Book Title: Dev Vandana Stuti Stavan Sangrah
Author(s): Buddhisagar
Publisher: Adhyatma Gyan Prasarak Mandal

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Page 166
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir तार २ तार०३ (१४१) भोगी पण जोगना फंदथी वेगळो, योगी पण योगथी तुं निराळो; जाणतो अपरने अपरथी जिन्न तुं, विगतमाही प्रभु ! शिव म्हालो. द्रव्य क्षेत्र छने काल ने नावथो, आत्मद्रव्ये प्रभु ! तुं सुहायो; स्वगुणनो अस्तिता, नास्तिता परतणी, शुद्धकारकमयो व्यक्ति पायो. शुद्ध परब्रह्मनी पूर्णता पामोने, विष्णु जगमां प्रनु ! तुं गवायो; कर्मदोषो हरी हर प्रभु ! तुं थयो, सत्य महादेव तुंछे सवायो. शुद्धरुपे रमी राम तुं जग थयो, शुद्ध आनन्दतानो विलाली; रहेम करतां थयो शुद्ध रहेमान तुं, शुद्ध चैतन्यता धर्भकाशी. नाम ने रुपया भिन्न तुं छे प्रभु ! जाणतो तत्व स्याहादज्ञानी; तार. ४ तार० ५ For Private And Personal Use Only

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