Book Title: Dandak Prakaranam
Author(s): Gajasarmuni, Vijayodaysuri
Publisher: Granth Prakashak Sabha

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Page 15
________________ १४ दंडकस्थानो दूर करी, दश भावनाना ध्यानरूप पवनना झरा. साथी अष्टकमरूप वादळाने हठात्री-पोनाना अव्यावाध निरुपाधि शाश्वत सचिदानन्द सूर्यने प्रकट करो-अने ते द्वारा लोकालोकना भाव जाणी-स्वपरोपकार करवापूर्वक मुक्तिपद पामे. एम हार्दिक निवेदन करी, हवे हुँ आ टंक प्रस्तावनाने संक्षेपी लइश. कारणके श्रीवीतरागविंबर्नु संक्षिप्त वर्णन पण प्रभुदेवपा रहेला लोकोत्तर गुणोनु भान कराववाद्वारा भेदज्ञानिमीवने तत्स्वरूपे लीन थवा. मां निबंधनभूत थायज छे. तथा छमस्थ जीवोने आवारक कर्मोना प्रतापे अनाभोगजन्यस्खलनायो दुनिवार्यछे यतः अवश्यं भाविनो दोषाः, छद्मस्थत्वानुभावतः ॥ समाधि तन्वते सन्तः, किनराश्चात्र वक्रगाः ॥ १॥ तेथी आ ग्रंथमां गुणयाही-विज्ञवाचक वर्गने दृष्टिदोषजन्प या मुदणजन्य. जे कोइ योग्य भूलचूक जणाय, तेने महाशयो सुधारीने वांचशे. अने कृपा करी जणाववा तस्दो लेशे, तो बीजी आवृतिमा सुधारो पण थइ शकरो. इत्यलंगवस्तरेण भूयाद्र श्री श्रयणसंघस्य. निवेदक श्री गुरु नेमिसूरीश्वरचरणकिंकर & मुनि पद्मविजयः। + Ro

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