Book Title: Dandak Prakaranam Author(s): Gajasarmuni, Vijayodaysuri Publisher: Granth Prakashak Sabha View full book textPage 8
________________ घन्य भांगे के उत्कृष्ट भांगे होय ?. ३७-फया देवलोक सुधी इन्द्रा. दि व्यवस्था होय ?. ३८-सर्वज्ञोने संज्ञान होय तेनु शुं कारण ? ३९-अन्यदर्शनकारी भवान्तर विषयक गत्यागति इश्वरेच्छा अने तेनी प्रेरणाथी माने छे त्यारे जैनो कर्मद्वारा माने छे. तेनु शुं समा. धान ?. ४०-देवोने श्रीभगवतीसूत्र अने श्रीविचारसप्ततिमा ५ पर्याप्तिओ अने श्री नवतच भाष्यादिमां ६ पर्याप्तियो कीधी तेनु शुं कारण ?. ४१-अनुत्तरविमानवासि देवोने शब्दोच्चारना अभावे वचनयोग केम घटे ? जो ते न होय तो भाषापर्याप्ति केवीरीते घटे ?. इत्यादि ॥ जो तेओना ते व्याजबी तोंर्नु पण समधान दीर्घकाल सुधी न थाय तो ए पण तों चिरस्थायि थतां तेओनुं सम्यग्दर्शन पोतानी पूर्वस्थिति साची शकशे नहि. ? कारणके जिज्ञासाजन्य तर्क पण कालान्तरे एवा संशयरूपे परिणमे छे, के- जे तर्क-श्रद्धाने पण अंशे अंशे घटाडनार नीवडे छे. आभाव- वर्तमानजमानाना अनेक दृष्टान्तोद्वारा अनुभवगोचर थइ शके तेम छे. तेमज पदार्थ तस्वोनो संगीन बोध पण प्रकट ययेल ताना समाधाननेज आधीन छे, जेथो तार्किक भव्यसमाजने सानन्द समाधान मलवा पूर्वक संगीनबोध संपादन कराववो, ए पण आ प्रस्तुत प्रकरणर्नु बीजु मुद्रण प्रयोजन छे. हवे-१-प्रस्तुन प्रकरणने वीजा कोइपण शब्दथी न ओळखावतां दंडक शब्दथी ओळखाववानुY कारण ?, २. कर्ताए आ प्रकरणने स्तुतिग्रन्थनी माफक स्वतंत्र पद्धतिए रच्यु के के सिद्धान्तपतिए ? जो सिद्धान्तपदतिए तो कया कया सिद्धान्तोने अवलंबीने रच्यु ? ३ ते ते सिद्धान्तोमा दंडकोर्नु स विस्तरवर्णन छतां पण पृथक् रचनानुं शुं प्रयोजन ? आ प्रश्नोनुं समाधान करवू व्याजबी छे-ते संक्षेपमा आ प्रमाणेPage Navigation
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