Book Title: Dandak Prakaranam
Author(s): Gajasarmuni, Vijayodaysuri
Publisher: Granth Prakashak Sabha
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स्वरूपने हुँ पोतेज प्रतिपादन करुं छ परन्तु एज प्रतिपादन कर्युछे के जेम अतीत अनंता तीथकगेए जे पदार्थभाव जेवारूपे प्ररूप्यो अने भावि अनन्ता तीर्थंकरो जे पदार्थभावने जेवारूपे प्ररूपशे, तेनेज अनुसरीने हु आ विवक्षितपरमाणु आदि पदार्थना स्वरूपने निरुपण. करूंछ. अने तेज हेतुथी अविच्छिन्न प्रमावशालि-त्रिकालाबाधित भवोभव चाहना करवालायक-जैनेन्द्रशासननी लो. कोत्तरता सिद्ध थायछे. जेमां त्रिकालभावि सर्वधर्मोपदेशकोमा प्र. रूपणा भेद होइ शकेज नहि. एज प्रणालिकाना विरहथी अन्यद. र्शनकारोने निरुपाये कहेवू पडयु के
__ श्रुतिविभिन्ना स्मृतयो विभिन्ना, नैको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणं । (मतं न भिन्नमित्यप्यन्यत्र)
धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां, महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥१॥
कालान्तरे सूत्रार्थविषयक विस्मृति आदि हेतुओना संनिधानथी वाचनाभेद थयो.आ भाव ढुंकामां श्रीजंबुद्धीप प्रज्ञप्ति टीकामां वर्णवेल छे. तेमज परोपकारधुरीण आचार्य श्रीमलयगिरि महाराजाए पण श्री ज्योतिष्करण्डक नामना प्रकीर्णकनी वृत्तिमा कांछे के-जैनेन्द्रशासनभावि श्री स्कन्दिलाचार्यना समयमां पांचमा दुःषम आराना प्रतापे दुर्भिक्षकाल प्रवयों. जेथी साधुओ. मां सिद्धान्तवाचनादि प्रवृत्ति मंद थवा लागी. दुष्काल वीत्या बाद सुभिक्षकाल समये १-चलभीपुर [ वळा ) २-मथुरा एम बे स्थले संघ भेगो थयो, जेमां सूत्रार्थनी संयोजनाना समये अतीतदुष्कालना प्रतापे सूत्रार्थनी विस्मृति थएली होवाथी-वाचना. भेद थयो. ते अवसरे संसारमा अनन्तकाल सुधी भ्रमणकरावनारी प्रवचनाशातनाथी भय पामनार-कदाग्रहरहिन-तथा अव.

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