Book Title: Jain Katha Sangraha Part 03
Author(s): Kalyanbodhivijay,
Publisher: Jinshasan Aradhana Trust
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श्रीजैन कथासंग्रहः
सुव्रतऋषि
कथानकम्।
॥९॥
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सुकयत्थं बोहिलाभो य । केवलनाणलंभो, परभवि लहणे न संदेहो ॥ ८१॥ विहिपुव्वं चिय विहियं, धम्माणुठाणमुझवणसहियं । नियसत्तिकयं जम्हा, बहुफललाभाय होइत्ति ॥ ८२ ॥ सुव्वयसिडेण तओ, नियमज्जासहिय सपरिवारो य । मूणेण इगारसितवं, वरिसेणं एगमासे(सो)णं ॥ ८३ ॥ ११रुद्दसंखेणमासेणं, इकारसि तवं कयं पयत्तेणं ॥ पारणपारणगंमि य, नाणपूआ कया रम्मा ॥ ८४॥ पत्तेय तवो कम्मे, उजवइ नियरिद्धिवित्थारं । इकारसंगलेहिय,, तच्चत्त समग्गयं ढोइ ॥ ८५ ॥ साहम्मियवच्छल्लं, संघं पूएइ भत्तिसंजुत्तो। पुणरवि गुरुण पुच्छइ, पुणरवि इकारसीकरणे ॥ ८६ ॥ गुरुणा भणियं निसुणसु, मग्गसिरे सेयगारिसी वरिसे। एग्गा पुण कायव्वा, कम्मघायलाभाय ।। ८७॥ पन्नासं कल्लाणा, हवंति इकारसीदिणे तम्हा एयंमि दिणे तेणं, मग्गसिरेगारसी पवरा ।। ८८ ॥ आरंभह भवियनरा, मग्गसिरेगारसी महापवरा । मणवयकायविराहण, मुंच जिणवयणधम्मधरा ॥ ८९॥ मूणं चिय विहियव्वं, भणणगुणणाइ मुत्तुपवरनरी सव्वं विहिणाइयं, सफलं चिय हवइ सयलंपि॥९०॥तो सुव्वएण भणियं, सकुटुंबेणं विसुद्धभत्तीए । गहियंगारसि चरणे, मूणं सुकुडुंबमाइणं ॥ ९१ ॥ तइया बहुअजणेहि, गहिया इकारसी गुरुसमीवे। नियनियगिहमि पत्ता, सव्वे लोआ स जम्मो या॥ ९२ ॥ मग्गसिरे सेयगारसि दिणंमि, पोसहं कुणंति सव्वेवि । मूणेणं चिय भविया, जम्मफलं सय गिण्हंति
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॥९॥

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