Book Title: Tattvarthvarttikam Part 1
Author(s): Bhattalankardev, Mahendramuni
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 16
________________ ३२६ मूल पृष्ठ हिन्दी पृष्ठ मूल पृष्ठ हिन्दी पृष्ठ सूत्र में आये हुए 'तत्' पदकी सार्थकता ५६ ३०६ ऋजु आदिका लक्षण तथा मनःमतिज्ञानके अवग्रह आदि चार भेद ६० ३०६ पर्ययके अर्थका विचार ८३ ३२३ अवग्रह आदिके लक्षण व ानुपूर्वी ऋजुमति तथा विपुलमतिके भेद ८४ ३२४ निरूपणकी सार्थकता दोनों मनःपर्ययज्ञानोंकी परस्पर अवग्रह तथा ईहा ज्ञानकी अप्रमाणता विशेषता ८५ ३२४ ___ का निराकरण | अवधि तथा मनःपर्ययज्ञानकी परअवाय शब्दके समान अपाय शब्दकी स्पर विशेषता ८६ ३२४ सार्थकता मनःपर्ययशान किनके होता है ? ८६ ३२५ दर्शन और अवग्रहमें भेद ६१ ३०७ मति और श्रुतका विषय ८७ ३२५ अवग्रह आदिके कार्यभेदका निरूपण ६१ ३०७ अवधिज्ञानका विषय श्रवग्रह आदि किन अर्थोके होते हैं ? ६२ ३०८ | मनःपर्ययज्ञानका विषय ८८ ३२६ युक्ति पूर्वक बह आदि शब्दोका अर्थ ६२ ३०८ केवलज्ञानका विषय ८८ ३२६ बह श्रादिको प्रारम्भमें रखनेका कारण ६३ ३०६ द्रव्य और पर्यायका विवेचन ८८ ३२६ इन्द्रिय और मनके पालम्बनसे बहु एक ही आत्मामें एक साथ कितने ___आदिककी योजना ६३ ३०६ ज्ञान होते हैं? ९० ३२० बह बहुविध श्रादि शब्दोंके अर्थमें भेद ६४ ३०६ सूत्रस्थ पदोंका तात्पर्य एवं ज्ञान ये बहु प्रादि भेद पदार्थके हैं सम्बन्धी विशेष विचार अवग्रहकी विशेषता मति, श्रुत और अवधि विपर्यय भी व्यंजनावग्रह चक्षु और मनसे नहीं होता ६७ ३११ ९१ ३२८ चक्षु और मन अप्राप्यकारी है ६७ ३११ विपर्यय होनेका हेतु निर्देश । ६१ ३२८ ६१ मनके अनिन्द्रियस्व तथा अननिन्द्रि ये तीन ज्ञान विपर्यय क्यों हैं इस यत्वका विचार ६६ ३१३ बातका विवेचन मतिज्ञानका विषय ७० ३१३ अन्य मतवालोंके द्वारा मानी गई श्रुतज्ञानका विवेचन ७० ३१४ पदार्थ व्यवस्था विपर्ययका कारण ६३ ३२६ श्रुतज्ञानके अङ्ग प्रविष्ट और अङ्ग भेदपूर्वक नयोंका कथन बाह्य ये दो मूल भेद तथा नयका लक्षण व उसके दो मूल भेद ६.४ ३३० इनके उत्तर भेदोंका विवेचन ७२ ३१५ सातों नयोंका लक्षणपूर्वक विस्तृत भवप्रत्यय अवधिज्ञान और उसके विवेचन ६५ ३३० स्वामीका निर्देश | सात नयोंकी उत्तरोत्तर सूक्ष्मता व पूर्व पूर्वहेतुताका विचार ६ ३३४ देवों और नारकियों के द्रव्य, क्षेत्र आदिकी अपेक्षा अवधिज्ञानका द्वितीय अध्याय निरूपण ८० ३ जीवके औपशमिक आदिभावोंका कथन १०. ३३६ जयोपशमनिमित्तक अवधि व उसके औपशमिक आदि पदोंका अर्थ व स्वामीका विचार उनका क्रमनिर्देश १०० ३३६ अवधिशानके अनुगामी आदि भेदों औपशमिक प्रादि भावोंके भेद १०३ ३३७ का विवेचन द्वि आदि शब्दोंका भेद शब्दके साथ प्रकारान्तरसे अवधिशानके देशावधि तथा द्विश्रादि शब्दोंका परस्पर श्रादि तीन भेद तथा उनके सम्बन्ध कथन १०३ ३३७ जघन्य प्रादि भेदोका तारतम्य ८१ ३२१ नोपरामिक भावके भेद १.१ १८ मनापर्ययज्ञान और उसके भेद ८५ ३२३ । श्रीपशमिक सम्यक्त्वका लक्षण १०४ ३३८ ९२. ३२८ ७९ ३१९ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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