Book Title: Anusandhan 2008 12 SrNo 46
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 39
________________ ३० अनुसन्धान ४६ आगलि आगळ, अग्रस्थाने, समक्ष, पहेलां, हवे पछी (सं. अग्र + ल) [ अग्रे, पुरः ] [पाश्चात्त्यः ] [सदृक् ] समान ना जेवुं, सरखुं. [अतिसउल] (?) तादृक्षः = तेना जेवुं, आबेहूब [तादृश: ] अनेसउ = अनोखो (सं. अन्यादृशः ) [ अन्यसदृक्, अन्यसदृशः, अन्यसदृक्षः] [ त्वादृश: ] तूं सरीखऊ तारा जेवो मूं सरीखउ = मारा जेवो तुम्ह सरीखउ अम्ह सरीखउ अरहउ परहउ पच्छिलिउ पाछलो, पाछळनो (सं. पश्च > पच्छ+ल) सरीखउ ना जेवो, सरखो (सं. सदृक्ष :) = = - = - -- = = तमारा जेवो अमारा जेवो नजीक, अहीं, आगळ, आम (सं. आरात् ) दूर, तहीं, पाछळ, पछी तेम (सं. परात् / परस्मिन्) (टि. जूनी गुज. मां 'अरहउ - परहउ' अने अर्वा गुज. मां 'अरुपर' एम सामासिक शब्दप्रयोग वधु प्रचलित छे. जेनो अहींतहीं, आमतेम, नजीकदूर, आगळपाछळ एवा अर्थसंदर्भे वपराश छे. 'ओरूं' नजीक ए शब्द साथे अरहउ > अरुनुं उच्चारसाम्य जोई शकाशे.) 1 पारवलि (?) पार पामेलो, पारंगत, भणेलो (?) सर्वतो = सर्व प्रकारे, बधी बाजुए, चोतरफ (सं. सर्वत: ) = = समन्तात् = सर्वत्र उगउमुगउ = ऊगोमूगो Jain Education International झलझांखसउं = भळभांखळु, मळसकुं [मादृश: ] [ युष्मादृश: ] [अवाङ्मुकः] (टि. वर्तमानमां आवो शब्दप्रयोग प्रचलित नथी. 'म.गु.श. 'ना सम्पादक आ शब्दने द्विरुक्त प्रयोग गणे छे. अहीं अपायेलो संस्कृत पर्याय व्युत्पत्ति तरीके अस्वीकार्य छे.) For Private & Personal Use Only [ अस्मादृश: ] [अर्वाक् ] [पराक् ] [पठित: ] [विश्वक्] [ समन्ततः ] [चलद्ध्वाङ्क्षम् ] , www.jainelibrary.org

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