Book Title: Apbhramsa Bharti 1993 03 04
Author(s): Kamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Chhotelal Sharma
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 27
________________ अपभ्रंश-भारती-3-4 यह देन अंतर्विरोधों की उपज है। आचार्य शुक्ल अंतर्विरोधों का मूल गुण विरुद्धों का सामंजस्य स्वीकार करते हैं। 'तराना-ए-हिन्दी' के गायक, अपने को 'हिन्दी' कहनेवाले और अपने वतन को 'हिन्दुस्तान' माननेवाले प्रसिद्ध शायर और मनीषी इकबाल कालक्रम में पाकिस्तान की योजना के आरंभिक प्रस्तावकों में हुए। यह इतिहास के अत्यंत रोचक और करुण अंतर्विरोधों में से एक है। इसके बावजूद भी न तो हिन्दी और न ही हिन्दुस्तान की हस्ती मिटी। निश्चय ही यह महत्वपूर्ण और विचारणीय पहलू है। और यह पहलू ही हिन्दू मानसिकता की वह शक्ति है जो अनेक अंतर्विरोधों को अपने में समाए है। मेरी अपनी दृष्टि से हिन्दू मानसिकता ने यह शक्ति इसलिए अर्जित की कि वह किसी धर्म ग्रंथ विशेष और व्यक्तित्व विशेष पर अनिवार्यतः आस्था रखने का आदेश नहीं देता। भारत, उस भारत में जिसमें हिन्दू रहते हैं कभी वैदिक धर्म का बोलबाला था और कभी बौद्ध का, कभी जैन का, कभी योगियों और सिद्धों की आस्था-परम्परा ने जन्म लिया। और आगे चलकर मुसलमान धर्म के आघातों से वह पीड़ित हुआ पर इन सबके चपेटे में पड़कर भी वह चरित्र विशेष के प्रति आस्थावान नहीं हुआ और सबसे बड़ी विशेषता उसकी यह कि वह इन झंझावातों को सहकर उनमें से अच्छाई को ग्रहणकर अपने स्वरूप को बनाए रखने में सफल रहा। इसका कारण यह भी हो सकता है कि यहाँ धर्म संस्थागत नहीं बना वरन् वह एक आंतरिक जिजीविषा का रूप हो गया, वह एक ऐसी हस्ती बना है, निरंतर बनता रहा है जो यूनान, मिश्र और रोम के मिटने पर भी बराबर बना रहता है। इस धर्म व्यवस्था के पीछे सूक्ष्म अद्वैत दर्शन की भावना और जड़ी-भूत जाति-व्यवस्था का सहअस्तित्व कारगर है, हिन्दू मानस के अंतर्विरोधों के मूल में यही दो छोर खाद-पानी का कार्य कर रहे हैं। सम्पूर्ण यथार्थ एक ब्रह्म सत्ता की ही विविध रूपा अभिव्यक्ति है, यह विशिष्टता अन्यत्र अनुपलब्ध है। और जाति प्रथा का स्थूल रूप जन्म पर आधारित जाति के मूल अर्थ में हो ऐसा कहीं नहीं मिलेगा। जातियों का जाल और वर्गीकरण इतना पूर्ण और व्यवस्थित है कि छंदशास्त्र का प्रस्तार याद आ जाता है। हिन्दू समाज में नीचे से नीचे समझी जानेवाली जाति भी अपने से नीची और एक जाति ढूँढ़ लेती है। यह व्यंग्य नहीं व्यावहारिक सच है।' एकत्व का रूप परम अद्वैत में और विविधता की बहार जाति प्रथा में, ये दोनों छोर हिन्दू व्यवस्था में बड़े इतमिनान के साथ समाए हुए हैं। अपने चिंतन में ही नहीं अपनी रचना प्रक्रिया में भी हिन्दू मानस इसी प्रकार के छोरों को दर्शाता है। रामायण और महाभारत अपनी परिकल्पना में एक दूसरे के विरोधी हैं। एक आदर्श की चरम गाथा है तो दूसरा यथार्थ का नग्न रूप। दोनों का ढाँचा भाइयों के संबंध पर आधारित है और इन रचनाओं में हिन्दू मानस के चरम अंतर्विरोधों का रूप धर्म, दर्शन और जातीयता का पूरा विस्तार समा गया है। हिन्दू मानस के अनुसार धर्म वह है जो इन अंतर्विरोधों को धारण करने की सामर्थ्य रखता हो। वह उल्लेख तब है जब उससे जीवन के अंतर्विरोधों को धारण करने की अपेक्षा रखी जाए। अपनी इसी सामर्थ्य के कारण हिन्दू मानस ने अनेक धर्मों के आक्रमण-प्रत्याक्रमण सहे । चाहे बौद्ध हो या जैन या इस्लाम हो अथवा ईसाई, वह सभी को अपने में आत्मसात करता रहा। उसकी अच्छाइयों को ग्रहण कर अपना रूप युगानुकूल परिवर्तित करता रहा। फलस्वरूप इन विरोधों और उनकी समरसता के बीच से इस

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