Book Title: Tirthankar Bhagwan Mahavira
Author(s): Virendra Prasad Jain
Publisher: Akhil Vishwa Jain Mission

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Page 216
________________ १७९ तीर्थकर भगवान महावीर जीवन में अहंत महावीर, फिर जीवनान्त पर सिद्ध सफल । मानवता को मृदु मूर्ति सुभग, दलितों दोनों के प्राण विकल ॥ पीड़ित की प्राहों के धीरज, शोषित के सब शोषण शोषक । आश्रय होनों के दृढ़ आश्रय, पापी - उद्धारक - पथ - पोषक ॥ अबलम्ब चाहकों के सम्बल, मानव - मानवता - उन्नायक । पशुता के बर्बर बार क्षार, सज्जीवन के प्रभु परिचायक ॥ मानवोत्कर्ष के चिर प्रकर्ष, शुचितम सात्विक जीवनादर्श । पालादपूर्णतम मूर्त हर्ष, निस्सोम क्षीण विश्वापकर्ष ॥ युग युग में सम्यक् मग हष्टा, सम्यक् दर्शन के दृष्य चित्र । सम्यक श्रद्धा के मूर्त पात्र, सदज्ञान-दान-दाता सुमित्र ॥ सुख-शान्ति उदधि के लहर-लास, अति पतितों के श्वासोच्छवास ।

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