Book Title: Shrutavatar
Author(s): Indranandi Acharya, Vijaykumar Shastri
Publisher: Bharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad

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Page 62
________________ -----. विलिखन् द्वितीयसिद्धान्तस्य व्याख्या सधर्मणा स्येन। द्रव्यादिशुद्धिकरणप्रयत्नविरहात्प्रतिनिषिद्धम् ॥१७०॥ अन्ययार्थ- (द्वितीय सिद्धान्तस्य) दूसरे कषायपाहुड आगम सिद्धान्त की (व्याख्यां विलिवन्) व्याख्या लिखते हुए (स्वेन सधर्मणा) अपने सहधर्मी द्वारा (द्रव्यादिशुद्धिकरणप्रयत्नविरहात्) द्रव्यादिक की शुद्ध करने के प्रयत्न से रहित होने के कारण (प्रतिनिषिद्धम्) निषेध कर दिये गये। अर्थ- अनन्तर द्वितीय कषाय प्राभूत सिद्धान्त की टीका लिखने को उद्यत हुए समन्तभद्र स्वामी को उनके एक सहधर्मी ने द्रव्य शुद्धि आदि का विचार रखने के प्रयत्न रहित होने से निषेध कर दिया। एवं व्याख्यानक ममवाप्तवान् परमगुरुपरम्परया। आगच्छन् सिद्धान्तो द्विविधोऽप्यतिनिशितबुद्धिभ्याम् ॥१७१।। शुभरविनन्दिमुनिभ्यां भीमरथिकृष्णमेखयोः सरितोः । मध्यमविषये रमणीयोत्कलिफाग्रामसामीप्यम् ॥१७२ ॥ विख्यातमगणवल्लीग्रामेऽथ विशेषरूपेण । श्रुत्वा तयोश्च पाश्र्षे तमशेष बप्पदेवगुसः ॥१७३ ।। अपनीय महायन्धं षट्खणडाच्छे षपञ्चखण्डे तु । व्याख्याप्रज्ञप्तिं च षष्ठं खण्डं च तत् संक्षिप्य ॥१७४ ॥ षण्णां खण्डानामिति निष्पन्नानां तथा कषायाख्यप्राभृतकस्य च षष्ठिसहस्रग्रन्थप्रमाणयुताम् ।।१७५ ।। व्यलिखत्याकृतभाषारूपां सम्यक्पुरातनव्याख्याम् । अष्टसहसग्रन्थां व्याख्यां पञ्चाधिकां महाबन्धे ।।१७६ ।। अन्वयार्थ-(एवं) इस तरह (गुरुपरम्परया आगच्छन्) गुरु परम्परा से आता हुआ (व्याख्यानक्रमम् अवामवान्) व्याख्यान क्रम को प्राप्त हुआ (द्विविधोऽपि) दोनों प्रकार का (सिद्धान्तः) सिद्धान्त (अतिनिशितबुद्धिभ्याम्) अत्यन्त तक्ष्ण बुद्धिवाले (शुभरविनन्दिमुनिभ्याम्) शुभनन्दि एवं रविनन्दि नामक मुनियों द्वारा (भीमरथिकृष्णमेखयो सरितोः) भीमरथी तथा कृष्ण मेघ इन दोनों नदियों के (मध्यमविषये) मध्यवर्ती देश के मध्य में (रमणीयोत्कलिकाग्रामसामीप्यम्) सुन्दर श्रुतावतार ६०

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