Book Title: Jain Katha Sangraha Part 03
Author(s): Kalyanbodhivijay, 
Publisher: Jinshasan Aradhana Trust

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Page 11
________________ श्रीजैन ॥ अहम् ।। ॥श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथाय नमः। श्री प्रेम-भुवनभानु-पद्म-हेमचंद्र सगुरुभ्यो नमः : एकादशीपर्वमाहात्म्ये कथासंग्रहः सुव्रतऋषि कथानकम्। ॥१॥ सुव्रतऋषिकथानकम्। DO DO DA DA DA DA DA DA DA DA DA DA DDDDDDDDD/DODODDDDDDDDDDDO ApVOOPOPOPOPOPOPOPOPOpapa/ GOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOOON सिरि वीरं नमिउणं, पुच्छइ सिरि गोयमो समासेणं। भयवं! कन्हेसु ? इन्हि, इगारसीमूणकरणं' मे॥१॥वीरो पभणइ गोयम! निसुणइसु इगारसीयमाहप्पं । सिरि नेमिणा कन्हस्सवि, जह कहियं तह निसामेह ॥२॥ बारवइनयरीए, समोसढे नेमिजिणवरे पवरं । कन्हो अ सपरिवारो, वंदणयत्थं गओ तत्थ ॥३॥ सुणिउण देसणं तह, पुच्छड़ कन्हो य जिणवर नेमिं । पव्वाणि सामि ! कित्तिय हवंति पक्खंमि मासंमि॥४॥ १ एकादशीमौनकरणं. . ॥१॥

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