Book Title: Anusandhan 2011 09 SrNo 56
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 140
________________ १३४ अनुसन्धान-५६ श्रीभिलडीआ-पार्श्वजिन-स्तवनम् ॥ ६॥ श्रीसद्गुरुभ्यो नमः ॥ सरसति सामिन विनवू रे, समरी शारद पाय, अश्वसेन कुल चंदो रे, देवी अ देवी वामा जस माय, ___ मनमोहन सामी समरीअ रे. ॥१॥ प्राणतथी प्रभू उपना रे, वामादेवी अंग, सुपनसूचित जिन जनमिआ रे, तनय तनय हु[उ] उछरंग. म०॥२॥ इखावंशइ अवतर्या रे, जिम जगिउ भाण, मात मनोरथ पूरतो रे, कुअर कुअर अतिसुजाण. म०॥३॥ दिन दिन तेजिं दीपइ तो, रूपकला अभिराम, योवनवन(य) परणावीओ रे, कुअरि कुअरि प्रभावति ता(ना)म.म०॥४॥ तेसुं विषि सुख भोगवइ रे, पासकुमर जिनराज, मनह मनरथ पूरतो रे, सारिखि सारि समरो काज. म०॥५॥ एकदिन जिनवर आवंता रे, दीठो नाग बलंत, पंचागनि साधि सदा रे, मानवी मानवी मलिआ बहुत. म०॥६॥ कमठ हठ तव भाजिवा रे, जिनवर आव्यां ताम, तापस तपसा सी करी रे, जीव ज जीव बलि इंणि ठाम. म०॥७॥ कमठ कहइ सुणि राजवी रे, नवि जाणउ धरम मरम, कुअर करि कुहडो लेइ [रे], कापिउं कापिउं बोहड जाम. म०॥८॥ अध बलतो नाग काढिओ रे, कानि दीउं अभिमन्त्र, मंत्र प्रभावि ते थयउ रे, देव ज देव हुओ धरणेन्द्र. म०॥९॥ कुअर प्रसंसा सहु करि रे, कमठ गलिउं तव मान, कुअर घरि आवी करी रे, आली छइ आलि वरसी दान. म०॥१०॥ निज अवसर जाणी करी रे, चारीत लि जिन चंग, तप तपि अति आकरो रे, ध्यानिं ते ध्यानि रहिआ रंग. म०॥११॥ तापस तिहां थकी चवी रे, मेघमाली थयउ देव, क्रोध धरी मन चिंतवइ रे, विर ज विर वालू मुझ हेव. म०॥१२॥

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