Book Title: Sirichandvejjhay Painnayam
Author(s): Purvacharya, Kalapurnasuri, Jayanandvijay
Publisher: Guru Ramchandra Prakashan Samiti
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पंचसमिओ तिगुत्तो सुचिरं कालं मुणी विहरिऊणं 1 मरणे विराहयंतो धम्ममणाराहओ भणिओ ॥ १५७ ॥
जो मुनि पांच समिति से सावधान होकर तीन गुप्ति से गुप्त होकर चिरकालतक विचरण कर जो मरण समय में धर्म की विराधना करे तो उसको ज्ञानी अनाराधक कहते हैं ।
बहुमोहो विहरित्ता, पच्छिमकालंमि संवुडो सो उ । आहारणोवउत्तो, जिणेहिं आराहओ भणिओ ॥ १५८ ॥
अधिक समय तक अत्यन्त मोहवश जीवन जीकर अंतिम समय में जो संवर भाव युक्त होकर मरण समय में आराधना में उपयुक्त रहे तो जिनेश्वरों ने उसे आराधक कहा है ।
तो सव्वभावसुद्ध आराहणमभिमुहो विसंभंतो । संथारं पडिवन्नो इणमं हियए विचिंतिज्जा ॥ १५९ ॥
इससे सर्वभाव से शुद्ध आराधनाभिमुख होकर भ्रांति रहित होकर अनशन स्वीकृत मुनि अपने हृदय में निम्न प्रकार से चिंतन करे ।
इक्को मे सासओअप्पा, नाणदंसणसंजुओ । सेसा मे बाहिराभावा, सव्वे संजोगलक्खणा ॥ १६० ॥
मेरी आत्मा एक है, शाश्वत है, ज्ञान दर्शन युक्त है, शेष सर्व देहादि बाह्य पदार्थ बाह्य संयोग संबंध से उत्पन्न है ।
इक्को हं नत्थि मे कोइ, नत्थि वा कस्सइ अहं ।
न तं विक्खामि जस्साहं, न सो भावो य जो महं ॥ १६१ ॥
मैं एक हूँ, मेरा कोई नहीं है, मैं किसीका नहीं हूँ, जिसका हूँ उसे देख नहीं सकता और ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो मेरा हो ।
देवत्तमाणुसत्तं तिरिक्खजोणीं तहेव नरयं च । पत्तो अनंतखुत्तो, पुव्वं अन्नाणदोसेणं ॥ १६२ ॥
पूर्व में अज्ञान दोष से अनंत बार देव, मनुष्य, तिर्यंच और नरक गति में भ्रमण कर चुका हूँ |
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पूर्वाचार्य रचित 'सिरिचंदावेज्झय पइण्णयं'