Book Title: Apbhramsa Bharti 1993 03 04
Author(s): Kamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Chhotelal Sharma
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 81
________________ अपभ्रंश-भारती-3-4 गामिल्लउ सागडिउ अतिथ कोइ कहिं गामेल्लउ गहवइ परिवसइ। सो अण्णया धण्णभरिउ सगडु लेविणु पंजरगउ तित्तरी सगडि बंधेवि नयरु पट्ठिउ।सोनयरगउ य गंधियपुत्तहिं देक्खिउ।सो तर्हि पुच्छिउ - किं एहु तुज्झ पंजरए ? तेण लविउ - तित्तिरु ति। तइयहुं तहिं लविउ - किं इमु सगडतित्तिरी विक्किजइ ? तेण लविउ - आमं, विक्किज्जइ। तहिं भणिउ - किं लब्भइ ? सागडिएण भणिउ - काहावणेणं। तइयहुं तहिं काहावणु दिण्णु, सगडु-तित्तिरु च गहेवं पवत्ता। तइयहुं तेण सागडिएणं भण्णइ-कीस एह सगडु नेहि ? तहिं भणिउ - मोल्लेणं लइय। तइयतुं ताहं ववहारु जाउ। सो सागडिउ जिउ। सो सगडु तित्तिरीएं सह हिउ। जस सगङ-उवगरणु हिय सो सगडिउ जोग-खेम निमित्तु आणिउ बइल्लु गहेवि विक्कोसमाणु गउ। अण्णे कुलपुत्तें देक्खिअ, पुच्छिउ य - कीस विक्कोससि ? तेण लविउ - सामि ! एम संधिउ हउं। तइयतुं तेण साणुकंपें भणिउ - ताहं चेव गेहु वच्च, 'एम च भणहि' त्ति।

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