Book Title: Anusandhan 2011 09 SrNo 56
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 172
________________ अनुसन्धान-५६ औपचारिक दर्शनो वच्चेनो भेद बहु स्पष्ट रीते देखाडवामां आव्यो छे"औपचारिकनयश्च ज्ञानप्रकारमेव दर्शनमिच्छति, शुद्धनयः पुनरनाकारमेव सङ्गिरते दर्शनम्' (२.९) - औपचारिक नयथी ज्ञानना भेदो ज दर्शन छे, ज्यारे शुद्धनय अनाकार अवस्थाने ज दर्शन गणे छे. विषय अने इन्द्रियना जोडाणथी उद्भवती निराकार अवस्थाओना व्यंजनावग्रह अने दर्शन अवा भेद न पाडीओ, पण तमाम निराकार अवस्थाओने दर्शन ज गणीओ, तो 'छ ओ छ प्रत्यक्षमा विषय-इन्द्रिय सम्बन्ध स्थपाया पछी अने अवग्रहथी पूर्वे दर्शन होय छे' ओवी तार्किक प्ररूपणा (पृ. १५४) साथे पण प्रस्तुत व्यवस्था बराबर संगत थई जाय छे. अने मतिज्ञानना २८ भेद, ४ दर्शन, व्यंजनावग्रहनो अन्तिम समय मे ज अर्थावग्रह व. तमाम आगमिक प्ररूपणाओ पण प्रस्तुत व्यवस्थामां बन्धबेसती आवे छे. पहेलां प्रचलित ज्ञानदर्शननी व्यवस्था परत्वे वर्णवी तेमांनी कोई समस्या पण प्रस्तुत व्यवस्थामां आवती नथी ते खास ध्यानार्ह छे. प्रस्तुत समग्र चर्चानो निष्कर्ष अ ज छे के १. 'दर्शन सामान्यग्रहणात्मक होय छे' अनो मतलब ओ नथी के दर्शनमां वस्तुना सामान्य अंश, ज ग्रहण होय छे, पण ओ छे के दर्शनमां- साक्षात्कारमा अकसाथे घणी बधी वस्तुओ अने विशेषोनो सामान्यतः अकसरखो बोध थाय छे. मतलब के दर्शन शब्द 'जोवू, साक्षात्कार करवो' साथे संकळायेलो छे, 'सामान्यअंशना ग्रहण' साथे नहीं. दर्शननी ओळखाण आपता 'सामान्यग्रहण' शब्दना अन्यथा अर्थग्रहणथी दर्शन- स्वरूप बदलाइ जवा पाम्युं छे. २. चक्षुर्दर्शन अने अचक्षुर्दर्शन अनुक्रमे चाक्षुष अने मानस प्रत्यक्षमां व्यंजनावग्रहना स्थाने गोठवाय छे. ज्यारे अवधिदर्शन, अवधिज्ञान पूर्वेनी निराकारस्थिति छे. केवलज्ञानी भगवन्तने थतो तमाम द्रव्यपर्यायोनो साक्षात्कार ज केवलदर्शन छे.१ ३. 'ज्ञानथी पूर्वे दर्शन होय ज छे' १. "चक्षुर्ज्ञानात् पूर्वं, प्रकाशरूपेण विषयसन्दर्शि । यच्चैतन्यं प्रसरति, तच्चक्षुर्दर्शनं नाम । शेषेन्द्रियावबोधात्, पूर्वं तद्विषयदर्शि यज्ज्योतिः । निर्गच्छति तदचक्षु-दर्शनसंज्ञं स्वचैतन्यम् ॥

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