Book Title: Dandak Prakaranam
Author(s): Gajasarmuni, Vijayodaysuri
Publisher: Granth Prakashak Sabha
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धम बनावेल
विस्तारया मल प्रकरण तातिछिन जिनाजसा
धर्मद्वार-जेमां दरेक दंडकपत्ये विरतिधमनी विचारणा दर्शावेल छे. ४ जीवयोनिद्वार-जेमां दरेक दंडकना जीवने केटली केटली योनियो होय ए भाव जणावेल छे. ५ कुलद्वार-जेमां दरेक दंडकना जीवने केटली केटली कुलकोटीयो होय, ए अर्थ प्रतिपादन करेल छे. एम पांच द्वारो वधारे जणावेल छे.
२. बीस्तवन- श्रीविजयहर्षवाचकना शिष्य श्री धर्मचन्द्रमुनिए जेसलमेरमा १७२९ नी सालमां दीलीपर्वना दिवसे बनावेल छे. जेपी श्री पार्श्वनाथभगवाननी स्तुति करवा द्वारा गत्यागतिना बे डारो विस्तारथी वर्णवेल छे.
३-तृतीय विभागमा - मूल प्रकरण तथा ते उपर स्वोपज्ञ अवचणि छे, प्रकरणकार जिनसमुद्रसूरिना पट्टपतिष्ठित जिनहंसमु. नीश्वरना राज्यमा वर्तमान-श्रीधवलचन्द्रगणिना शिष्य गजसारगणि छे. तेमणे आ जिनविज्ञप्तिरूप दंडक प्रकरण जे तेमनाथी पूर्व समयमां पत्र उपर यन्त्ररूपे लखेल हतुं. ते सुगमताने माटे एटले बालजीवो अल्पशब्दोमां अर्थलाभ लइ शके, ए हेतुथी पाटणमा विक्रम संवत् १५७९ नी सालमां सूत्ररूपे गुंथ्यु. तेमणे अवचूर्णिमां मूल सूत्रनो आशय संक्षेपमा सारी रीते समजावेल के जेपांना केटलाएक कंठस्थ करणीय ज्ञेयमुहाओ ए के जे१ स्वकीय क्षायोपशमिक ज्ञानद्वारा रागादिभाव शत्रुओने हठाववामां यथाशक्ति प्रवृत्तिपरायण सम्यग्दृष्टि जीवने दृष्टिवादोपदेशकी सज्ञा होय. .
२ लन्धिद्वारा उत्तरवैक्रियकारक जीव ते शरीरमा अन्तर्मुहूर्त कालयी वधु अवस्थान न करी शके. कारण तेटलो काल बीत्या बाद ते जीव औदारिक शरीरमा स्वस्थ बनेछे.
३.कार्मग्रन्थिक मते देवोने तथा नारकोने संहनननो प्रतिषेध तथा सैद्धान्तिकमते तेनो सद्भाव होयछे.

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