Book Title: Anusandhan 2011 09 SrNo 56
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 152
________________ १४६ अनुसन्धान-५६ छे; तेथी दर्शनमां ग्राह्य अर्थने सम्बन्धित आकार रचातो ज नथी, ते निराकार ज रहे छे. ओथी उलटुं, ज्ञान वस्तुने तेना पोतीका स्वरूपे ज पकडे छे तेथी ज्ञानमां ग्राह्य वस्तुनी जोडे एकाकारता आवे छे मारे ज्ञान साकार छे. अत्रे आकारनो अर्थ तद्रूपता छे.१ आम दर्शनमां विषयवैशिष्ट्य न होवाने लीधे पण ते 'निराकार' गणाय छे, अने वस्तु साथे तद्रूपता आवती न होवाथी पण ते 'निराकार' कहेवाय छे. दर्शन आ ज कारणथी प्रमाण अने अप्रमाण -उभयकोटिथी पर गणाय छे. कारण के दर्शने तो महासामान्यनुं ज ग्रहण करवानुं छे अने महासामान्य तो बधे सरखं ज होय छे; तेथी तेना ग्रहणमां साचा-खोटानो प्रश्न ज उपस्थित नथी थतो. परन्तु ज्ञाननी बाबतमां आq नथी. ज्ञाने विशेषोने ग्रहण करवाना छे अने गृहीत विशेषो साचा के खोटा होइ शके छे, तेथी ओ विशेषोनी सत्यता के असत्यताने लीधे ज्ञान पण प्रमाण के अप्रमाण गणाय छे. जो के सापने साप गणवो ते प्रमाण अने दोरडाने साप तरीके ओळखवो ते अप्रमाण -आवं विषयग्रहण पर निर्भर लौकिक प्रामाण्याप्रामाण्य अत्रे सम्भवी शके छे; पण वास्तवमा अत्रे जैनदर्शनने सम्मत पारमार्थिक प्रामाण्याप्रामाण्यने आपणे समजवानुं छे.२ छद्मस्थ जीवने थतो बोध अपूर्ण ज होय छे, कारण के तेनी दृष्टि बहु ज सीमित क्षेत्र अने कालमा प्रवर्ते छे, वळी बहु ज थोडां द्रव्यपर्याय तेना ज्ञाननो विषय बनी शके छे. सम्पूर्ण बोध तो केवलज्ञानी भगवन्तने ज थइ शके छे. तेओओ छाद्मस्थिकबोध शा माटे ? अने कई रीते ? अपूर्ण होय छे अने तेने सम्पूर्ण कई रीते बनावी शकाय तेनी स्पष्ट समज आपी ज छे. वळी, तत्त्व अने सत्य शुं होय ते पण बहु सूक्ष्मताथी जणाव्युं छे. आ सर्व पर श्रद्धा धरावनारी व्यक्ति जे समजणने आधारे पोताना अपूर्ण बोधने पण पूर्ण बनावी दे छे. अने अथी उलटुं श्रद्धाविहोणी व्यक्ति पोताना अपूर्ण बोधने पण पूर्ण मानी ले छे. आथी पारमार्थिक व्यवस्था अनुसार तत्त्वश्रद्धा १. "न विद्यते ग्राह्यार्थसम्बन्धी आकारो यत्राऽऽसौ अनाकारः" - जीवसमास-८३-टीका २. लौकिक अने पारमार्थिक प्रामाण्याप्रामाण्यना विशेष विवरण माटे जुओ- दर्शन और चिन्तन (-पं. सुखलालजी) पृ. ७५-७ ३. जेने केवलज्ञान नथी प्राप्त थयुं ते जीव 'छद्मस्थ' कहेवाय छे.

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