Book Title: Jain Hitopadesh Part 2 and 3
Author(s): Karpurvijay
Publisher: Jain Shreyaskar Mandal Mahesana

View full book text
Previous | Next

Page 11
________________ मंगलाचरणरूप. श्री सीमंधर' जिन स्तुति, प्रभु नाथ तुं तिलोकनो', प्रत्यक्ष त्रिभुवन भाण; सर्वज्ञ सर्वदशीं तुमे, तुमे शुद्ध सुखनी खाण जिनजी विनती छे एह. १ जि० २ जि० ३ जि० ४ जि० ५ जि० ६ जि०७ १ महाविदेह क्षेत्रमां विचरता जिनवर २ त्रण लोकनो. ३ सर्व वस्तुने सर्वथा साक्षात देखवावाळा. ४ प्रभात समये ५ नैगमादिक सात नयो. ६ सुंदर मंगलकारी. ७ अकृतार्थ- निष्फळ. ८ गयेलो काल. -- प्रभु जीव जीवन भव्यना, प्रभु मुझ जीवन प्राण; ताहरे दर्शने सुख लहुं, तुंहि जगत स्थिति जाण, तुज विना हुं बहु भव भम्यो, धर्या देश अनेक निज भावने परभावनो, जाण्यो नही सुविवेक, धन्य तेह जे नित्य प्रहसमे", देखे जे जिन मुख चंद; तुज वाणी अमृत रस लही, पामे ते परमानंद. एक वचनं श्री जिनराजनो, नयगम' भंग प्रमाण; जे मुणे रुचिथी ते लहे, निज तत्त्व सिद्धि अमान. जे क्षेत्र विचरो नाथजी, ते क्षेत्र अति सुपसथ्य; तुजं विरह जे क्षण जाय छे, ते मानीयें अकयथ्थ.. श्री वीतराग दर्शन विना, वीत्यो जे काल अतीत, ते अफळ मिच्छा दुक्कडं, तिविहं तिविहनी रीत.

Loading...

Page Navigation
1 ... 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 ... 425