Book Title: Navtattva Chopai
Author(s): Diptipragnashreeji
Publisher: ZZ_Anusandhan
View full book text
________________
५४
अनुसन्धान-५७
मन वच काय गुपति त्रिणि कही आठई प्रवचनमाता सही । बावीस परीसह इहां ऊपजइ ते खमतां संवर नीपजइं ॥६॥ भूख खमई सदोष न लीइं आहार तरस्यो सच्चित ज[ल] करइं परिहार शीत सहई नवि तापइं अगनि उहनालिं अंघोलि न पवन ॥७॥ डांस मसा करडई ते खमइ च्छठई मइलां वस्त्र मुनि गमई कुठाम अरति परीसह सहई स्त्रीरूप देखी नवि गहगहइं ॥८॥ चरीया परीसह न रहइं एक गामि नवकल्पी ४६विचरइं ठामि ठामि निसीहा परीसह काउसगि जिहां सादिक भय न करइ तिहां ॥९॥ सिय्या परीसह अग्यारमो पोसाल पाटि पाडूई खमो अक्रोश परीसह लोक अजाण विरूउं बोलई खमई सुजाण ॥१०॥ अज्ञानी को हणइं प्रहार खमतां वध परीसह धारि मोटां कुल मई हरां छइं आज याचना मागतां नाणइं लाज ॥११॥ हुं न लहुं शुद्ध बीजो लहइं अलाभ परीसह खेद नवि ४७वहइं सोलमो रोग परीसो (स)ह खमइं सावद्य ऊषध आरति वमइं ॥१२॥ कंटक तृणां परीसह कहई उन्हालई मल दीलई सहइं सत्कार परीसह सबल अगाह स्तुति करतां न करइं उत्साह ॥१३॥ प्रज्ञा परिसह वीसमो जेह ज्ञान भण्यो नवि फूलई तेह अज्ञान परीसह कर्मइं लह्यो नावडई ज्ञानहृदय नवि दह्यो ॥१४॥ देवगुरुधर्म उपरि निसंदेह समकित परिसह कहीइं तेह ए बावीस परीषह खमइं साधू सदा संवरमां रमई ॥१५॥ हवइं दसविध यतिधर्म पालवो खंति खिमा करी क्रोध टालवो आर्जव सरलपणइं ते जाणि मार्दव मानरहित हितवाणि ॥१६॥ मुत्ति मुंक्या सुखना लोभ बारभेद तप करई अलोभ८ संयम यतिधर्म सतरइं भेद सत्यवचन बोलइं ते वेद ॥१७॥ शौच अदत्त न ल्यइं एक रती अकिंचन द्रव्य न राखई यती ब्रह्मचर्य पालई नव वाडि ए दशकर्म (धर्म) हणइं कर्म धाडि ॥१८॥ बार भावना संवर सही पहिली अनीत्यभावना कही धन यौवन ठकुराईतणी माया म करो अस्थिर भणी ॥१९॥

Page Navigation
1 ... 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24