी (प्रासङ्गिक ) वस्तु उसकी विचित्रता अर्थात् वैचित्र्य अथवा अभिनव चकत्कार ( जहां उम्मीलित होता है) किसलिए

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