Book Title: Apbhramsa Bharti 1993 03 04
Author(s): Kamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Chhotelal Sharma
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 30
________________ अपभ्रंश-भारती-3-4 21 रचनाकार का यह दायित्व होता है कि वह लोकभाषा का संधान करे। उपर्युक्त परिस्थितियों, सामाजिक और राजनैतिक स्थितियों में, जब काव्यवस्तु जन-साधारण की ओर उन्मुख थी, तब जनसाधारण की भाषा के संधान की अपेक्षा थी। स्वयंभू और पुष्पदंत अपनी भाषा को देशी भाषा घोषित करते हैं। विद्याधर लोकभाषा के पंडित हैं और दामोदर पंडित लोकभाषा से परिचय कराने के लिए उक्ति व्यक्ति प्रकरण की रचना करते हैं। इन रचनाकारों के साथ विद्यापति के उद्घोष को भी रखकर परखा जाय तो देशी और लोकभाषा का स्वरूप स्पष्ट हो जाएगा। हिन्दी का संधान यहीं इसी संदर्भ में हुआ। उस हिन्दी का जो जनसाधारण की कथा की अभिव्यक्ति का सामर्थ्य रखती थी, उस हिन्दी को आप चाहें तो अपभ्रंश में भी देख सकते हैं। वैसे राहुलजी तो अपभ्रंश को हिन्दी से भी कहीं अधिक हिन्दी भाषा मानते हैं और द्विवेदीजी अपभ्रंश साहित्य को हिन्दी का मूलरूप और प्राणधारा स्वीकार करते हैं। चाहे तो अवहट्ट को उसका पुराना रूप मान सकते हैं और न माने तो कबीर से उसे स्वीकार करना ही पड़ेगा। पर सरहपा, कण्हपा, मुंज, हेमचन्द्र और अब्दुल रहमान के निम्नलिखित अंश क्या हिन्दी की डुगडुगी नहीं पीट रहे हैं - जहि मण पवण न संचरइ। रवि शशि नाह पवेस। तहि वढ़ चित्त विसाम करु सरहें कहिअ उएस। - सरहपा (769 ई.) जिमि लोण विलिज्जइ पाणिऍहि तिमि घरणी लइ चित्त समरस जाई तक्खणे जइ पुणु ते सम णित्त। - कण्हपा (820 ई.) बांह विछोड़वि जाहि तुहुँ हउँ तेवइँ को दोसु। हिअयट्ठिउ जइ णीसरइ, जाणउँ मुंज सरोसु॥ x इस गज का सामना का कि कार का जा मति पच्छइ सम्पजइ, सा मति पहिली होइ। मुंज भणइ मुणालवइ, विघन न वेढइ कोइ॥ - मुंज भल्ला हुआ जो मारिआ, वहिणि म्हारा कंतु। लज्जेज्जन्तु वयं सियहु, जइ भग्गु घरु एंतु॥ -हेमचन्द्र ( 12वीं शती) संदेसडउ सवित्थरउ पर मइ कहण ण जाइ। जो काणंगुलि मूंदडउ, सो वाहडी समाइ॥ - अब्दुल रहमान (तेरहवीं शती का उत्तरार्ध)

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