________________
विचारशून्य हो जाएगा ।
पांचवा अंग - आत्मा या चैतन्य- केन्द्र की धारणा को दृढ़ कर उसके सानिध्य का अनुभव कीजिये । वह सहज, शान्त और निर्विचार हो जाएगा ।
इस प्रकार अनेक पद्धतियां हैं, जिनके द्वारा निर्विचार ध्यान को सुलभ बनाया जा सकता है, किंतु उन सब में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पद्धति है अप्रयत्न प्रयत्न का विसर्जन, प्रवृत्ति का विसर्जन ।
ध्यान के तीन प्रकार और हैं— कायिक ध्यान, वाचिक ध्यान और मानसिक
ध्यान ।
परिशिष्ट - १ : ४३३
कायिक ध्यान
शरीर का प्रकम्पन पूर्णतः कभी नहीं रुकता। उसकी ऊर्मियों का प्रवाह निरन्तर चलता रहता है। जब हम स्थिर होकर बैठते हैं तब भी चलता रहता है । फिर शरीर का अप्रकम्पन कैसे हो सकता है ? यहां अप्रकम्पन का प्रयोग सापेक्ष है । यद्यपि शरीर के प्रकम्पन पूर्णतः नहीं रुकते, फिर भी हाथ, पैर आदि tarai की चेष्टाएं नहीं होतीं, शरीर बाह्याकार में स्थिर हो जाता है तब अप्रकम्पन वा एक बिन्दु बनता है । यही कायिक ध्यान है । यह अप्रकम्पन का सामान्य विन्दु है । इसमें मात्रा भेद होता है। एक व्यक्ति प्रथम अभ्यास में अपने शरीर के प्रकम्पनों को रोकता है, वह सामान्य स्थिरता होती है । अभ्यास करतेकरते वह अप्रकम्पन की सुदृढ़ स्थिति तक पहुंच जाता है। मात्रा भेद के आधार पर कायिक- ध्यान की अनेक श्रेणियां बन जाती हैं ।
1
आनापान-ध्यान
श्वास का प्रकम्पन भी पूर्णतः नहीं रुकता । अन्तर में प्राण का प्रवाह चालू रहता है । हमारे शरीर के रोमकूप सूक्ष्म आनापान को ग्रहण करते रहते हैं । उसे मंद किया जा सकता है, रोका जा सकता है। आनापान ध्यान का प्रथम बिन्दु श्वास को मन्द करने का अभ्यास है । स्वस्थ मनुष्य का श्वास जिस गति से चलता है उसमें मन्दता लाना उसके प्रकम्पनों को कम करना, इस दिशा में पहला प्रयत्न है । इस प्रयत्न में दो बातें मुख्य हैं :
( १ ) श्वास की संख्या को कम करना । (२) प्राणवायु की मात्रा को कम करना ।
मृदु-मन्दता में श्वास दीर्घ हो जाता है । मध्य-मन्दता में प्राणवायु की मात्रा कम हो जाती है । अतिमन्दता में महाप्राण की स्थिति घटित होने लग जाती है । श्वास-निरोध या कुम्भक सहज ही हो जाता है ।
वाचिक ध्यान -- जैसे शरीर और श्वास की ऊर्मियां निरन्तर प्रवाहित रहती
Jain Education International
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org