Book Title: Chitramay Tattvagyan
Author(s): Gunratnasuri
Publisher: Jingun Aradhak Trust
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(२)
मिली हुई वस्तु बनी रहे, इष्ट वस्तु पृथक् न हो जाये इत्यादि का चिन्तन करना इष्ट संयोग आर्तध्यान कहलाता है । जैसे सुकोशल की माता सहदेवी । अनिष्ट वियोग :- अनिष्ट वस्तु का वियोग कैसे हो या अनिष्ट आये नहीं, इत्यादि का चिंतन करना । जैसे अग्निशिखा सर्प बनी। वेदना आर्तध्यान :- व्याधि, दुःख आदि के नाश के उपाय का चिंतन व हाय हाय करना । जैसे मरुभूति ने कमठ के द्वारा शिला गिराते समय किया था, तो वह हाथी बना । निदान आर्तध्यान :- धर्म की आराधना के बदले में भौतिक सुख की प्राप्ति का चिंतन करना । भगवान महावीर स्वामी के जीव विश्व = भूति ने १६ वें भव में शारीरिक बल का निदान किया था । इसलिए १९ वें भव में ७ वी नरक में गये थे ।
(२) रौद्र ध्यान के४ भेद
(१) हिंसा-बधि रौद्रध्यान :- हिंसा का तीव्र चिन्तन करना । जैसे
ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती । (२) मृषावादानुबंधि रौद्रध्यान :- झूठ का तीव्र चिंतन करने से यह
ध्यान होता है । जैसे वसुराजा । स्तेयानुबन्धि रौद्रध्यान :- चोरी का तीव्र चिन्तन करने से यह
रौद्रध्यान होता है । जैसे कई चोर नरक में गये । (४) संरक्षणानुबंधि रौद्रध्यान :- धन आदि वस्तुओं के लिये क्रूर
चिन्तन करना । जैसे मम्मण शेठ ।
ध्यान का फल :-(१) रौद्रध्यान से नरकगति मिलती है । (२) आर्तध्यान से तिर्यंचगति मिलती है । (३) धर्मध्यान से मनुष्यगति
मिलती है । (४) शुक्ल ध्यान से देवगति व मोक्ष मिलता है । | चित्रमय तत्वज्ञान
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